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कृषि ही बनेगी देश की इकोनॉमी का ग्रोथ इंजन

विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए गांव-किसान का तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ना जरूरी, इसके लिए कृषि क्षेत्र के विकास की समग्र नीति बनाकर गांव किसान की खुशहाली सुनिश्चित करनी होगी |

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Harvir Singh

रूरल वॉयस को जब अपनी तीसरी वर्षगांठ पर आयोजित होने वाले एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव का विषय तय करना था तो हमने पाया कि देश की इकोनॉमी को मजबूत करना है तो इसके केंद्र में कृषि क्षेत्र को रखना होगा। वैसे भी देश की इकोनॉमी में करीब 18 फीसदी हिस्सेदारी और 45 फीसदी कामकाजी लोगों के रोजगार का स्रोत होने के चलते कृषि क्षेत्र की तेज वृद्धि के बिना देश की इकोनॉमी को मजबूत करने की बात करना तर्कसंगत नहीं है। इन बातों को ध्यान में रखकर हमारा विषय तय हुआमेकिंग एग्रीकल्चर इंजन ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ

साल 1991 में उदार आर्थिक नीतियों की शुरुआत न्यू इंडस्ट्रियल पॉलिसी के जरिये हुई तो यह धारणा बहुत मजबूत थी कि देश में औद्योगिक विकास तेज होगा और आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि छोड़ उद्योगों का रुख करेगा। इससे कृषि पर बोझ कम होगा और ग्रामीण भारत में लोगों की संख्या घटने से वहां आर्थिक स्थिति भी बेहतर होगी। यह बात सही है कि इस बीच देश में शहरीकरण और शहरी आबादी का प्रतिशत बढ़ा है, लेकिन खेती पर निर्भर लोगों की संख्या कम होने की धारणा सही साबित नहीं हुई। दूसरी ओर भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का सपना भी पूरा नहीं हुआ। सरकार मैन्युफैक्चरिंग को जीडीपी के 25 फीसदी तक ले जाने के लिए तमाम योजनाएं लागू करती रही है, इसके लिए हर साल इंसेंटिव भी देती है, फिर भी यह 12 से 13 फीसदी पर अटकी है। इसमें शामिल कुल कामकाजी लोगों की संख्या की हिस्सेदारी भी करीब 14 फीसदी तक पहुंचने के बाद लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक अब 12 फीसदी से कम रह गई है।

छह फीसदी की औद्योगिक वृद्धि दर रोजगार में केवल एक फीसदी इजाफा कर रही है क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग में ऑटोमेशन बढ़ रहा है। ऐसे में कृषि को मजबूत करने का विकल्प ही बेहतर है। नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद का कहना है कि कृषि विकास दर 4.5 फीसदी होने पर ही 2047 तक भारत विकसित राष्ट्र बन सकता है। सरकार के सामने एक बेहतर मौका है कि वह कृषि को केंद्र में रखकर अपनी आर्थिक नीतियां तय करे। अभी ऐसा नहीं हो रहा है लेकिन ऐसा करना जरूरी है। कृषि क्षेत्र में बड़ी संभावनाएं हैं जो देश के विकास की गति को तेज कर सकती हैं, लेकिन उसके लिए कृषि क्षेत्र से जुड़ी नीतियों में बदलाव करना होगा और निवेश के लिए बेहतर मौके पैदा करने होंगे।

चिंताजनक बात यह है कि कृषि क्षेत्र में निवेश करने में निजी कॉरपोरेट की दिलचस्पी बहुत कम है और यह तीन फीसदी से भी कम है। कृषि क्षेत्र में अधिकांश निवेश या तो सार्वजनिक क्षेत्र का है या फिर किसान खुद पैसा लगा रहे हैं। यह स्थिति कृषि विकास के पहिये को तेज नहीं कर सकती है। केंद्र और राज्य सरकारें अपने बजट में कृषि क्षेत्र के लिए आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा इनकम सपोर्ट या सब्सिडी के रूप में दे रही हैं और कैपिटल एक्सपेंडिचर नगण्य है। चालू साल के केंद्रीय बजट में कृषि के लिए कैपिटल एक्सपेंडिचर 100 करोड़ रुपये से भी कम है जबकि सरकार ने 11.11 लाख करोड़ रुपये के कैपिटल एक्सपेंडिचर का प्रावधान किया है। इसका सबसे बड़ा हिस्सा ढांचागत सुविधाओं के विकास पर जा रहा है। यही नहीं, एग्रीकल्चर रिसर्च और एजुकेशन पर सरकार का खर्च या तो स्थिर है या कम हो रहा है। देश को हरित क्रांति की कामयाबी सार्वजनिक क्षेत्र के कृषि शोध तंत्र आईसीएआर और आईएआरआई जैसे संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के कारण मिली। लेकिन अब इनके लिए आवंटित अधिकांश राशि वेतन पर ही खर्च हो जाती है। दुनिया की निजी क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियां आईसीएआर के कुल बजट से अधिक शोध पर खर्च कर रही हैं। मार्केटिंग के मोर्चे पर आधुनिक ढांचागत सुविधाएं स्थापित करने पर सरकारों का फोकस नहीं है, वैल्यू एडिशन की कोई कारगर नीति है। पिछले दो साल के फैसले साबित करते हैं कि आयात-निर्यात पर सरकार के फैसलों के केंद्र में उपभोक्ता है, किसान नहीं। ऐसी नीतियां कृषि को इकोनॉमिक ग्रोथ का इंजन नहीं बना सकती हैं। सरकार को सभी हितधारकों को साथ रखते हुए नये सिरे से सोचना होगा।

कृषि किस तरह देश की इकोनॉमी की ग्रोथ का इंजन बन सकती है, इसका क्या आधार है यह रूरल वर्ल्ड के इस अंक की कवर स्टोरी में विस्तार से बताया गया है। टेक्नोलॉजी और इनोवेटिव मार्केटिंग के जरिये परंपरागत गुड़ इंडस्ट्री कैसे मॉडर्न इंडस्ट्री का रूप ले रही है, इस अंक में उस पर एक ग्राउंड रिपोर्ट है। कृषि क्षेत्र के कायाकल्प और करोड़ों किसानों के जीवन में बदलाव लाने वाले दो महान शख्सीयतों पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन को भारत रत्न देने की घोषणा की गई है। इन पर भी विशेष सामग्री है। रूरल वर्ल्ड का हर अंक देश के किसानों और कृषि क्षेत्र की बेहतरी को समर्पित है।


Harvir Singh
Editor-in-Chief

रूरल वर्ल्ड पत्रिका कृषि नीति, किसानों के मुद्दों, नई तकनीक, एग्री-बिजनेस और नई योजनाओं से जुड़ी तथ्यपरक जानकारी देती है।

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