Home > उर्वरक संप्रभुताः कैसे घटेगी आयात पर निर्भरता > Volume 3, Issue 3

उर्वरक संकट का जैविक समाधान

भारत हर साल लाखों टन पोषक तत्व और हजारों करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी गंवा रहा है। जैव उर्वरक, बायोस्टिमुलेंट्स और कार्बन-समृद्ध मिट्टी इस चुनौती का स्थायी समाधान बन सकते हैं

1760359300.png Logo

डॉ. रेणुका दीवान

भारत की कृषि रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता के जाल में फंसी हुई है। यह निर्भरता आर्थिक रूप से महंगी, पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक और कृषि विज्ञान के नजरिए से आत्मघाती साबित हो रही है। देश में हर वर्ष 6 करोड़ टन से अधिक उर्वरकों की खपत होने के बावजूद यहां की मिट्टी में पोषक तत्व उपयोग की दक्षता विश्व में सबसे कम स्तर वाले देशों के समान है। नाइट्रोजन के लिए यह 30-40%, फॉस्फोरस के लिए 15-25% और पोटाश के लिए 40-50% है। शेष पोषक तत्व वाष्पीकरण, रिसाव (लीचिंग), बहाव तथा मिट्टी में स्थिरीकरण के कारण बेकार हो जाते हैं। यह लेख एक व्यापक वैज्ञानिक ढांचा प्रस्तुत करने के साथ बताता है कि जैविक हस्तक्षेप, विशेष रूप से जैव उर्वरक और बायोस्टिमुलेंट उर्वरकों की उपलब्धता, अवशोषण और उपयोग की दक्षता से जुड़ी बाधाओं को किस प्रकार दूर कर सकते हैं। तर्क यह है कि जहां धीमी गति से पोषक तत्व छोड़ने वाले उर्वरक और कोटेड यूरिया जैसे रासायनिक नवाचार पोषक तत्वों की उपलब्धता की समस्या को कुछ हद तक दूर करते हैं, वहीं पौधों की अंतर्निहित सीमाओं से जुड़ी अवशोषण और मेटाबोलिक उपयोग की चुनौतियों का समाधान केवल जैविक उत्पाद कर सकते हैं। उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य एक समन्वित समाधान की ओर संकेत करते हैं, जिसमें मिट्टी को फिर से उपजाऊ बनाना, स्ट्रेस मैनेजमेंट, लक्षित बायोफर्टिलाइजेशन तथा विशिष्ट जैव-रासायनिक उपायों के माध्यम से पोषक तत्व उपयोग की दक्षता बढ़ाने वाले बायोस्टिमुलेंट का संयुक्त प्रयोग शामिल हो। यही एकीकृत दृष्टिकोण उर्वरकों की दक्षता बढ़ाने और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने का प्रभावी मार्ग प्रदान कर सकता है।

 

उर्वरकों पर भारत की निर्भरता

 

भारत रासायनिक उर्वरकों का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। विश्व की कुल कृषि योग्य भूमि का लगभग 11% हिस्सा भारत के पास है, लेकिन वैश्विक उर्वरक खपत में हिस्सेदारी 17-18% है। उर्वरक उपयोग की यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ी है। वर्ष 1950-51 में पोषक तत्वों (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश-एनपीके) की खपत मात्र 70 हजार टन थी, जो 2022-23 में बढ़कर 280 लाख टन से अधिक हो गई। यह लगभग 400 गुना वृद्धि है, जिसने हरित क्रांति को गति दी और खाद्य सुरक्षा को जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ी है।

 

उर्वरक सब्सिडी आज भारत सरकार के सबसे बड़े राजकोषीय व्ययों में एक है, जिस पर प्रतिवर्ष डेढ़ से दो लाख करोड़ रुपये (लगभग 18-24 अरब डॉलर) से अधिक खर्च होता है। इसके बावजूद 1990 के दशक के बाद से अतिरिक्त उर्वरक उपयोग से मिलने वाले उत्पादकता लाभ में गिरावट आई है। यह कृषि विज्ञान में “घटते प्रतिफल” का एक प्रमुख उदाहरण है। मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन के लगातार कम होने और मिट्टी के समग्र स्वास्थ्य एवं संरचना में गिरावट के कारण यह और अधिक गंभीर हो गया है।

 

 

नाइट्रोजन: फॉस्फोरस: पोटाश (एन:पी:के) असंतुलन भारत में उर्वरक व्यवस्था की गंभीर समस्या को दर्शाता है। यूरिया पर भारी सब्सिडी के कारण देश में नाइट्रोजन प्रधान उर्वरक खपत का इस्तेमाल बढ़ा, जिससे मिट्टी की ऊपरी परत में फॉस्फोरस की अत्यधिक मात्रा जमा हो गई है। परिणामस्वरूप पौधों के लिए इसकी उपलब्धता घट जाती है। वहीं, गहन खेती वाले क्षेत्रों में पोटाश की कमी लगातार बढ़ रही है। आदर्श एन:पी:के अनुपात 4:2:1 माना जाता है, लेकिन व्यवहार में यह शायद ही कभी हासिल हो पाता है। वर्ष 2022-23 में वास्तविक अनुपात लगभग 7.3:2.8:1 दर्ज किया गया था।

 

भारत में पोषक तत्व उपयोग दक्षता की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। औसतन, किसानों द्वारा डाली गई नाइट्रोजन का केवल 30-40 प्रतिशत फसलें ग्रहण कर पाती हैं। शेष 60-70 प्रतिशत विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से नष्ट हो जाता है, जिनमें वाष्पीकरण (मुख्य रूप से अमोनिया और नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन), डिनाइट्रीफिकेशन, रिस कर भूजल में जाना (लीचिंग) तथा सतह की मिट्टी के साथ जलाशयों और नदियों में पहुंचना शामिल हैं। यह आर्थिक दृष्टि से नुकसानदायक है, क्योंकि इससे प्रतिवर्ष लगभग 60,000 से 80,000 करोड़ रुपये की नाइट्रोजन व्यर्थ चली जाती है। बल्कि यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण तथा नदियों और जलाशयों में यूट्रोफिकेशन (पोषक तत्वों की अत्यधिक वृद्धि के कारण जल प्रदूषण) जैसी गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं में भी महत्वपूर्ण योगदान करती है।

 

 

उत्पादकता में गिरावट

प्रति किलोग्राम नाइट्रोजन प्रयोग से अनाज उत्पादन की मात्रा 1970 के दशक के 50-60 किलोग्राम से घटकर 2020 तक प्रमुख अनाज उत्पादक राज्यों में 25 किलोग्राम से भी कम रह गई है। घटती उत्पादकता के कारण भारतीय किसान अधिक मात्रा में उर्वरक का उपयोग कर रहे हैं। साथ ही वे उस मृदा पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं जो दीर्घकालिक उत्पादकता की आधारशिला है। यह प्रणालीगत विफलता मांग करती है कि इसके समाधान भी प्रणालीगत हों।

 

उर्वरक प्रदर्शन की तीन मूलभूत बाधाएं

 

प्रभावी कदमों की रूपरेखा तैयार करने के लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि उर्वरक कहां और क्यों विफल होते हैं। इसमें तीन अलग-अलग बाधाएं हैं। नीति और व्यवहार में अक्सर इन बाधाओं को अलग न मानकर एक साथ देख लिया जाता है, जिससे गलत दिशा में कदम उठाए जाते हैं और अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।

 

महत्वपूर्ण निष्कर्ष: पॉलिमर-कोटेड यूरिया, एन-ब्यूटाइल थायोफॉस्फोरिक ट्रायमाइड (NBPT) जैसे यूरिएज अवरोधक, डाइसाइनडायमाइड (DCD) और 3,4-डाइमिथाइलपाइराज़ोल फॉस्फेट (DMPP) जैसे नाइट्रीफिकेशन अवरोधक पहली बाधा (पोषक तत्वों की उपलब्धता) को काफी हद तक दूर कर सकते हैं। हालांकि, बाधा 2 और 3 पौधे की अंतर्निहित जैविक सीमाओं से जुड़े हैं। इनका नियंत्रण प्लांट फिजियोलॉजी, रूट बायोलॉजी, मेम्ब्रेन ट्रांसपोर्ट और एंजाइम गतिशीलता से होता है। पौधे की जड़ नाइट्रेट आयनों का परिवहन कैसे करती है, या पत्ती की कोशिका ग्लूटामाइन को प्रोटीन में कितनी दक्षता से परिवर्तित करती है, कोई भी रासायनिक उर्वरक संरचना इसे नहीं बदल सकती। यह जैविक उत्पाद ही कर सकते हैं।

 

जैव उर्वरकः जैविक तरीके से उपलब्धता की समस्या का समाधान

 

जैव उर्वरक बैक्टीरिया, फफूंद और सायनोबैक्टीरिया जैसे जीवित सूक्ष्मजीवों से बने होते हैं। जब इन्हें बीज, मिट्टी या पौधों की सतह पर डाला जाता है, तो ये राइजोस्फेयर या जड़ों के अंदर बस जाते हैं और प्राथमिक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाकर पौधों की वृद्धि को प्रोत्साहित करते हैं। रासायनिक उर्वरकों के विपरीत, जैव उर्वरक सीधे पोषक तत्व नहीं जोड़ते। इसके बजाय, वे जैव-भूरासायनिक प्रक्रियाओं को सक्रिय करते हैं। इस प्रक्रिया से मिट्टी में पहले से मौजूद पोषक तत्व पौधों को उपलब्ध होते हैं या वातावरण से उन्हें ग्रहण कर पौधों तक पहुंचाते है।

 

जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण

 

जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण, अर्थात नाइट्रोजनेज एंजाइम कॉम्प्लेक्स की सहायता से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले सूक्ष्मजीवों द्वारा वायुमंडलीय डाइ-नाइट्रोजन (N₂) को अमोनियम में परिवर्तित करना, कृषि में पोषक तत्व प्राप्त करने की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में से एक है। ऐसा करने वाले जीवों को व्यापक रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:

 

• सहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीव: राइजोबियम, ब्रेडीराइजोबियम तथा मेसोराइजोबियन प्रजातियां, जो दलहनी फसलों की जड़ों में गांठें (रूट नोड्यूल्स) बनाती हैं। दलहनी फसलों में इनकी नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता 50-300 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर प्रति मौसम तक दर्ज की गई है।

 

• स्वतंत्र/सहचारी नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीव: एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलियम, हर्बास्पिरिलियम तथा ग्लूकोनासेटोबैक्टर डायजोट्रॉफिकस जैसे सूक्ष्मजीव, जो अनाज वाली फसलों और गन्ने की जड़ों के आसपास या उनके भीतर निवास करते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में इनका योगदान 5-40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर तक हो सकता है।

 

• सायनोबैक्टीरिया: एनाबीना तथा नॉस्टॉक प्रजातियां विशेष रूप से जलभराव वाले धान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये 20-30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर प्रति मौसम तक योगदान देती हैं।

 

गेहूं, धान और मक्का में एजोस्पिरिलम ब्रासिलेन्से तथा एजोटोबैक्टर क्रोओकोक्कम के उपयोग से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के विभिन्न अनुसंधान केंद्रों पर किए गए फील्ड परीक्षणों में अनुशंसित नाइट्रोजन (N) उर्वरक की मात्रा में 15-25% तक कमी दर्ज की गई है, जबकि उपज में कोई खास कमी नहीं आई। गेहूं में जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के योगदान पर किए गए मेटा-विश्लेषणों से पता चलता है कि अनुकूल मृदा परिस्थितियों में जैव उर्वरक प्रति हेक्टेयर 20-40 किलोग्राम यूरिया-नाइट्रोजन के बराबर नाइट्रोजन उपलब्ध करा सकते हैं।

 

फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु एवं कवक

 

भारत की मिट्टी की एक विडंबना यह है कि इसमें फॉस्फोरस (P) की मात्रा तो प्रचुर होती है, लेकिन पौधों के लिए उपलब्ध फॉस्फोरस अक्सर कम रहता है। दशकों तक सुपर फॉस्फेट और डीएपी (DAP) के उपयोग से मिट्टी में काफी फॉस्फोरस जमा हो गया है (ऊपरी 15 सेंटीमीटर मिट्टी में 1,000 किलोग्राम P₂O₅ प्रति हेक्टेयर से अधिक), लेकिन यह अघुलनशील यौगिकों के रूप में होता है। क्षारीय मिट्टी में यह कैल्शियम फॉस्फेट तथा अम्लीय मिट्टी में आयरन और एल्युमिनियम फॉस्फेट के रूप में होता है।

 

फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु जैसे बैसिलस मेगाटेरियम, स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस और बर्कहोल्डेरिया सेपेसिया तथा फॉस्फेट घुलनशील कवक जैसे एस्परजिलस नाइजर और पेनिसिलियम बिलाए विभिन्न जैविक अम्लों (ग्लूकोनिक, ऑक्सैलिक, साइट्रिक और मैलिक एसिड) का उत्पादन करके इन स्थिर फॉस्फेट यौगिकों को घुलनशील बनाते हैं। ये एसिड राइजोस्पीयर (जड़ क्षेत्र) को अम्लीय बनाकर फॉस्फेट को मुक्त कर देते हैं।

 

आईसीएआर के अनुसंधान नेटवर्क तथा स्वतंत्र अध्ययनों से प्राप्त फील्ड आंकड़ों के अनुसार, फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु के उपयोग से फॉस्फोरस उपयोग दक्षता में 20-40% तक वृद्धि हो सकती है। इससे अनुशंसित फॉस्फोरस उर्वरक की मात्रा में 25-50% तक बचत संभव है, जबकि उपज लगभग समान बनी रहती है। वर्ष 2021 के बाद डीएपी की कीमतों में तेज वृद्धि को देखते हुए यह किसानों के लिए आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

 

पोटाशियम मोबिलाइजिंग बैक्टीरिया (KMB) और जिंक सॉल्युबलाइजर

 

हालांकि जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण (BNF) और फॉस्फेट घुलनशीलक बैक्टीरिया (PSB) पर सबसे अधिक शोध हुआ है, लेकिन पोटाशियम मोबिलाइजिंग बैक्टीरिया (जैसे बैसिलस म्यूसिलाजिनोसस, फ्रेट्यूरिया ऑरैंशिया, पैनीबैसिलस ग्लूकैनोलाइटिकस) तथा जिंक घुलनशीलक सूक्ष्मजीव (जैसे बैसिलस सब्टिलिस, थायोबैसिलस थायोऑक्सिडन्स) को भी अब पौध पोषण प्रबंधन के महत्वपूर्ण घटकों के रूप में तेजी से मान्यता मिल रही है। भारत के जलोढ़ (Alluvial) क्षेत्रों की मिट्टी में प्रायः माइका और फेल्डस्पार खनिजों के रूप में स्ट्रक्चरल पोटाश (K) की मात्रा अधिक होती है, लेकिन यह पोटाश जैविक रूप से पौधों के लिए उपलब्ध नहीं होता। सूक्ष्मजीवों की सक्रियता के बिना पौधे इसका उपयोग नहीं कर सकते। पोटाशियम मोबिलाइजिंग बैक्टीरिया ऑर्गेनिक एसिड के माध्यम से इन खनिज भंडारों से 10-25 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर तक मुक्त कर सकते हैं।

 

माइकोराइजल फफूंद: पोषक तत्वों का छिपा हुआ नेटवर्क

 

आर्बस्कुलर माइकोराइजल फफूंद (एएमएफ - राइजोफेगस इरेगुलारिस, ग्लोमस मोसिए, फनेलिफॉर्मिस प्रजातियां) पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। एएमएफ के हाइफल (Hyphal) नेटवर्क पौधों की जड़ों के प्रभावी अवशोषण क्षेत्र को 100 से 800 गुना तक बढ़ा देते हैं। इसके कारण पौधे मिट्टी के उन हिस्सों और पोषक तत्व भंडारों तक पहुंच पाते हैं जिनका उपयोग जड़ रोम (Root Hairs) नहीं कर पाते। भारत के शुष्क कृषि क्षेत्रों में किए गए फील्ड परीक्षणों (सीआरआईडीए, हैदराबाद) में पाया गया कि ज्वार और मूंगफली की फसलों में एएमएफ का प्रयोग करने से पोषक तत्व उपयोग दक्षता में 18-28 प्रतिशत की वृद्धि हुई, साथ ही अनुशंसित फॉस्फोरस उर्वरक की मात्रा को 30-50 प्रतिशत तक कम किया जा सका।

 

मृदा स्वास्थ्यः नाइट्रोजन के लिए कार्बन सबसे अहम कारक क्यों

 

भारत में मिट्टी में मौजूद ऑर्गेनिक कार्बन सबसे अधिक उपेक्षित है। यहां औसत मृदा ऑर्गेनिक कार्बन केवल 0.3-0.5% है, जबकि प्रभावी मृदा स्वास्थ्य के लिए वैश्विक स्तर पर मान्य न्यूनतम सीमा 1.5% है। यह अनुपात केवल उर्वरता नहीं बताता, बल्कि यह जैविक नाइट्रोजन चक्र, मृदा संरचना, जल धारण क्षमता तथा सूक्ष्मजीवी पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यों का मूल आधार है।

 

मृदा ऑर्गेनिक कार्बन और नाइट्रोजन चक्र

 

जब मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर 0.5% से कम हो जाता है, जैसा धान-गेहूं की खेती वाले गंगा के मैदानी इलाके में देखा गया है, तब मिट्टी एक सक्रिय जैविक प्रणाली के बजाय केवल एक निष्क्रिय माध्यम बनकर रह जाती है। ऐसी मिट्टी में डाले गए उर्वरकों से नाइट्रोजन की हानि सबसे अधिक होती है, क्योंकि पोषक तत्वों को रोककर रखने वाली जैविक प्रक्रियाएं लगभग समाप्त हो चुकी होती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) और केंद्रीय शुष्क क्षेत्र कृषि अनुसंधान संस्थान (सीआरआईडीए) के दीर्घकालिक उर्वरता परीक्षणों के अनुसार, मृदा ऑर्गेनिक कार्बन स्तर में केवल 0.5–1.0 प्रतिशत की वृद्धि उर्वरकों की आवश्यकता 15-30 प्रतिशत तक कम करने के साथ फसलों की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार ला सकती है।

 

बायोस्टिमुलेंटः पोषक तत्व अवशोषण और उपयोग दक्षता बढ़ाने का प्रभावी माध्यम

 

एफसीओ के प्लांट बायोस्टिमुलेंट्स रेगुलेशन के अनुसार, बायोस्टिमुलेंट ऐसे उत्पाद हैं जो पौधों की पोषण प्रक्रिया को सक्रिय करते हैं। इनका उद्देश्य इन पहलुओं में सुधार करना होता है: पोषक तत्व उपयोग दक्षता, अजैविक तनाव (Abiotic Stress) सहन करने की क्षमता, फसल की गुणवत्ता संबंधी विशेषताएं, मिट्टी या राइजोस्फीयर में सीमित रूप से उपलब्ध पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाना। ये उसी कमी को पूरा करते हैं जिसे पारंपरिक उर्वरक और यहां तक कि बायोफर्टिलाइजर भी पूरा नहीं कर सकते। बायोस्टिमुलेंट पौधों की उस आंतरिक शारीरिक क्षमता को प्रभावित करते हैं, जिसके माध्यम से वे पोषक तत्वों का अवशोषण और उपयोग करते हैं।

 

तनाव (Stress) उर्वरक दक्षता का छिपा हुआ शत्रु क्यों है?

अजैविक तनाव (Abiotic Stress) ऐसा महत्वपूर्ण कारण है जिस पर शायद सबसे कम चर्चा हुई है। भारत में फसलें लगातार और कई बार एक साथ गर्मी, सूखा, लवणता, जलभराव तथा पोषक तत्वों की विषाक्तता या कमी जैसे तनावों का सामना करती हैं।

 

अजैविक तनाव की स्थिति में:

• जड़ों की वृद्धि कम होती है, जिससे जड़ लंबाई घनत्व (Root Length Density), जड़ रोम (Root Hair) घनत्व तथा पार्श्व जड़ों (Lateral Roots) की शाखाएं कम हो जाती हैं। 

 

• जड़ कोशिकाओं की झिल्ली प्रभावित होती है, जिससे पोषक तत्वों का परिवहन करने वाले ट्रांसपोर्टर सही ढंग से कार्य नहीं कर पाते। 

 

• H⁺-ATPase की गतिविधि कम हो जाती है, जबकि यही एंजाइम सेकंडरी सक्रिय पोषक तत्व परिवहन के लिए आवश्यक प्रोटॉन प्रेरक बल प्रदान करता है। 

 

परिणामस्वरूप, भले ही मिट्टी में पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों, तनावग्रस्त पौधा उन्हें पूरी क्षमता के साथ अवशोषित नहीं कर पाता। अध्ययनों से पता चला है कि केवल हीट स्ट्रेस, जो भारत की ग्रीष्मकालीन फसलों में एक सामान्य स्थिति है, मिट्टी से संबंधित अन्य सीमित कारकों को नियंत्रित रखने पर भी नाइट्रोजन अवशोषण दक्षता को 25-40 प्रतिशत तक कम कर सकता है। अर्थात यह केवल मिट्टी की केमिस्ट्री की समस्या नहीं है, बल्कि पौधों की शारीरिक क्रियाओं से जुड़ी समस्या है, और इसका समाधान पौधों की शारीरिक प्रक्रियाओं को सशक्त बनाने वाले उपायों से ही संभव है।

 

लक्षित बायोस्टिमुलेंटः नाइट्रोजन अवशोषण दक्षता की इंजीनियरिंग 

 

बायोस्टिमुलेंट विज्ञान अब व्यापक स्तर पर तनाव नियंत्रण से आगे बढ़कर जैविक तरीके से नाइट्रोजन ग्रहण की दिशा में अग्रसर हो गया है। इसे नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में सुधार का वैज्ञानिक रूप से सबसे उन्नत और संभावित रूप से सबसे अधिक प्रभावशाली दृष्टिकोण माना जा रहा है।

 

GS/GOGAT पाथवे: नाइट्रोजन एसिमिलेशन का केंद्रीय तंत्र

 

ग्लूटामीन सिंथेटेज/ग्लूटामेट सिंथेज (GS/GOGAT) पाथवे वह प्रमुख जैविक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से अकार्बनिक अमोनियम, चाहे वह मिट्टी, जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण या उर्वरकों से प्राप्त हो, पौधों की कोशिकाओं में कार्बनिक नाइट्रोजन यौगिकों में परिवर्तित किया जाता है। यह प्रक्रिया निम्न प्रकार से संचालित होती है:

 

NH₄⁺ + Glutamate + ATP → Glutamine  (GS; Glutamine Synthetase)

Glutamine + 2-Oxoglutarate + NADH → 2 Glutamate  (GOGAT; Glutamate Synthase)

 

ट्रांसजेनिक गेहूं और धान में GS1 (ग्लूटामीन सिंथेटेज-1) के अध्ययनों में पाया गया कि सीमित नाइट्रोजन उपलब्धता की परिस्थितियों में नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में 15-30% तक सुधार तथा उपज में 5-15% तक वृद्धि संभव है। जेनेटिक इंजीनियरिंग को रेगुलेटरी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन ऐसे बायोस्टिमुलेंट्स जो जैव-रासायनिक तरीके से GS गतिविधि को आंशिक रूप से बढ़ा सकें, समान लाभ प्राप्त करने का व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य और नियामकीय दृष्टि से अधिक स्वीकार्य विकल्प प्रस्तुत करते हैं।

 

आर्जिनीन पाथवे: अधिक दूरी तक नाइट्रोजन परिवहन और भंडारण

 

कई पौध प्रजातियों में आर्जिनीन अधिक दूरी तक नाइट्रोजन परिवहन का प्रमुख यौगिक होता है। आर्जिनीन बायोसिंथेसिस मार्ग दाना भरने (ग्रेन फिलिंग) के दौरान नाइट्रोजन के भंडारण और री-मोबिलाइजेशन की एक महत्वपूर्ण प्रणाली के रूप में कार्य करता है। इसका महत्व बहुत बड़ा है। यदि आर्जिनीन पाथवे की दक्षता बढ़ाई जाए, तो पौधे के वानस्पतिक भागों में पहले से मौजूद अधिक नाइट्रोजन को दानों तक स्थानांतरित किया जा सकता है। इससे अतिरिक्त उर्वरक की आवश्यकता के बिना नाइट्रोजन का हार्वेस्ट इंडेक्स बेहतर होता है।

 

नाइट्रोजन ट्रांसपोर्टर: अवशोषण के गेटकीपर

 

पौधों की जड़ें झिल्ली पर स्थित विशेष परिवहन प्रोटीन (ट्रांसपोर्टर्स) के एक समूह के माध्यम से नाइट्रोजन का अवशोषण करती हैं। इन ट्रांसपोर्टरों को समझना और उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित करना दूसरी बाधा को दूर करने की कुंजी है।

 

• NRT2 परिवार: हाई-एफिनिटी वाले नाइट्रेट ट्रांसपोर्टर (NRT2.1, NRT2.2; NRT1 परिवार)

 

• मिट्टी में नाइट्रेट की कम सांद्रता (1 mM से कम) होने पर ये प्रमुख अवशोषण प्रणाली के रूप में कार्य करते हैं।

 

• इनका नियमन मिट्टी में नाइट्रेट की उपलब्धता, प्रकाश तथा कार्बन-नाइट्रोजन (C:N) अनुपात से होता है।

 

• NRT1.1: लो-एफिनिटी नाइट्रेट ट्रांसपोर्टर (NRT1.1/NPF6.3)

 

• मिट्टी में नाइट्रेट की उच्च सांद्रता होने पर सक्रिय रहता है। यह ट्रांसपोर्टर ही नहीं, बल्कि नाइट्रेट सेंसर और सिग्नल ट्रांसड्यूसर के रूप में भी कार्य करता है।

 

• AMT1 परिवार: अमोनियम ट्रांसपोर्टर (AMT1;1, AMT1;2, AMT1;3)

 

• धान की खेती वाली मिट्टी में महत्वपूर्ण, जहां नाइट्रोजन का अधिकांश भाग अमोनियम के रूप में मौजूद रहता है।

 

• पर्याप्त नाइट्रोजन उपलब्ध होने पर AMT जीन की अभिव्यक्ति (Expression) दब जाती है। ऐसे में कार्बन-नाइट्रोजन संवेदन तंत्र को नियंत्रित करने वाले बायोस्टिमुलेंट्स AMT की उच्च अभिव्यक्ति को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। इससे पौधों की अमोनियम अवशोषण क्षमता बेहतर बनी रहती है।

 

 

बायोस्टिमुलेंट्स ट्रांसपोर्टर कार्यक्षमता को कैसे बेहतर बनाते हैं

 

बायोस्टिमुलेंट्स चार पूरक तंत्रों के माध्यम से नाइट्रोजन ट्रांसपोर्टरों की कार्यक्षमता में सुधार करते हैं: 1) ट्रांसपोर्टर जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression) को बढ़ाना - कार्बन:नाइट्रोजन अनुपात की संवेदन प्रणाली तथा NIN जैसे प्रोटीन ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर्स के नियमन से ट्रांसपोर्टर जीन की अभिव्यक्ति को बढ़ाया जाता है। 2) प्लाज्मा मेम्ब्रेन H⁺-ATPase गतिविधि को बनाए रखना - यह एंजाइम प्रोटॉन ग्रेडिएंट उत्पन्न करता है, जो सेकंडरी सक्रिय परिवहन को संचालित करता है। अजैविक तनाव (Abiotic Stress) में यह प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित होती है, जबकि बायोस्टिमुलेंट्स इसकी कार्यक्षमता को बनाए रखने में मदद करते हैं। 3) ट्रांसपोर्टर प्रोटीन को ROS-जनित ऑक्सीडेटिव क्षति से बचाना - रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज (ROS) द्वारा होने वाले ऑक्सीडेटिव नुकसान से ट्रांसपोर्टर प्रोटीन की रक्षा की जाती है, जिससे उनकी कार्यक्षमता बनी रहती है। 4) जड़ संरचना (Root Architecture) को बेहतर बनाना - मिट्टी की प्रति इकाई मात्रा में ट्रांसपोर्टेशन करने वाली कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है, जिससे पौधों की पोषक तत्व अवशोषण क्षमता में वृद्धि होती है। ये सभी तंत्र उन प्रक्रियाओं से भिन्न होने के साथ उनके पूरक भी हैं, जिनके माध्यम से बायोफर्टिलाइजर पौधों को नाइट्रोजन उपलब्ध कराते हैं।

 

जैविक उत्पाद पोषक तत्व दक्षता में कितना सुधार कर सकते हैं?

 

दावों को साबित करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि जैविक उत्पादों के लाभों को पारंपरिक शैक्षणिक जगत में कम करके प्रस्तुत किया गया है, तो दूसरी ओर मार्केटिंग के संदर्भ में इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है। निम्नलिखित निष्कर्ष पियर-रिव्यू वाले शोध, आईसीएआर परीक्षणों तथा विभिन्न स्थानों पर किए गए मेटा-विश्लेषणों पर आधारित हैं:

 

ये आंकड़े अनुकूलित प्रयोग या अच्छी तरह प्रबंधित अनुसंधान परिस्थितियों में प्राप्त परिणामों को दर्शाते हैं। खेत स्तर पर इन लाभों को वास्तविक रूप से हासिल करने के लिए उत्पाद की गुणवत्ता सुनिश्चित करना (जैसे पर्याप्त जीवित सूक्ष्मजीव संख्या और शेल्फ लाइफ की विश्वसनीयता), सही समय पर उपयोग, मिट्टी में पर्याप्त नमी तथा ऐसी आधारभूत परिस्थितियां आवश्यक हैं जो सूक्ष्मजीवों की सहायता करें। प्रयोगशाला या अनुसंधान परिणामों और खेत स्तर के परिणामों के बीच का अंतर अभी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

 

 

कोई जादुई समाधान नहीः एकीकृत जैविक प्रबंधन की आवश्यकता

 

इन साक्ष्यों का निष्कर्ष है कि भारत की उर्वरक उपयोग दक्षता की समस्या का समाधान कोई एक जैविक उत्पाद, जैविक तंत्र या कोई एक उपाय अकेले नहीं कर सकता। जो लोग दावा करते हैं कि एक बायोफर्टिलाइजर रासायनिक उर्वरकों की खपत को आधा कर देगा, और जो लोग जैविक उत्पादों को “वास्तविक परिस्थितियों” में पूरी तरह अप्रभावी मानकर खारिज कर देते हैं - दोनों ही अलग-अलग अर्थों में गलत हैं।

 

वैज्ञानिक अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि ये विभिन्न उपाय प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रत्येक उपाय पौधों और मिट्टी की अलग जैविक समस्या का समाधान करता है। उचित तरीके से एकीकृत करने पर इनका संयुक्त प्रभाव इनके अकेले प्रभावों के योग से कहीं अधिक होता है। इसी आधार पर हम जैविक माध्यमों से पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए चार स्तंभों का ढांचा प्रस्तुत करते हैं: (ऊपर देखें)

 

इंटीग्रेशन का तर्क 

 

ये चारों स्तंभ परस्पर सहयोगी तरीके से कार्य करते हैं। मृदा स्वास्थ्य की बहाली (स्तंभ 1) ऐसा वातावरण तैयार करती है जिसमें जैव उर्वरक (स्तंभ 2) जीवित रह सकें और प्रभावी ढंग से कार्य कर सकें। यदि गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त, कम मृदा ऑर्गेनिक कार्बन तथा बाधित सूक्ष्मजीवी वाली मिट्टी में जैव उर्वरक का प्रयोग किया जाए, तो वह लंबे समय तक टिके रहने में विफल हो सकता है।

 

तनाव प्रबंधन करने वाले बायोस्टिमुलेंट (स्तंभ 3) यह सुनिश्चित करते हैं कि मिट्टी में पोषक तत्वों की पर्याप्त उपलब्धता होने पर पौधा उन्हें प्रभावी ढंग से ग्रहण कर सके। इनके अभाव में, पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने वाले बायोस्टिमुलेंट्स (स्तंभ 4) के पास कार्य करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं रह जाता। इसी प्रकार, यदि स्तंभ 4 अनुपस्थित हो, तो पौधे द्वारा सफलतापूर्वक अवशोषित नाइट्रोजन का समुचित विलय नहीं हो पाता। इससे उसका प्रोटीन और उपज में रूपांतरण कम प्रभावी हो जाता है।

 

 

निष्कर्षः आगे की राह

भारत की उर्वरक समस्या आपूर्ति नहीं, बल्कि दक्षता की समस्या है। हमारी मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व डाले जा रहे हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाते हैं। समाधान अधिक उर्वरक उपयोग में नहीं, बल्कि पहले से डाले जा रहे उर्वरकों और मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों के बुद्धिमत्तापूर्ण प्रबंधन में निहित है।

 

यहां प्रस्तुत रूपरेखा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को सार्थक रूप से कम करने के लिए वैज्ञानिक आधार वाले, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और कृषि विज्ञान की दृष्टि से सुसंगत मार्ग प्रदान करती है। रासायनिक नवाचार (जैसे नियंत्रित रिलीज वाले उर्वरक और अवरोधक) पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में सहायक हैं और इनका उपयोग जारी रहना चाहिए। लेकिन वे संरचनात्मक और प्रणालीगत सुधार, जो भारत की नाइट्रोजन अवशोषण दक्षता को वर्तमान 35 प्रतिशत से बढ़ाकर 55-60 प्रतिशत तक ले जा सकते हैं, ऐसे जैविक हस्तक्षेपों से संभव हैं जो पौधों की शारीरिक प्रक्रियाओं के साथ काम करते हैं, न कि उनके इर्द-गिर्द।

 

इसके नीतिगत निहितार्थ महत्वपूर्ण हैं। बायोफर्टिलाइजर और बायोस्टिमुलेंट पर अनुसंधान, क्वालिटी रेगुलेशन, किसानों को प्रशिक्षण तथा आर्थिक प्रोत्साहनों को उस स्तर पर समर्थन मिलना चाहिए जो रासायनिक उर्वरक सब्सिडी के बोझ को कम करने के अनुरूप हो। आज यदि अच्छे जैविक पोषक तत्व अवशोषण दक्षता कार्यक्रम में एक रुपया निवेश किया जाता है, तो अगले एक दशक में उर्वरक सब्सिडी में पांच से दस रुपये तक की बचत हो सकती है।

 

विज्ञान तो तैयार है। उत्पाद भी तेजी से उपलब्ध कराए जा रहे हैं। मिट्टी के स्वास्थ्य में गिरावट, भूजल प्रदूषण और सब्सिडी व्यवस्था की वित्तीय अस्थिरता जैसी चुनौतियां भी स्पष्ट हैं। अब आवश्यकता इस जानकारी को प्रभावी नीतियों, विस्तार सेवाओं और बड़े पैमाने पर किसानों के खेती के तौर-तरीके में समाहित करने की है। भारतीय कृषि में जैविक क्रांति कोई दूर का सपना नहीं, बल्कि कृषि और अर्थव्यवस्था दोनों की दृष्टि से एक अनिवार्य आवश्यकता है।

 


डॉ. रेणुका दीवान
सह-संस्थापक और चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर, बायोप्राइम

RNI No: DELBIL/2024/86754 Email: [email protected]