उर्वरक आयात निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर
भू-राजनीतिक जोखिमों, सप्लाई चेन का संकट और मृदा क्षरण के बीच आयात निर्भरता घटाने, उर्वरक एफिसिएंसी बढ़ाने और कृषि को टिकाऊ बनाने की रूपरेखा
यशपाल सिंह सहरावत
डॉ. पद्मा शांति जगदभि
भारत का खाद्यान्न उत्पादन 1950-51 के 5.1 करोड़ टन से बढ़कर 2025-26 में 37.7 करोड़ टन तक पहुंच गया है। लेकिन इस उपलब्धि में एक गंभीर खामी छिपी है, वह है उर्वरक आयात पर अत्यधिक निर्भरता। भारत अपनी जरूरत का लगभग 20% नाइट्रोजन, 60% फॉस्फोरस और 100% पोटाश उर्वरकों का तैयार उत्पाद या कच्चे माल के रूप में आयात करता है। इसके अलावा, अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड, सल्फर तथा तैयार उर्वरक उत्पादों की भी बड़ी मात्रा विभिन्न देशों से आयात की जाती है। यह स्थिति खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और भू-राजनीतिक संप्रभुता के लिए जोखिम वाली है। यह निर्भरता भारत को महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों, विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। इस मार्ग में किसी भी प्रकार का व्यवधान देश की कृषि उत्पादन क्षमता और आर्थिक स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
उर्वरक आयात पर अत्यधिक निर्भरता कृषि क्षेत्र की उन बुनियादी कमजोरियों को उजागर करती है, जिनके समाधान के लिए तत्काल रणनीतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है। उर्वरक उपलब्धता, भू-राजनीतिक अवरोधों और खाद्य सुरक्षा के बीच का संबंध एक जटिल जोखिम तंत्र बनाता है। यह भारत की दीर्घकालिक खाद्य उत्पादन क्षमता और संप्रभु आत्मनिर्भरता को कमजोर करता है। इसलिए आवश्यक है कि एक व्यापक रणनीतिक ढांचा विकसित किया जाए, जो भू-राजनीतिक जोखिमों का समाधान करे, आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाए तथा घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत बनाए। ऐसा करके ही भारत भावी कृषि, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक व्यवधानों के विरुद्ध लचीलापन सुरक्षित कर सकेगा।
भू-राजनीतिक संकट और आपूर्ति श्रृंखला का जोखिम
भारत के लिए महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य
रणनीतिक वास्तविकता: होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित 33 किलोमीटर चौड़ा समुद्री मार्ग है। इसे वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक व्यापार की जीवनरेखा माना जाता है। दुनिया में समुद्री मार्ग से होने वाला लगभग 20% उर्वरक व्यापार, 46% नाइट्रोजनयुक्त उर्वरक तथा 20-25% तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का आवागमन इसी मार्ग से होता है। भारत के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत का 87% कच्चा तेल और 60-70% प्राकृतिक गैस आयात इसी रास्ते होता है। भारत हर वर्ष 20-25 लाख टन रॉक फॉस्फेट आयात करता है, जिसमें से 45-50% होर्मुज से आता है। इसी प्रकार भारत प्रतिवर्ष 22-25 लाख टन पोटाश का आयात करता है। देश में प्रतिवर्ष 2.8-3.2 करोड़ टन यूरिया का घरेलू उत्पादन होता है, इसके बावजूद 80-100 लाख टन यूरिया का आयात करना पड़ता है। भारत की गैस आधारित यूरिया उत्पादन इकाइयों की कुल क्षमता 2.84 करोड़ टन है, और इनकी उत्पादन लागत का लगभग 70% हिस्सा प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान उत्पन्न होने पर 2 से 4 सप्ताह के भीतर उर्वरकों की कीमतों में 15-25% तक वृद्धि हो जाती है। अल्पकालिक व्यवधान से यूरिया की कीमतों में तेजी और सरकार के सब्सिडी बोझ में वृद्धि होगी। मध्यम अवधि (1-3 माह) का व्यवधान रबी सीजन के लिए आवश्यक उर्वरक उपलब्धता को खतरे में डाल सकता है और खाद्यान्न उत्पादन पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। यदि अवरोध 6 महीने या उससे अधिक समय तक बना रहता है, तो उर्वरकों की उपलब्धता के लिए गंभीर संकट होगा। इससे खाद्य सुरक्षा और घरेलू उर्वरक उत्पादन संकट के साथ मिट्टी से पोषक तत्वों के अत्यधिक दोहन (न्यूट्रिएंट माइनिंग) और भूमि क्षरण जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ सकती हैं। इस संकट से यूरिया, डीएपी और एमओपी की आयात कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है, जिससे उर्वरक सब्सिडी का आर्थिक ढांचा अस्थिर हो सकता है। परिणामस्वरूप किसानों को कम मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराने, गैस-आधारित यूरिया संयंत्रों में उत्पादन में भारी कटौती तथा महंगाई का दुष्चक्र शुरू हो सकता है। यह अंततः खाद्य महंगाई और व्यापक आर्थिक अस्थिरता को बढ़ावा देगा।
होर्मुज में लंबे समय तक व्यवधान रहने पर नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटाश की भारी कमी हो सकती है। इससे उर्वरकों की लागत बढ़ेगी और सरकार को मौजूदा 1.86 लाख करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी के अतिरिक्त 40,000-60,000 करोड़ रुपये तक का और खर्च करना पड़ सकता है। यह स्थिति दशकों से चल रहे भारत के खाद्य आत्मनिर्भरता प्रयासों को कमजोर कर सकती है, देश की रणनीतिक कमजोरियों को उजागर कर सकती है और लंबे समय तक न्यूट्रिएंट माइनिंग के कारण मिट्टी की उत्पादकता को गंभीर एवं अपूरणीय क्षति पहुंचा सकती है। अंततः यह भारतीय कृषि की बुनियाद और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
भारत का वर्तमान उर्वरक परिदृश्य
वर्ष 2025-26 में 6 करोड़ टन से अधिक उर्वरकों की खपत के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता रहा, जो इसे वैश्विक कृषि महाशक्ति के रूप में स्थापित करता है। हालांकि, भारतीय उर्वरक बाजार में गंभीर असंतुलन है। बाजार चार प्रमुख उत्पादों पर निर्भर है - यूरिया (नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों में 70% से अधिक हिस्सेदारी), डाय-अमोनियम फॉस्फेट या डीएपी (फॉस्फोरस उर्वरकों में 60% से अधिक हिस्सेदारी), म्यूरेट ऑफ पोटाश या एमओपी (पोटाश उर्वरकों में 65% से अधिक हिस्सेदारी) और सिंगल सुपर फॉस्फेट। इससे उत्पादों का दायरा सीमित हो गया है, जो पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग में बाधक है।
ये प्रमुख उर्वरक लगभग एक सदी पहले विकसित किए गए थे। ये पानी में घुलनशील हैं और उर्वरक तथा कृषि विज्ञान में महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद इनमें बहुत कम बदलाव हुआ है। पुराने फॉर्मूलेशन पर यह अत्यधिक निर्भरता भारत की उर्वरक उपयोग दक्षता को प्रभावित करती है। यह केवल 30-40% है और वैश्विक स्तर पर सबसे कम मानी जाती है। इसका अर्थ है कि खेतों में डाले गए पोषक तत्वों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा फसलों द्वारा अवशोषित होने के बजाय व्यर्थ हो जाता है। हालांकि भारत प्रतिवर्ष 6 करोड़ टन से अधिक एनपीके उर्वरकों की खपत करता है और प्रति हेक्टेयर एनपीके उपयोग दर 162 किलोग्राम है, फिर भी यह कई क्षेत्रों में काफी पीछे है।
एफिसिएंसी में गिरावट का संकट
भारत में उर्वरक से मिलने वाली उत्पादकता के रुझान में गिरावट चिंताजनक है। यह दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती है। पिछले छह दशकों के आंकड़े इस गिरावट को प्रदर्शित करते हैं:
ये आंकड़े चिंताजनक प्रवृत्ति को बताते हैं। 1960 के दशक से उर्वरकों के उपयोग में लगभग 80 गुना वृद्धि हुई, लेकिन प्रति इकाई उर्वरक से मिलने वाली उपज (यील्ड रेस्पॉन्स) में 85-90% गिरावट आई है। यह पोषक तत्वों के सैचुरेशन, पौधों द्वारा पोषक तत्वों के कम अवशोषण और पैदावार में लगातार घटती दक्षता का संकेत है। नाइट्रोजन उपयोग दक्षता 1970 के दशक में 50% से अधिक थी, जो आज घटकर 35% से भी कम रह गई है। इसका अर्थ है कि खेतों में लगभग 65% नाइट्रोजन बेकार चली जाती है। नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में भारत का स्थान चीन, अमेरिका और अधिकांश दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से नीचे है, जो वैश्विक कृषि प्रतिस्पर्धा और टिकाऊ कृषि विकास के दृष्टिकोण से चिंताजनक है।
इसके आर्थिक और पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी अत्यंत गंभीर हैं। सरकार पर उर्वरक सब्सिडी का बढ़ता बोझ, नाइट्रोजन के रिसाव (लीचिंग) से भूजल प्रदूषण, रासायनिक अवशेषों से मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, अमोनिया के वाष्पीकरण से वायु प्रदूषण तथा नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन के कारण जलवायु परिवर्तन में बढ़ता योगदान - ये सभी कारक न केवल खेती की लाभप्रदता प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं।

मृदा क्षरण: एक दीर्घकालिक संकट
उर्वरकों के मामले में भारी अक्षमता ने मृदा स्वास्थ्य के गंभीर और बहुआयामी संकट को जन्म दिया है। यह स्थिति देश के लाखों कृषि भूखंडों से प्राप्त मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आंकड़ों में स्पष्ट दिखती है।
मृदा क्षरण के मूल कारण
उर्वरकों के बढ़ते उपयोग के बावजूद मृदा स्वास्थ्य में लगातार गिरावट का विरोधाभास कृषि प्रणाली में मौजूद कई संरचनात्मक असंतुलनों का परिणाम है। इसके प्रमुख कारण हैं:
• असंतुलित उर्वरक उपयोग: यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता से नाइट्रोजन की मात्रा अधिक हो जाती है, जबकि फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक और बोरॉन जैसे आवश्यक पोषक तत्व कम रहते हैं। ये सूक्ष्म पोषक तत्व फसल की गुणवत्ता, कीट प्रतिरोधक क्षमता और मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
• जैविक पदार्थों की कमी: कम्पोस्टिंग, हरी खाद, फसल चक्र और गोबर खाद के उपयोग में गिरावट के कारण मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन लगातार घट रहा है। ऑर्गेनिक कार्बन मिट्टी की संरचना, जल धारण क्षमता और पोषक तत्वों की साइक्लिंग का आधार है।
• मृदा क्षरण का दुष्चक्र: जैविक पदार्थों की कमी से मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की सक्रियता घटती है और मिट्टी की संरचना कमजोर पड़ती है, जिससे जल और पोषक तत्वों को संचित रखने की क्षमता कम हो जाती है। घटती सहनशीलता फसलों को सूखा, कीटों और रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है। साथ ही मिट्टी में अम्ल, लवण और पोषक तत्वों का असंतुलन बढ़ता जाता है, जिससे मृदा क्षरण का दुष्चक्र बन जाता है।
अस्थिर दिशा की ओर बढ़ता कृषि तंत्र
मौजूदा रुझान भारत के खाद्य सुरक्षा लक्ष्यों के लिहाज से असंगत है। उर्वरक उपयोग की बढ़ती मात्रा अब फसल उत्पादकता में घटते या कई मामलों में नकारात्मक प्रतिफल दे रही है। साथ ही मिट्टी, जल और वायु को भी प्रदूषित कर रही है। पोषक तत्वों की भारी बर्बादी (खेतों में डाला गया लगभग दो-तिहाई उर्वरक) अनेक पर्यावरण और स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे रही है। प्रदूषित भूजल पेयजल के लिए खतरा है, मिट्टी में जमा होते लवण उसकी संरचना और उर्वरता को नुकसान पहुंचा रहे हैं, नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा दे रहा है, तथा अमोनिया का वाष्पीकरण वायु गुणवत्ता को खराब कर मनुष्य की सांस लेने की प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। यदि आधुनिक, संतुलित तथा जैविक पदार्थों को बढ़ावा देने वाली पोषक तत्व प्रबंधन प्रणाली को नहीं अपनाया गया, तो भारत की कृषि उत्पादकता में गिरावट जारी रहेगी, खाद्य सुरक्षा कमजोर होगी और पर्यावरण तथा स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव अधिक गंभीर होते जाएंगे।
वर्तमान उर्वरक स्थिति और परिचालन संबंधी बाधाएं
उत्पादन क्षमता बनाम आयात निर्भरता
भारत की घरेलू यूरिया उत्पादन क्षमता (284 लाख टन प्रति वर्ष) पूरी तरह एलएनजी आयात पर निर्भर है, जो होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। फॉस्फेट की उपलब्धता भी सीमित है। देश में 30 करोड़ टन से अधिक रॉक फॉस्फेट भंडार होने के बावजूद, इसमें से लगभग 450 लाख टन ही व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल के लायक है। इसलिए भारत अपनी डीएपी आवश्यकता का 59% आयात करता है। सबसे गंभीर स्थिति पोटाश की है, जहां भारत 100% आयात पर निर्भर है। यह तब है जब देश में लगभग 200 करोड़ टन अप्रयुक्त ग्लॉकोनाइट भंडार मौजूद हैं। ग्लॉकोनाइट को मिनरल कन्सेशन रूल्स के दायरे से बाहर रखा गया है, जिसके कारण इस संसाधन का दोहन नहीं हो पाया है।
सब्सिडी का बोझ और राजकोषीय प्रभाव
उत्पाद आधारित और यूरिया केंद्रित सब्सिडी व्यवस्था पर सरकार हर वर्ष 1.86 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करती है। आपूर्ति में व्यवधान आने की स्थिति में यह खर्च काफी बढ़ जाता है। वर्तमान राजकोषीय ढांचा बिना किसी बुनियादी संरचनात्मक सुधार के अगले 5–7 वर्षों से अधिक समय तक टिकाऊ नहीं माना जा सकता। यह प्रणाली विकृत प्रोत्साहन पैदा करती है, जिसके परिणामस्वरूप किसान कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अनुशंसित मात्रा से 20–40% अधिक यूरिया डालते हैं। कृत्रिम रूप से कम कीमतों के कारण बढ़ा यह उपयोग न केवल मिट्टी का स्वास्थ्य बिगाड़ता है, बल्कि उर्वरक उपयोग दक्षता में अपेक्षित सुधार भी नहीं ला पाता।

रणनीतिक उद्देश्य और 8आर फ्रेमवर्क: तीन चरण का रोडमैप
तात्कालिक प्राथमिकता (0–12 माह): स्थानीय संसाधनों के रणनीतिक उपयोग, बफर स्टॉक निर्माण तथा आपूर्ति स्रोतों के विविधीकरण के माध्यम से निम्नलिखित उपाय लागू किए जाने चाहिएः
• उन्नत एफिसिएंसी उर्वरकों (EEF) का व्यापक उपयोग,
• उर्वरकों का मेकैनाइज्ड तरीके से गहरी परत में प्लेसमेंट,
• स्थानीय अपशिष्टों को ऑर्गेनो-मिनरल उर्वरकों में परिवर्तित करना, तथा
• आयात पर निर्भरता 15–20% तक कम करना।
इन उपायों से परिचालन क्षमता विकसित होगी और गहन सुधारों के लिए आवश्यक राजनीतिक सहमति बनाने में मदद मिलेगी।
मध्यम अवधि (12–24 माह):
निम्न कदमों को लागू किया जाए:
• घरेलू खनिज संसाधनों का उपयोग बढ़ाना (रॉक फॉस्फेट अपग्रेड, ग्लॉकोनाइट का वर्गीकरण)।
• अधिक उर्वरक उपयोग वाले जिलों में सॉयल हेल्थ कार्ड आधारित उर्वरक आवंटन की पायलट परियोजनाएं शुरू करना।
• स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक उर्वरकों के निर्माण को बढ़ावा देना।
• विकेन्द्रीकृत उत्पादन प्रणालियों (जैसे ऑर्गेनो-मिनरल उर्वरक) का विस्तार 50 जिलों तक करना।
• 300 से अधिक जिलों में उर्वरकों का गहरी परत में प्लेसमेंट तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को अनिवार्य बनाना।
इन उपायों से उर्वरक आयात में 30–40% तक कमी की जा सकेगी।
दीर्घ अवधि (2–10 वर्ष): उर्वरक नवाचार केंद्र की स्थापना करना। भू-राजनीतिक जोखिमों से सुरक्षित तथा जलवायु अनुकूल उर्वरक प्रणाली विकसित करना। उर्वरक सब्सिडी का वार्षिक बोझ घटाकर 40,000–50,000 करोड़ रुपये तक लाना। पोषक तत्वों में 70% से अधिक आत्मनिर्भरता हासिल करना।
8आर फ्रेमवर्क: 4आर से आगे की दिशा
पारंपरिक 4आर सिद्धांत (सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान) का विस्तार करते हुए इसे 8आर फ्रेमवर्क में बदलना आवश्यक है। इसके लिए चार नए महत्वपूर्ण आयाम जोड़े जाने चाहिए:
• रीसाइकलः सर्कुलर इकोनॉमी के माध्यम से पोषक तत्वों के चक्र को पूरा करना। रिकवर किए गए न्यूट्रिएंट के उपयोग से 25–40% तक रासायनिक उर्वरकों का विकल्प तैयार करना।
• रीबिल्डः मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन 0.5% से बढ़ाकर 0.8–1.2% तक ले जाना। मिट्टी की संरचना और जैविक गतिविधियों का पुनर्निर्माण करना।
• रिकॉर्डः रियल टाइम निगरानी के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग करना। खेत स्तर पर सटीक पोषक तत्व प्रबंधन और कैलिब्रेशन को सक्षम बनाना।
• रेजिलिएंटः स्रोतों, भौगोलिक क्षेत्रों और आपूर्ति प्रणालियों में विविधता लाना। आपूर्ति श्रृंखला में किसी एक स्रोत पर निर्भरता समाप्त कर जोखिम घटाना।
रणनीतिक ढांचा: प्रमुख नीतिगत कदम
सब्सिडी से प्रोत्साहन आधारित व्यवस्था की ओर सुधार: पोषक तत्व आधारित सब्सिडी प्रणाली की जगह मृदा स्वास्थ्य आधारित प्रोत्साहन प्रणाली की ओर बदलाव हो। सॉयल हेल्थ कार्ड को प्रभावी रूप से लागू किया जाए। इसके माध्यम से मिट्टी की स्थिति और फसल के प्रकार के अनुसार किसानों को सलाह दी जाए। प्रारंभिक चरण में उर्वरक आवंटन को सॉयल हेल्थ कार्ड की सिफारिशों से जोड़ते हुए पायलट परियोजनाएं चलाई जाएं। 3 से 5 वर्षों की चरणबद्ध संक्रमण प्रक्रिया किसानों की आय पर अचानक पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को रोकने में मदद करेगी। इससे राजकोषीय स्तर पर भी लाभ मिलने की संभावना है और पांचवें वर्ष तक उर्वरक सब्सिडी को 1.86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 40,000–50,000 करोड़ रुपये तक लाया जा सकता है।
प्रौद्योगिकी संबंधी अनिवार्य प्रावधान
• उन्नत दक्षता उर्वरक (EEF): पहले वर्ष में कुल यूरिया उपयोग का 25% → दूसरे वर्ष में 50% → पांचवें वर्ष तक 75%।
• मेकैनाइज्ड फर्टिलाइजर डीप प्लेसमेंट (M-FDP): पहले वर्ष में 50 जिलों तक विस्तार → दूसरे वर्ष में 200 जिलों तक → पांचवें वर्ष में 500 जिलों तक।
• ऑर्गेनो-मिनरल उर्वरकः पहले वर्ष में 50 जिलों में विकेन्द्रीकृत उत्पादन → पांचवें वर्ष तक सभी जिलों में विस्तार।
• प्रिसीजन कृषि सलाह आधारित उर्वरक आवंटन: उर्वरक सब्सिडी प्राप्त करने वाले सभी क्षेत्रों में आईओटी और एआई आधारित कृषि परामर्श प्रणाली अनिवार्य की जाए।
रेगुलेटरी सुधारः ग्लॉकोनाइट को खनिज रियायत नियमों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाए, जिससे लगभग दो अरब टन भंडार के दोहन का मार्ग प्रशस्त होगा। उन्नत उर्वरक एफिशिएंसी के लिए गुणवत्ता मानक और प्रमाणन ढांचा बनाया जाए। गांव और जिला स्तर पर विकेंद्रीकृत उत्पादन इकाइयों के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रिया को सरल और तेज बनाया जाए।
किसान सहायता का इन्फ्रास्ट्रक्चरः सभी किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड उपलब्ध कराए जाएं, जिनमें एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के लिए कस्टमाइज्ड सलाह हों। हर साल 8आर पोषक तत्व प्रबंधन सिद्धांतों पर केंद्रित 50,000 से अधिक किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। रियल-टाइम सलाह, आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता और सब्सिडी पर निगरानी के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म बने। उन्नत उर्वरक एफिसिएंसी और ऑर्गेनो-मिनरल उर्वरकों को शीघ्र अपनाने वाले किसानों को विशेष प्रोत्साहन मिले।
आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षाः उर्वरकों का छह महीने का रणनीतिक बफर स्टॉक बनाया जाए। मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका पर केंद्रित आयात निर्भरता को कम करते हुए ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और मध्य एशिया से भी आयात किया जाए। कांडला, पारादीप और विशाखापत्तनम बंदरगाहों के इन्फ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड किया जाए। समुद्री, रेल और पाइपलाइन आधारित मल्टी-मोडल ट्रांसपोर्ट कॉरीडोर विकसित किए जाएं।
सफलता के महत्वपूर्ण कारक एवं जोखिम
सफलता दिलाने वाले कारक
टेक्नोलॉजी की तैयारीः अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्नत दक्षता उर्वरक (EEF) बनाने वालों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करना। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते करना। प्रोत्साहनों के माध्यम से घरेलू निर्माण क्षमता का विस्तार। किफायती प्रिसीजन कृषि प्लेटफॉर्म विकसित करना।
किसानों की भागीदारी: सब्सिडी सुधारों के औचित्य पर पारदर्शी संवाद। उत्पादकता वृद्धि प्रदर्शित करने वाले स्थान तैयार करना। सामुदायिक शिक्षण समूहों के माध्यम से किसानों के बीच जानकारी साझा करना। संक्रमण काल के दौरान लक्षित आय सहायता प्रदान करना।
राजनीतिक प्रतिबद्धता: स्पष्ट परफॉर्मेंस मेट्रिक्स के साथ कैबिनेट स्तरीय स्टीयरिंग कमेटी के माध्यम से निरंतर समन्वय सुनिश्चित करना।
राजकोषीय अनुशासन: अचानक बदलाव के बजाय चरणबद्ध कार्यान्वयन। बड़े पैमाने पर विस्तार से पहले पायलट परियोजनाओं का संचालन। पूरक आय सहायता कार्यक्रमों का प्रावधान। मध्यावधि समीक्षा और आवश्यक संशोधनों के साथ बजट आवंटन।
आपूर्ति में लचीलापन: संक्रमण अवधि के दौरान कम-से-कम 6 माह का रणनीतिक भंडार बनाए रखना। एकाधिक स्रोत और माध्यम वाले सप्लाई कॉरीडोर का विकास। रियल टाइम में सप्लाई चेन की निगरानी। संभावित व्यवधानों के लिए आकस्मिक योजना तैयार रखना।

तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता
भारत का उर्वरक क्षेत्र कई परस्पर जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है - 60% से अधिक आयात निर्भरता के कारण भू-राजनीतिक जोखिम, 1.86 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वार्षिक सब्सिडी का बोझ, बढ़ते उर्वरक उपयोग के बावजूद एफिसिएंसी में ठहराव तथा कृषि उत्पादकता को खतरे में डालने वाला मृदा क्षरण। ऐसे में 8आर-आधारित परिवर्तनकारी ढांचा कोई वैकल्पिक या आदर्शवादी दृष्टिकोण नहीं, बल्कि तकनीकी और आर्थिक रूप से आवश्यक, वित्तीय रूप से अनिवार्य, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तथा पर्यावरणीय दृष्टि से अपरिहार्य है।
इस परिवर्तन को लागू करने की महत्वपूर्ण समयावधि 2025-2027 है। यदि 12-18 महीने की भी देरी हुई तो अगली संभावित वैश्विक आपूर्ति बाधा के दौरान वित्तीय जोखिम बढ़ जाएंगे, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी अपनाने के अवसर चूक जाएंगे, मिट्टी का क्षरण तेज होगा और टिकाऊ कृषि में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त भी हम खो सकते हैं।
अगले 180 दिनों के लिए प्राथमिकता
• 8आर ढांचे को केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी दिलाना तथा पहले चरण के लिए बजट स्वीकृत करना।
• पोषक तत्व आधारित प्रोत्साहन ढांचे को अंतिम रूप देकर 100 जिलों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू करना।
• उन्नत दक्षता उर्वरक (ईईएफ) को अनिवार्य बनाने के लिए निर्देश जारी करना (यूरिया में कम से कम 25%)।
• ग्लॉकोनाइट को वर्गीकृत करने संबंधी संशोधन प्रस्ताव को अंतर-मंत्रालयी समिति के समक्ष प्रस्तुत करना।
• तीन माह के रणनीतिक उर्वरक भंडार के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना।
• ईईएफ के लिए आपूर्ति स्रोतों में विविधता सुनिश्चित करना तथा कम से कम 5 नए संयुक्त उपक्रम स्थापित करना।
• उर्वरक नवाचार केंद्र के लिए संचालन बोर्ड का गठन और कार्ययोजना तैयार करना।
• किसानों के लिए देशव्यापी जागरूकता अभियान शुरू करना।
यह परिवर्तन पूरी तरह संभव है। इसके लिए जो आवश्यक निवेश चाहिए, वह सब्सिडी में बचत तथा आयात निर्भरता कम होने से प्राप्त होने वाले रणनीतिक लाभों की तुलना में बहुत कम है। आवश्यक टेक्नोलॉजी पहले से उपलब्ध है, सिर्फ उन्हें नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है। कृषि में लचीलापन, वित्तीय स्थिरता तथा टिकाऊ पोषक तत्व प्रबंधन में वैश्विक नेतृत्व हासिल करने का मार्ग स्पष्ट है। अब आवश्यकता तत्काल प्रभावी क्रियान्वयन की है।
RNI No: DELBIL/2024/86754 Email: [email protected]