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सुपर अल नीनो: कमजोर मानसून से सूखे का खतरा

इस वर्ष दीर्घावधि औसत की तुलना में सिर्फ 90 प्रतिशत बारिश की संभावना, विकास दर भी प्रभावित होने की आशंका

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अजीत सिंह

इस साल अल नीनो प्रभाव के कारण कमजोर मानसून की आशंका है, जिससे 11 सालों में सबसे कम बारिश हो सकती है। इससे कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और महंगाई के साथ-साथ समूची अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

 

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 29 मई को जारी पूर्वानुमान में मानसून सीजन 2026 (जून-सितंबर) के दौरान देश में दीर्घावधि औसत (एलपीए) की तुलना में 90 फीसदी बारिश की संभावना जताई है। वर्ष 2015 के बाद यह देश में सबसे कम बारिश वाला मानसून साबित हो सकता है।

 

केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, जून के पहले सप्ताह में देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल क्षमता के 30 प्रतिशत से नीचे गिर गया है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के निर्धारित समय से तीन दिन की देरी से पहुंचने के साथ ही जलाशयों में पानी का स्तर पिछले वर्ष की तुलना में कम रहा, हालांकि यह पिछले 10 वर्षों के औसत स्तर से अधिक है।

 

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है और आने वाले महीनों में यह दुनिया के मौसम पैटर्न को काफी प्रभावित कर सकती है। इसके परिणामस्वरूप विश्व के विभिन्न हिस्सों में लू, सूखा, बाढ़ और अन्य चरम मौसम की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

 

पूर्वानुमानों के अनुसार, मानसून सीजन के शुरुआती महीनों में अल नीनो असर दिखाना शुरू करेगा, जिसके बाद इसका प्रभाव बढ़ेगा और नवंबर तक मजबूत अल नीनो की स्थिति बन सकती है। मई तक के अनुमानों के मुताबिक, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में असामान्य रूप से गर्म समुद्री सतह अल नीनो बनने को बढ़ावा दे रहा है।

 

क्या है अल नीनो?

 

अल नीनो (El Niño) एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का सतह सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इससे वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है और भारत सहित कई देशों में बारिश और तापमान पर असर पड़ता है। आम तौर पर अल नीनो की वजह से दक्षिण अमेरिका, पूर्वी अफ्रीका और अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों में अधिक बारिश और बाढ़ आती है जबकि मानसूनी वर्षा कम होने की वजह से दक्षिण एशिया, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में अधिक गर्मी और सूखे की स्थिति बनती है।

 

अल नीनो के प्रभाव से प्रशांत महासागर के भूमध्य रेखीय क्षेत्र में समुद्री सतह का तापमान औसत से 0.5 डिग्री सेल्सियस या अधिक बढ़ जाता है। मजबूत अल नीनो तब माना जाता है जब यह 1.5-2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो।

 

पूर्वानुमानों के अनुसार, जून से अगस्त के बीच अल नीनो प्रभाव विकसित होने की संभावना 80% है। इसके नवंबर तक बने रहने की संभावना 90% या उससे अधिक आंकी गई है। जून-अगस्त के दौरान दुनिया के अधिकतर हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।

 

कृषि और अर्थव्यवस्था पर असर

 

भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत हद तक मानसून पर निर्भर है, क्योंकि देश की लगभग 70 फीसदी सालाना बारिश मानसून से आती है। यही बारिश खेती, भूजल पुनर्भरण और जलाशयों को भरने का प्रमुख स्रोत है। देश की लगभग 50 फीसदी कृषि भूमि के लिए मानसून की बारिश ही सिंचाई का प्रमुख स्रोत है।

 

अल नीनो से दक्षिण अमेरिका, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिणी यूएस के कुछ हिस्सों में ज़्यादा बारिश और बाढ़ आती है जबकि ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में सूखे की स्थिति बनती है।

 

सामान्य से कम वर्षा की स्थिति में खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसे समय जब पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण उर्वरकों और ईंधन के दाम बढ़ रहे हैं, कमजोर मानसून कृषि क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। इससे खाद्य महंगाई बढ़ने और आर्थिक वृद्धि प्रभावित होने की आशंका है।

 

खरीफ की खेती मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, बाजरा, दालें और तिलहन जैसी फसलों की बुवाई जून से अगस्त के बीच होती है। यदि मानसून देर से आता है या बारिश कम होती है तो किसानों को बुवाई टालनी पड़ सकती है और उपज प्रभावित होने का खतरा है।

 

घटा जीडीपी और कृषि उत्पादन का अनुमान

 

अल नीनो प्रभाव और वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया है, जबकि जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है। आरबीआई ने कहा है कि वर्ष 2026-27 में भारतीय कृषि को अल नीनो के कारण कमजोर मानसून से नुकसान का खतरा है। हालांकि, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, बेहतर फसल प्रबंधन और तकनीकी प्रगति के चलते संभावित नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।

 

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने वर्ष 2026-27 के लिए खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य थोड़ा घटाकर 37.39 करोड़ टन निर्धारित किया है, जबकि वर्ष 2025-26 में 37.66 करोड़ टन के रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन का अनुमान है। मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश के अनुमान को देखते हुए चावल और मक्का उत्पादन के लक्ष्य को थोड़ा कम रखा गया है।

 

 

तैयारी में जुटी सरकार

 

कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए सरकारी स्तर पर बारिश में कमी से निपटने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। खरीफ सम्मेलन के दौरान केंद्रीय कृषि और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अल नीनो को लेकर घबराने की कोई जरूरत नहीं है। जैसी परिस्थिति होगी और जिस राज्य को जैसी आवश्यकता होगी, उसी के अनुसार हम कार्य करेंगे। प्रभावित जिलों के लिए आकस्मिक योजनाओं को लागू करने के निर्देश जारी किए गये हैं।

 

केंद्रीय कृषि मंत्री ने बताया कि किसानों को समय पर सहायता उपलब्ध कराने के लिए जरूरत से लगभग 11 प्रतिशत अधिक गुणवत्तायुक्त बीज उपलब्ध हैं तथा 1.74 लाख क्विंटल का राष्ट्रीय बीज भंडार भी तैयार किया गया है। उन्होंने एकीकृत खेती और दालों व तिलहन में आत्मनिर्भरता की अपील की।

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1 अप्रैल तक केंद्रीय पूल में गेहूं और चावल का स्टॉक बढ़कर 817.53 लाख टन हो गया, जो 210.40 लाख टन की जरूरी बफर लिमिट का लगभग तीन गुना है। साथ ही 43 लाख टन के रिकॉर्ड दलहन बफर स्टॉक की मदद से अल नीनो के खतरे से निपटने में मदद मिलेगी।

 


अजीत सिंह

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