भारत की उर्वरक दुविधा संकट से सामर्थ्य तक
1.86 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी, बढ़ती आयात निर्भरता और घटती मृदा उर्वरता के बीच भारत को उर्वरक नीति में बड़े बदलाव की जरूरत
यशपाल सिंह सहरावत
डॉ. पद्मा शांति जगदभि
बड़ी तस्वीर
भारत 1.4 अरब लोगों का पेट कैसे भरता है और यह व्यवस्था क्यों खतरे में है
आइए एक सरल सवाल से शुरुआत करें। जब पंजाब या बिहार का कोई किसान उर्वरक की दुकान पर जाता है, तो क्या खरीदता है? सबसे अधिक संभावना है कि वह यूरिया की बोरी खरीदेगा, क्योंकि उसे 45 किलोग्राम यूरिया की एक बोरी केवल 260-300 रुपये में मिल जाती है, जो वैश्विक कीमत का लगभग 22 प्रतिशत है। बाकी लागत सरकार वहन करती है।
यह व्यवस्था दशकों से काम कर रही है। भारत का खाद्यान्न उत्पादन 1950-51 के 5.1 करोड़ टन से बढ़कर आज 37.7 करोड़ टन हो गया है। आज हम 1.4 अरब लोगों का पेट भर रहे हैं, जो छोटी उपलब्धि नहीं है। लेकिन समस्या यह है कि यूरिया की इस सस्ती बोरी की एक छिपी हुई कीमत भी है, जो हर साल बढ़ रही है।
पंजाब के किसान गुरप्रीत सिंह से मिलिए। उनके पास 5 एकड़ भूमि है जिसमें वे धान तथा गेहूं की खेती करते हैं। हर सीजन में वे कृषि वैज्ञानिकों की अनुशंसित मात्रा से 20-40 प्रतिशत अधिक यूरिया प्रयोग करते हैं, क्योंकि यह सस्ता और सुलभ है तथा उनके पिता भी यही करते थे।
“जब यूरिया इतनी सस्ती है, तो मैं इसका अधिक उपयोग क्यों न करूं? अधिक यूरिया का मतलब अधिक फसल है, है ना?” - गुरप्रीत की यह सोच लाखों किसानों की सोच को दर्शाती है।
लेकिन वैज्ञानिक इस धारणा को गलत बताते हैं। भारत में नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) केवल 30-35 प्रतिशत है, जो दुनिया में सबसे कम स्तरों में एक है। इसका अर्थ है कि नाइट्रोजन उर्वरकों पर खर्च किए गए हर रुपये का लगभग दो-तिहाई हिस्सा बर्बाद हो जाता है। यह फसल को पोषण नहीं देता, जल और वायु को प्रदूषित करता है तथा मिट्टी को नुकसान पहुंचाता है।
भारत उर्वरकों पर कितना खर्च करता है?
सरकार का कुल उर्वरक सब्सिडी बिल हर वर्ष 1.86 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। इसे समझने के लिए एक तुलना करें: टिकाऊ कृषि पर सरकार जितने 1,000 रुपये खर्च करती है, उसके मुकाबले उर्वरक सब्सिडी पर लगभग 1,00,000 रुपये खर्च होते हैं।
अदृश्य संकटः भारत अपनी पोटाश जरूरत का 100 प्रतिशत, फॉस्फेट का 60 प्रतिशत और नाइट्रोजन का लगभग 20 प्रतिशत आयात करता है, चाहे वह तैयार उत्पादों के रूप में हो या कच्चे माल के रूप में। इस आयात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया के संकरे समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है। यदि यह मार्ग अवरुद्ध हो जाए तो क्या होगा?
सिर्फ छह महीने का व्यवधान भी:
• किसानों को उर्वरकों के सीमित उपयोग के लिए मजबूर कर सकता है।
• खाद्य कीमतें तेजी से बढ़ा सकता है।
• सरकार पर आपातकालीन सब्सिडी के रूप में अतिरिक्त 40,000-60,000 करोड़ रुपये का बोझ डाल सकता है।
• खाद्य आत्मनिर्भरता हासिल करने में दशकों की उपलब्धियों पर पानी फेर सकता है।
यह कोई डराने वाली कल्पना नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण उत्पन्न 2022 का वैश्विक उर्वरक संकट एक स्पष्ट चेतावनी थी। भारत उस संकट से केवल इसलिए उबर पाया क्योंकि उसके पास पहले से पर्याप्त भंडार उपलब्ध थे।
सस्ते उर्वरक की असली कीमतः हरियाणा की सावित्री देवी से मिलिए। वे पिछले 20 वर्षों से 3 एकड़ जमीन पर खेती कर रही हैं और धान तथा गेहूं उगाती हैं। वर्षों तक उन्होंने वही पारंपरिक तरीका अपनाया - रोपाई के बाद एक बोरी यूरिया, एक महीने बाद दूसरी और यदि फसल पीली दिखाई दे तो तीसरी बोरी। पिछले साल उन्होंने एक अजीब बदलाव देखा। उनकी मिट्टी सख्त होती जा रही थी। बोरवेल से निकलने वाले पानी का स्वाद खारा लगने लगा था। फसल भी पहले की तरह नहीं थी। वे अकेली नहीं हैं।
भारत की मिट्टी के साथ क्या हो रहा है? भारत की मिट्टी में नाइट्रोजन की अधिकता 1960 के दशक में 17 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर अब 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से अधिक हो गई है। पंजाब में ऑर्गेनिक कार्बन, जो उपजाऊ मिट्टी का आधार है, घटकर 0.3-0.4 प्रतिशत रह गया है, जबकि भारत का औसत 0.47 प्रतिशत है। भूजल में नाइट्रेट का स्तर 1975 से लगातार बढ़ रहा है। पंजाब में डाले गए नाइट्रोजन का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा भूजल में पहुंच जाता है।
इसका मतलब क्या है? आज किसान समान उपज प्राप्त करने के लिए पहले की तुलना में अधिक उर्वरक प्रयोग कर रहे हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी मरीज को पहले वाली दवा का असर कम होने पर उसकी खुराक लगातार बढ़ानी पड़े। लेकिन यह “दवा” मिट्टी और पानी दोनों को नुकसान पहुंचा रही है।
पोषक तत्वों का असंतुलनः भारत विचित्र समस्या का सामना कर रहा है। यूरिया (नाइट्रोजन) पर भारी सब्सिडी दी जाती है और किसानों को इसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत का 22 प्रतिशत चुकाना पड़ता है। इसके विपरीत फॉस्फेट (DAP) और पोटाश (MOP) पर अपेक्षाकृत कम सब्सिडी है, इसलिए किसानों को इनकी बाजार कीमत का क्रमशः 71 प्रतिशत और 73 प्रतिशत भुगतान करना पड़ता है।
ऐसे में किसान क्या करते हैं? सस्ता होने के कारण वे यूरिया अधिक खरीदते हैं और महंगे होने के कारण डीएपी तथा एमओपी का उपयोग कम कर देते हैं। परिणामस्वरूप पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तेलंगाना में किसान अनुशंसित मात्रा से 50-70 प्रतिशत अधिक नाइट्रोजन का प्रयोग कर रहे हैं। वहीं, फॉस्फेट और पोटाश का उपयोग कम किया जा रहा है।
इसे ऐसे समझिए: कल्पना कीजिए कि आपका भोजन केवल चावल तक सीमित हो जाए, वह भी भरपूर मात्रा में, लेकिन आप सब्जियां, दाल और दूध लेना बंद कर दें। कुछ समय बाद आपका स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा। भारत की मिट्टी के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।
यह छोटे किसानों को क्यों अधिक प्रभावित करता है? भारत में उपयोग होने वाले कुल उर्वरकों का 53 प्रतिशत से अधिक हिस्सा 2 हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसान इस्तेमाल करते हैं। यही किसान आर्थिक रूप से सबसे कमजोर वर्ग में आते हैं। वे अपनी आय का बड़ा हिस्सा उर्वरकों पर खर्च करते हैं। जब उपज घटती है और खेती की लागत बढ़ती है, तो सबसे पहले उन्हीं पर दबाव पड़ता है।
सपकोटा और बिजय सिंह (2025) के अनुसार, “प्रति हेक्टेयर उर्वरक उपयोग में 46 किलोग्राम की वृद्धि ग्रामीण गरीबी को 6 प्रतिशत तक कम करती है।” लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही सच है। यदि उर्वरकों की कीमतें बढ़ती हैं और किसानों को कोई व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो लाखों छोटे किसान और अधिक गरीबी में जा सकते हैं।
समाधान: स्मार्ट खेती
4आर से 8आरः उर्वरक प्रबंधन का नया तरीका
वर्षों से विशेषज्ञ उर्वरकों के 4आर सिद्धांत की बात करते रहे हैं: सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान। यह सलाह अच्छी है, लेकिन पर्याप्त नहीं। भारत को 8आर सिस्टम्स अप्रोच अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें निम्नलिखित चार अतिरिक्त आयाम शामिल हों:
रीसाइकलः फसल अवशेष, शहरी और ग्रामीण जैविक कचरा, गोबर और शहरों के ठोस कचरे को भी पौधों के पोषक तत्वों में बदलना।
रीबिल्ड: केवल फसल को पोषण देने के बजाय मिट्टी के स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करना।
रिकॉर्ड: डिजिटल उपकरणों से यह दर्ज करना कि प्रत्येक खेत को वास्तव में कितने और किस प्रकार के पोषक तत्वों की आवश्यकता है।
रेजिलिएंटः ऐसी आपूर्ति श्रृंखलाएं विकसित करना जो वैश्विक संकटों और भू-राजनीतिक झटकों का सामना कर सकें।
आइए देखें, क्या काम करता है
केस स्टडी 1: मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) मॉडल
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में पायलट परियोजना के तहत एक छोटी इकाई स्थापित की गई, जो भारत के विभिन्न राज्यों की जरूरतों के अनुसार काम करती है। यह इकाई निम्नलिखित सामग्री एकत्रित करती है:
• गन्ने की खोई (शुगर मिल और डिस्टिलरी से निकलने वाला अवशेष)
• स्पेंट वॉश (डिस्टिलरी का अपशिष्ट)
• स्थानीय रासायनिक उर्वरक, जैविक स्रोत
यह इकाई इन अपशिष्ट पदार्थों को मानकीकृत ऑर्गेनो मिनरल उर्वरक में बदलती है, जिसकी कीमत आयातित डीएपी की तुलना में 20-30 प्रतिशत कम होती है।
परिणाम क्या रहे? इस उर्वरक का उपयोग करने वाले किसानों ने अम्लीय मिट्टी में 12-15 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त होने की सूचना दी। किसानों की उत्पादन लागत में कमी आई। गांवों की वायु गुणवत्ता बेहतर हुई क्योंकि किसानों ने फसल अवशेष जलाना बंद कर दिया। सवाल है कि यदि यह मॉडल सफल है, तो पूरे भारत में ऐसी 500 इकाइयां क्यों नहीं स्थापित की जा सकतीं?
केस स्टडी 2: अगर यूरिया पौधों की जड़ों तक पहुंचे तो क्या होगा?
भारत में अधिकांश किसान यूरिया का छिड़काव करते हैं, यानी उसे खेत की सतह पर बिखेर देते हैं। उसका लगभग 40-50 प्रतिशत हिस्सा कभी पौधों की जड़ों तक नहीं पहुंच पाता। वह या तो हवा में उड़कर नष्ट हो जाता है या फिर बहकर भूजल में मिल जाता है।
मशीन से उर्वरक को गहरे में डालने (M-FDP) की तकनीक उर्वरक को छोटे-छोटे ब्रिकेट्स के रूप में मिट्टी में 7-10 सेंटीमीटर की गहराई पर, सीधे पौधों की जड़ों के पास स्थापित करती है। इसके उदाहरण हरियाणा के करनाल, असम और ओडिशा में देखे जा सकते हैं।
इसका लाभ क्या है? किसानों को समान उपज प्राप्त करने के लिए 20-30 प्रतिशत कम उर्वरक की आवश्यकता पड़ती है। इससे प्रति हेक्टेयर लगभग 20,000-30,000 रुपये की बचत हो सकती है। पांच एकड़ भूमि वाले किसान के लिए यह एक महत्वपूर्ण बचत है।
केस स्टडी 3: कर्नाटक में प्रिसीजन फार्मिंग
बेंगलुरु के निकट 50 किसानों के एक समूह ने मोबाइल ऐप से जुड़े इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित मृदा सेंसर अपनाए। यह ऐप किसानों को सटीक जानकारी देता है कि कितनी मात्रा में और किस समय उर्वरक का उपयोग करना चाहिए। परिणामस्वरूप उपज में 18-22 प्रतिशत की वृद्धि हुई और उर्वरक लागत में 25 प्रतिशत की कमी आई। मोबाइल फोन बता देता है कि क्या करना है।
चुनौती क्या है? इस तकनीक के लिए आवश्यक हार्डवेयर की लागत 15,000-20,000 रुपये प्रति हेक्टेयर है। इसके अलावा, ग्रामीण भारत में अब भी विश्वसनीय इंटरनेट कनेक्टिविटी हर जगह उपलब्ध नहीं है।

खेती को बदलने वाली सरकारी योजनाएं
नमो ड्रोन दीदी योजना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 30 नवंबर 2023 को शुरू की गई नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को ड्रोन पायलट के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है, ताकि वे सटीक कृषि में योगदान दे सकें। कल्पना कीजिए कि एक ड्रोन गेहूं के खेत के ऊपर उड़ता है, तस्वीरें लेता है और कुछ ही मिनटों में किसान को बता देता है कि खेत के किन हिस्सों में अधिक उर्वरक की जरूरत है और किन हिस्सों में कम। इसके बाद वही ड्रोन ठीक उतनी ही मात्रा में उर्वरक या अन्य कृषि इनपुट का छिड़काव करता है, जिससे न तो संसाधनों की बर्बादी होती है और न ही पोषक तत्वों का बहाव। यदि योजना को मृदा स्वास्थ्य कार्ड और पोषक तत्व प्रबंधन के साथ प्रभावी ढंग से जोड़ा जाए, तो उर्वरकों के सटीक उपयोग का मजबूत आधार बन सकता है।
पीएम-प्रणाम
पीएम-प्रणाम उन राज्यों को प्रोत्साहन देता है जो रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाते हैं। यदि कोई राज्य यूरिया खपत में 10 प्रतिशत कमी करता है, तो उर्वरक सब्सिडी में हुई बचत की राशि उसी राज्य को वापस दी जाती है। इस राशि का उपयोग कम्पोस्ट इकाइयों की स्थापना, जैव उर्वरकों के उत्पादन, किसानों के प्रशिक्षण तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने जैसे वैकल्पिक उपायों के लिए किया जा सकता है।
चुनौती क्या है? इस योजना को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। वर्तमान में इसके तहत मिलने वाले प्रोत्साहन अपेक्षाकृत सीमित हैं। राज्यों को अधिक मजबूत वित्तीय प्रोत्साहन देने होंगे, जिन्हें मृदा स्वास्थ्य में मापने योग्य सुधारों से जोड़ा जा सके।
सॉयल हेल्थ कार्ड योजना
फरवरी 2015 से सरकार किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड उपलब्ध करा रही है। यह प्रत्येक खेत के लिए एक प्रकार की स्वास्थ्य रिपोर्ट है। अब तक देश में 20 करोड़ से अधिक कार्ड वितरित किए जा चुके हैं। हालांकि कई किसानों को कार्ड तो मिल जाता है, लेकिन वे उसमें दी गई जानकारी को समझ नहीं पाते। कई बार मिट्टी के नमूने वैज्ञानिक तरीके से नहीं लिए जाते। प्रयोगशालाओं पर अत्यधिक कार्यभार रहता है।
समाधान क्या? प्रत्येक मृदा स्वास्थ्य कार्ड को एक मोबाइल ऐप (जैसे IFDC के “स्पेस टू प्लेस” अप्रोच) से जोड़ा जाए, जो किसानों को सरल भाषा में सलाह दे सके।
विस्तार (VISTAAR) और एग्रीस्टैक
विस्तार और एग्रीस्टैक भारत के डिजिटल कृषि प्लेटफॉर्म हैं। इनकी परिकल्पना यह है कि प्रत्येक किसान को उसकी भूमि, मृदा स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों और मौसम संबंधी जानकारी से जुड़ी एक डिजिटल आईडी प्रदान की जाए। जब किसी किसान को उर्वरक की आवश्यकता हो, तो यह प्रणाली उसकी भूमि और फसल की जरूरत के अनुसार सटीक उर्वरक मिश्रण की सिफारिश करे और सब्सिडी सीधे उसके बैंक खाते में पहुंचे।
प्राकृतिक खेती और जैविक उर्वरकों को बढ़ावाः भारत शून्य बजट प्राकृतिक खेती जैसी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दे रहा है। लेकिन रासायनिक उर्वरकों से जैविक विकल्पों की ओर बदलाव आसान नहीं है। किसानों को वैज्ञानिक रूप से परीक्षण किए गए ऐसे उत्पादों की आवश्यकता है जो वास्तव में प्रभावी हों।
ऑर्गेनो-मिनरल उर्वरकः ये जैविक अपशिष्ट और खनिज पोषक तत्वों का मिश्रण होते हैं और संतुलित समाधान प्रदान करते हैं। ये मृदा स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करने के साथ फसलों को आवश्यक पोषक तत्व भी उपलब्ध कराते हैं। ये प्रभावी हैं और आयातित उर्वरकों की तुलना में कम खर्चीले भी हैं।
प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT)
वर्तमान व्यवस्था: सरकार मुख्य रूप से यूरिया जैसे उर्वरकों पर सब्सिडी देती है। यह सब्सिडी उत्पादों, उपभोक्ताओं और उर्वरक कंपनियों तक पहुंचती है, न कि सीधे किसानों तक।
भविष्य की व्यवस्था: सब्सिडी सीधे किसानों को उनकी मिट्टी की वास्तविक जरूरतों के आधार पर मिलनी चाहिए। यदि किसी किसान की मृदा जांच रिपोर्ट में पोटाश की कमी दिखाई देती है, तो सब्सिडी उसे अधिक यूरिया खरीदने के बजाय पोटाश खरीदने के लिए प्रोत्साहित करे।
जलवायु, कार्बन और आय
पृथ्वी को बचाकर किसान कैसे कर सकते हैं अतिरिक्त कमाई
हरियाणा के किसान विकास का उदाहरण लें। वे संरक्षण कृषि और पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को अपनाते हैं। इन तकनीकों में फसल अवशेषों को खेत की सतह पर रखा जाता है, जिससे पौधों को धीरे-धीरे पोषक तत्व मिलते हैं, मृदा स्वास्थ्य सुधरता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम होता है। इससे उनके खेत में नमी अधिक समय तक बनी रहती है, उर्वरकों की आवश्यकता 20 प्रतिशत तक घट जाती है और कार्बन लंबे समय तक मिट्टी में संग्रहित रहता है। कार्बन खेती के माध्यम से विकास जैसे किसान अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजारों से प्रति हेक्टेयर 5,000 से 10,000 रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं।
ग्रीन बॉन्ड: बदलाव के लिए वित्तपोषण
भारत को ये इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की आवश्यकता है: बायोचार संयंत्र, जो फसल अवशेषों को कार्बन-संग्रहित उर्वरक में परिवर्तित करें। ऑर्गेनो-मिनरल उर्वरक इकाइयां, जो शहरी और कृषि अपशिष्ट का प्रसंस्करण करें। बंदरगाहों और आंतरिक क्षेत्रों में रणनीतिक उर्वरक भंडार। ग्रीन बॉन्ड, यानी ऐसे निवेशकों से प्राप्त धनराशि जो जलवायु अनुकूल परियोजनाओं में निवेश करना चाहते हैं, इनके निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय जलवायु कोष और पर्यावरण, सामाजिक एवं प्रशासनिक मानकों को महत्व देने वाले निवेशक भी ऐसी परियोजनाओं में निवेश करने के लिए उत्सुक हैं।
बड़ी मांग: सब्सिडी राशि का 5% इनोवेशन के लिए दिया जाए
एक सरल गणितीय समाधान
भारत हर वर्ष उर्वरक सब्सिडी पर 1.86 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है। इस राशि का अधिकांश हिस्सा यूरिया, डीएपी और एमओपी जैसे लगभग एक सदी पुराने उर्वरकों पर खर्च होता है, जिनमें दशकों से कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। भारत सरकार को इस राशि का मात्र 5 प्रतिशत, यानी लगभग 7,500-9,000 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष, एक नए राष्ट्रीय उर्वरक नवाचार एवं दक्षता कोष के लिए आवंटित करना चाहिए।
यह धन कहां खर्च किया जाए
• विश्वस्तरीय उर्वरक नवाचार केंद्र की स्थापना, जो अगली पीढ़ी के उर्वरकों का विकास करे - जैसे धीमी गति से पोषक तत्व छोड़ने वाले, कोटेड, बायोडिग्रेडेबल, आंशिक रूप से अम्लीकृत, नैनो, जैव-आधारित तथा मिट्टी के अनुरूप तैयार उर्वरक।
• विभिन्न जिलों में 500 से अधिक स्थानीय ऑर्गेनो मिनरल इकाइयों की स्थापना, जो गांवों के अपशिष्ट को संपदा में बदलें तथा शहरी जैविक कचरे को पोषक तत्व आधारित उत्पादों के रूप में लाएं।
• प्रिसीजन कृषि तकनीकों को बढ़ावा - जैसे ड्रोन, मृदा सेंसर, मोबाइल एप्लिकेशन और “स्पेस टू प्लेस” अप्रोच - जिन्हें नमो ड्रोन दीदी और सॉयल हेल्थ कार्ड से जोड़ा जाए।
• विस्तार और एग्रीस्टैक के माध्यम से 10 करोड़ युवाओं, महिलाओं और किसानों को स्मार्ट उर्वरक उपयोग एवं पोषक तत्व प्रबंधन का प्रशिक्षण देना।
• कार्बन फार्मिंग प्रमाणन प्रणाली विकसित करना, ताकि मिट्टी की गुणवत्ता और कार्बन भंडारण क्षमता बढ़ाने वाले किसानों को आर्थिक लाभ मिल सके।
• संयुक्त उपक्रमों के माध्यम से उन्नत दक्षता वाले उर्वरकों (EEF) के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देना, जिससे आयात निर्भरता कम हो और कृषि उत्पादकता बढ़े।
अब क्या किया जाना चाहिए
12 महीने की कार्ययोजना
2. 50 स्थानीय उर्वरक इकाइयों को कॉन्सेप्ट के तौर पर शुरू करें: प्रत्येक इकाई स्थानीय जैविक और कृषि अपशिष्ट को उपयोगी उर्वरकों में परिवर्तित करे।
3. सॉयल हेल्थ कार्ड को उपयोगी बनाएं: हर मृदा स्वास्थ्य कार्ड को ऐसे मोबाइल ऐप से जोड़ें जो किसान की स्थानीय भाषा में जानकारी दे। इसे विस्तार और एग्रीस्टैक से जोड़कर प्रत्येक किसान को व्यक्तिगत कृषि सलाह उपलब्ध कराई जाए।
4. उर्वरक सब्सिडी का 5% इनोवेशन के लिए दें: पांच साल बाद नहीं, अभी से।
5. ग्रीन बॉन्ड जारी करें: पुनर्योजी कृषि, बायोचार संयंत्रों, कम्पोस्टिंग सुविधाओं और रणनीतिक उर्वरक भंडारों के निर्माण के लिए ग्रीन बॉन्ड जारी किए जाएं।
6. 100 जिलों में डीबीटी आधारित उर्वरक सब्सिडी का परीक्षण करें: उर्वरक उत्पादों पर सब्सिडी देने के बजाय किसानों के बैंक खाते में सीधे धनराशि दी जाए।
7. नमो ड्रोन दीदी कार्यक्रम का विस्तार करें: महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा संचालित प्रत्येक ड्रोन को सटीक उर्वरक प्रबंधन उपकरण के रूप में भी विकसित किया जाए।
8. पीएम-प्रणाम को अधिक प्रभावी बनाएं: राज्यों को मिलने वाले प्रोत्साहनों को मृदा स्वास्थ्य में मापने योग्य सुधारों से जोड़ा जाए और बाद में इसे भारत सॉयल हेल्थ पॉलिसी मैट्रिक्स से भी जोड़ा जाए।
9. कार्बन फार्मिंग पायलट परियोजनाएं शुरू करें: मिट्टी में कार्बन भंडारण बढ़ाने वाले किसानों को भुगतान किया जाए और अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजारों से जोड़ा जाए।
दस साल का विजन
आज की स्थितिः भारत फॉस्फेट की 60 प्रतिशत और पोटाश की 100 प्रतिशत आवश्यकता आयात से पूरी करता है। लेकिन प्रयुक्त नाइट्रोजन का लगभग दो-तिहाई हिस्सा बर्बाद हो जाता है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता लगातार गिर रही है, जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं और किसान बढ़ती उत्पादन लागत के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं।
वर्ष 2035 की परिकल्पनाः भारत अपने संसाधनों से उर्वरक उत्पादन करेगा। किसान भी ड्रोन, सेंसर और मोबाइल ऐप जैसे स्मार्ट उपकरणों का उपयोग कर उतनी ही मात्रा में पोषक तत्वों का प्रयोग करेंगे जितनी आवश्यक होगी। मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरेगा, भूमि में कार्बन भंडारण बढ़ेगा और किसानों की आय में निरंतर वृद्धि होगी।
हर भारतीय के लिए संदेशः अगली बार जब आप रोटी या चावल खाएं, तो याद रखें कि वह अनाज ऐसे उर्वरकों की मदद से उगाया गया है जिसकी कीमत देश ने केवल धन के रूप में नहीं चुकाई है। उसकी कीमत हमारे भूजल की गुणवत्ता ने चुकाई है। उसकी कीमत हमारी मिट्टी के स्वास्थ्य ने चुकाई है। उसकी कीमत हमारी रणनीतिक आत्मनिर्भरता ने चुकाई है।
लेकिन स्थिति को बदला जा सकता है। भारत अपनी मिट्टी को पुनर्जीवित करते हुए भी स्वयं का पेट भर सकता है। भारत आयात पर निर्भरता घटाते हुए भी अपने किसानों की मदद कर सकता है। भारत अधिक उत्पादन करते हुए भी प्रदूषण कम कर सकता है।
दिशा स्पष्ट है। अवसर बड़े हैं। अब बस कार्रवाई करने का समय है।
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