भारत की गन्ना नीति में बदलाव की दरकार
गन्ना क्षेत्र पर राष्ट्रीय परामर्श में केंद्रीय कृषि मंत्री ने एक समर्पित आईसीएआर टीम गठन की घोषणा की, जबकि विशेषज्ञों और उद्योग जगत ने पंचवर्षीय दृष्टिकोण का सुझाव दिया
अजीत सिंह
भारत का गन्ना क्षेत्र ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां दीर्घकालिक चुनौतियां तो हैं ही, अनूठे अवसर भी हैं। गन्ना क्षेत्र पर आयोजित राष्ट्रीय परामर्श में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के भीतर एक लक्षित अनुसंधान पहल की घोषणा की। रूरल वॉयस, नेशलन फेडरेशन ऑफ कोआपरेटिव शुगर फैक्टरीज लिमिटेड और आईसीएआर द्वारा 30 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय परामर्श के दौरान की गई यह घोषणा किसानों और उद्योग के लाभ के लिए व्यावहारिक समस्या समाधान की दिशा में अहम साबित हो सकती है।
चौहान इस क्षेत्र की समस्याओं से भी वाकिफ थे- वैरायटी 0238 में शर्करा की मात्रा तो बढ़ी, लेकिन यह किस्म रेड रॉट रोग के प्रति संवेदनशील हो गई है। एकल फसल को बढ़ावा देने से कीटों और मृदा क्षरण का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने उत्पादन, मशीनीकरण, चीनी की रिकवरी, लागत में कमी और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग पर ध्यान केंद्रित करते हुए, वैकल्पिक किस्में विकसित करने और उभरते खतरों को नियंत्रित करने के समानांतर प्रयासों की वकालत की। मंत्री ने भुगतान में देरी को लेकर किसानों की शिकायतों को स्वीकार किया और भारत के कृषि भविष्य में गन्ने को उत्प्रेरक बनाने के लिए सुधारों का आह्वान किया।
इस अवसर पर आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने राष्ट्रीय एजेंडे को चार हिस्से में विभाजित कियाः प्राथमिकताओं का निर्धारण, विकास के मुद्दों का समाधान, उद्योग संबंधी समस्याओं का निराकरण और कार्यान्वयन योग्य नीतियां तैयार करना। उन्होंने पानी और उर्वरकों के अधिक इस्तेमाल, एकल-फसल के प्रति संवेदनशीलता और फसल विविधीकरण की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
खेत से आवाजः किसानों ने बताई हकीकत
राष्ट्रीय परामर्श में किसानों की आवाज को प्रमुखता देते हुए उनकी चिंताओं और व्यावहारिक सुझावों को सामने रखा गया। विभिन्न राज्यों के प्रगतिशील किसानों ने गन्ने में रोग लगने, बढ़ती लागत और श्रमिकों की कमी का मुद्दा उठाया। किसानों ने सरकार और शोध संस्थानों से अधिक उपज वाली तथा रोग-प्रतिरोधी किस्मों के विकास पर ध्यान केंद्रित करने, बीजों का शीघ्र वितरण सुनिश्चित करने और छोटी जोत के किसानों को मशीनीकरण में सहायता प्रदान करने का आग्रह किया। उन्होंने सब्सिडी प्रक्रिया में निहित खामियों, लक्षित अनुदानों की कमी और शोध के दावों व जमीनी प्रदर्शन के बीच अंतर की आलोचना की।
उत्तर प्रदेश के उमेश कुमार ने किसानों की चिंताओं को व्यक्त करते हुए कहा, "बढ़ती महंगाई ने गन्ने की खेती को कम व्यवहार्य बना दिया है, इसका रकबा कम हुआ है और कृषि आय अब ग्रामीण रोजगार योजनाओं से होने वाली आय से भी पीछे रह गई है। मशीनीकरण, विशेष रूप से छोटे हार्वेस्टर, एक बड़ी आवश्यकता के रूप में उभरे हैं। लागत में कमी, श्रमिकों की कम मांग और अधिक उत्पादकता ही किसानों की किस्मत को बदल सकती है।" उन्होंने ट्रेंच विधि और इंटरक्रॉपिंग, विशेष रूप से मूंगफली को उपज बढ़ाने और रोग प्रतिरोध में सहायक बताया।
उद्योग: दबाव में वैल्यू चेन
उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने व्यापक संरचनात्मक और तकनीकी चुनौतियों पर प्रकाश डाला। इस्मा के डायरेक्टर जनरल दीपक बल्लानी ने चीनी और इथेनॉल का उत्पादन बढ़ाने के लिए नई किस्मों के तेजी से विकास, टिशू कल्चर के उपयोग और एआई का लाभउठाने की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने इनोवेशन को बढ़ावा देने, ब्यूरोक्रेसी कम करने और नीतियों को जमीनी हकीकत से जोड़ने के लिए एक राष्ट्रीय गन्ना विकास बोर्ड की स्थापना का सुझाव दिया।
डीसीएम श्रीराम लिमिटेड के सीईओ और ईडी (शुगर डिविजन) रोशन लाल टमक ने वैज्ञानिक अनुमानों और खेतों के परिणामों के बीच लगातार विसंगतियों की ओर इशारा किया। उन्होंने अधिक सहभागी शोध, किस्में जारी करने में तेजी लाने और छोटे हार्वेस्टर विकसित करने की वकालत की। जलवायु अनुकूलन का आह्वान करते हुए उन्होंने टिश्यू कल्चर तथा बीज प्रौद्योगिकी परियोजनाओं से बदलती क्षेत्रीय परिस्थितियों के साथ तालमेल बनाए रखने का आग्रह किया।
रेणुका शुगर्स लिमिटेड के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन अतुल चतुर्वेदी ने चीनी मिलों में घटते परिचालन दिवस और गन्ने की ऊंची कीमतों के बावजूद इथेनॉल की कीमतों में गिरावट का मुद्दा रखा। उन्होंने ऐसी नीतियों की आवश्यकता बताई जो वास्तव में किसानों और इंडस्ट्री, दोनों का समर्थन करें। उन्होंने इथेनॉल खरीद में व्याप्त विसंगतियों पर प्रकाश डाला, जहां अनाज वाले इथेनॉल की कीमत गन्ने से बनने वाले इथेनॉल से ज्यादा है। उन्होंने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के पुनर्मूल्यांकन का भी आह्वान किया और इथेनॉल की कीमतें बढ़ाने की मांग की। उन्होंने कहा, "अगर किसान का स्वास्थ्य अच्छा है, तो मिलों का स्वास्थ्य भी अच्छा होगा।"
विशेषज्ञों ने बताए जोखिम
परिचर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने वर्तमान गन्ना पद्धतियों के तकनीकी और वैज्ञानिक आधारों का विश्लेषण किया और नए समाधानों की रूपरेखा बताई। आईसीएआर के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. देवेंद्र कुमार यादव ने सीओ-0238 जैसी लोकप्रिय किस्मों से उत्पन्न एकल-फसल जोखिमों पर चर्चा की। उन्होंने इसके लाभ और नुकसान, दोनों के बारे में बताया और नई किस्मों के विकास की धीमी गति पर जोर दिया।
परिचर्चा में विविधीकरण एक आधारभूत रणनीति के रूप में उभरा। दलहन और तिलहन को गन्ने के साथ इंटर-क्रॉप के तहत उगाने पर पानी और उर्वरक का साझा उपयोग किया जा सकता है और किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है। उत्तर प्रदेश में मूंगफली की अंतर-फसलीय खेती से गन्ने की पैदावार में 10-12% की वृद्धि हुई, और नाइट्रोजन-फिक्सिंग फलियों से मिट्टी की उर्वरता में सुधार हुआ।
संसाधनों की दक्षता एक और बड़ी चिंता का विषय थी। वर्तमान प्रैक्टिस में भारी मात्रा में पानी और उर्वरकों की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म सिंचाई और एआई से संचालित मिट्टी की नमी की मैपिंग का महाराष्ट्र में परीक्षण किया गया है। इससे पानी की जरूरत काफी कम हो सकती है। उपग्रह चित्रों और सेंसर एनालिटिक्स का उपयोग करते हुए एआई द्वारा संचालित प्लेटफॉर्म पहले ही रोगों के प्रकोप की भविष्यवाणी करने, इनपुट लागत कम करने और उपज बढ़ाने में किसानों की मदद कर रहे हैं। ये इनोवेशन उपज में 40% तक की वृद्धि कर सकते हैं, श्रम में 40% तक की कटौती कर सकते हैं और पानी के उपयोग को आधा कर सकते हैं।
उन्नत मशीनरी की उपलब्धता के बावजूद गन्ने में मशीनीकरण का स्तर कम बना हुआ है। इसका मुख्य कारण छोटे आकार के खेत हैं। आईसीएआर के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग के डायरेक्टर डॉ. सी.आर. मेहता ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल और छोटे किसानों के लिए कम लागत वाली छोटी मशीनों की आवश्यकता पर बल दिया।
नीति और मूल्य निर्धारण
परामर्श के अंतिम सत्र में नीति, मूल्य निर्धारण और भुगतान संरचनाओं पर चर्चा की गई। एनएफसीएसएफ के प्रबंध निदेशक प्रकाश नाइकनवरे ने गन्ना मूल्य निर्धारण की जटिल, बहुस्तरीय प्रक्रिया की एक झलक दी। उन्होंने बताया कैसे यह श्रृंखला कृषि मंत्रालय से शुरू होकर सचिवों की समिति और अंतर-मंत्रालयी समूहों से होते हुए अंततः मंत्रियों के समूह तक पहुंचती है। मूल्य निर्धारण नोट का मसौदा तैयार करने से पहले राष्ट्रीय चीनी महासंघ और इस्मा के प्रतिनिधियों से परामर्श किया जाता है। हालांकि इतनी कवायदों के बाद भी बकाया भुगतान राशि इस वर्ष लगभग 6,500 करोड़ रुपये के ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। इसमें उत्तर प्रदेश का हिस्सा सबसे अधिक है।
इथेनॉल की समस्या से मूल्य निर्धारण पर दबाव और बढ़ गया है। इथेनॉल की कीमतें तीन साल से स्थिर हैं, जबकि गन्ने की कीमतें बढ़ रही हैं। तेल कंपनियां गन्ने से बनने वाले इथेनॉल की तुलना में अनाज आधारित इथेनॉल के लिए ज्यादा भुगतान कर रही हैं। इससे गन्ना आधारित इथेनॉल की व्यवहार्यता पर खतरा मंडरा रहा है। इंडियन पोटाश लिमिटेड के चीफ एग्रीकल्चर साइंटिस्ट डॉ. यू.एस. तेवतिया ने नीति निर्माताओं से आग्रह किया कि वे अपने फैसले जमीनी हकीकतों के आधार पर लें। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विकास किसान केंद्रित और व्यावहारिक होना चाहिए। इनोवेशन, चाहे मशीनरी में हों या नई किस्मों में, सिर्फ शोध पत्रिकाओं में नहीं, बल्कि वास्तविक कृषि परिवेश में भी खुद को साबित करना चाहिए।

परामर्श से निकली आगे की राह
कार्यक्रम का संचालन करते हुए रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह ने हितधारकों के बीच मजबूत संवाद और सहयोगात्मक कार्रवाई का आह्वान किया। किसान की समृद्धि, किसान संचालित शोध, व्यापक संस्थागत समर्थन और बेहतर तकनीक अपनाना ये परामर्श के परिणाम रहे। राष्ट्रीय परामर्श का यह रोडमैप बेहतर किस्में तैयार करने और मशीनीकरण से लेकर टिकाऊ फसल प्रणालियों और नई बाजार रणनीतियों तक समग्र परिवर्तन का मंच तैयार करता है।
यदि इन सुझावों को लागू किया जाए तो ये किसानों की शिकायतों का समाधान करेंगे, वैल्यू चेन का आधुनिकीकरण करेंगे और नीतियों को जमीनी जरूरतों के अनुरूप बनाएंगे जिससे आर्थिक विकास और ग्रामीण कल्याण दोनों को बढ़ावा मिलेगा। परामर्श की भावना एक नए लोकाचार को भी रेखांकित करती है: शोध किसान हिते में होने चाहिए, और नीति गतिशील तथा समावेशी होनी चाहिए। भारत के गन्ना क्षेत्र का भविष्य इसी पर निर्भर करता है।
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