बीज विधेयक, 2025 उम्मीदों के बीज और उपजे सवाल
बीज विधेयक, 2025 के मसौदे को लेकर देश के किसानों, वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के बीच क्यों छिड़ी बहस ?
अजीत सिंह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में कृषि से जुड़ा एक अहम कानून लाने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। यह कानून किसान और देश की खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे अहम कारक, बीज के लिए है। केंद्र सरकार 2020 में कृषि सुधारों के लिए तीन कृषि कानून लेकर आई थी, लेकिन किसानों के 13 माह के आंदोलन के बाद सरकार ने उन कानूनों को संसद में निरस्त कर दिया था जो एक तरह का पहला मामला था। लेकिन इस बार सरकार सधे कदमों से आगे बढ़ रही है। यही वजह है कि 12 नवंबर को नये बीज अधिनियम के मसौदे बीज विधेयक 2025 को जारी करने के साथ ही 11 दिसंबर तक इस विधेयक पर संबंधित पक्षों और नागरिकों की राय मांगी गई है। यह कानून बीज नियंत्रण कानून 1966 और बीज आदेश (नियंत्रण) 1983 का स्थान लेगा। बीज विधेयक का दायरा बढ़ाया गया है और उसमें फसलों के साथ ही बागवानी और तमाम तरह के प्लांटेशन मैटेरियल को भी शामिल किया गया है। साथ ही बीज और प्लांट मैटेरियल की गुणवत्ता और दावों को सुनिश्चित करने के लिए ट्रेसेबिलिटी पर जोर देने के साथ ही बीज कारोबार को आसान बनाने के लिए प्रावधान किये गये हैं। कानून को लेकर देश में मंथन जारी है और तमाम तरह की उम्मीदों और आशंकाओं को दूर करने के लिए सरकार को मौजूदा स्वरूप में बदलाव करने होंगे, इसके संकेत मिल रहे हैं।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान देश में अपने ताबड़तोड़ दौरों और किसानों व वैज्ञानिकों के साथ विमर्श में बार-बार कह रहे हैं कि बीज, उर्वरकों और कीटनाशकों की गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता है और उसके लिए कानूनी बदलाव किये जाएंगे। बीज विधेयक उनके इसी दावे की कड़ी के रूप में पहला बड़ा कदम दिख रहा है। कृषि मंत्रालय का दावा है कि बीज विधेयक, 2025 का मकसद बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, किसानों को किफायती दरों पर अच्छे बीज उपलब्ध कराना, नकली और घटिया बीजों की बिक्री पर अंकुश लगाना, नवाचार को बढ़ावा देना, बीज आयात को आसान बनाना, बीज आपूर्ति में पारदर्शिता व जवाबदेही लाना और किसानों के अधिकारों की रक्षा करना है।
रूरल वर्ल्ड ने बीज विधेयक के मसौदे को लेकर देश के सबसे प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों, कानूनविदों, किसान संगठनों के प्रतिनिधियों और बीज कारोबार से जुड़े उद्यमियों तथा उनके संगठनों के साथ लंबी बातचीत कर उनकी राय जानी। उसके आधार पर यह बात उभर रही है कि जहां समग्र रूप से बीज क्षेत्र के नियमन का खाका पेश किया गया है, वहीं विधेयक के प्रावधान कई तरह के सवाल भी खड़े कर रहे हैं। खासतौर पर "इज ऑफ डूइंग बिजनेस" यानी कारोबार में सुगमता पर जितना जोर दिया गया है उसको लेकर एक प्रतिष्ठित और अनुभवी नीति विशेषज्ञ ने रूरल वर्ल्ड को कहा कि इसे किसान हित और देश की खाद्य सुरक्षा को केंद्र में रखकर आगे बढ़ाया जाए तो बेहतर होगा। नए कानून में प्राइवेट सेक्टर को कई सहूलियतें और परीक्षण का अधिकार देने को कृषि में निजी क्षेत्र का दखल बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
व्यापक दायरा और अनुत्तरित सवाल
प्रस्तावित कानून का दायरा काफी समग्र बनाया गया है। नए कानून के तहत पूरी बीज सप्लाई चेन यानी बीज उत्पादक, प्रोसेसिंग यूनिट, डीलर, डिस्ट्रीब्यूटर और प्लांट नर्सरी का पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। किसी को भी नकली या फर्जी बीज बेचने की अनुमति नहीं होगी। फसलों के अलावा प्लांटेशन क्रॉप्स, फूल, मसाले, ट्यूबर्स, बल्ब और टिशू कल्चर जैसे तमाम बीज और प्लांट मैटेरियल को भी नए कानून में शामिल किया गया है। किसी भी किस्म के बीज या प्लांट मैटेरियल की बिक्री के लिए उसका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा। इसमें निर्यात और किसानों को छूट दी गई है।
ड्राफ्ट बिल में कुछ कमियां स्पष्ट हैं। बीज विधेयक 2025 में spurious और misbranded बीजों को परिभाषित तो किया गया है, लेकिन इसमें Counterfeit बीजों का जिक्र नहीं है। खराब बीजों की बिक्री पर अंकुश लगाने के लिए नकली, घटिया, अमानक या फर्जी बीजों को कानून के दायरे में लाने की आवश्यकता है।
इसी प्रकार, बीजों की परिभाषा के दायरे में औषधीय और सुगंधित पौधे शामिल नहीं हैं। प्लांट नर्सरी को भी विधेयक में परिभाषित नहीं किया गया है। साथ ही नई टेक्नोलॉजी पर आधारित ट्रांसजेनिक और जीनोम एडिटेड किस्में अभी कानून का हिस्सा नहीं हैं।
बीजों का पंजीकरण
नए कानून के तहत किसी भी किस्म के बीज या प्लांट मैटेरियल (कृषक और निर्यात बीजों को छोड़कर) की बिक्री के लिए पंजीकरण अनिवार्य होगा। पंजीकरण कराए बिना किसी बीज की बिक्री नहीं हो सकेगी। हालांकि, सीड एक्ट, 1966 के तहत नोटिफाई बीजों को रजिस्ट्रेशन से छूट दी गई है।
किसानों को पंजीकृत बीजों की बुवाई, बीज को सहेज कर रखने, आपस में आदान-प्रदान तथा बिक्री का अधिकार दिया गया है। लेकिन वह किसी ब्रांड के तहत इसकी बिक्री नहीं कर सकेंगे। साथ ही किसानों को किसी भी तरह की पेनल्टी से बाहर रखा गया है।
बीज रजिस्ट्रेशन का जिम्मा केंद्रीय स्तर पर बनी सेंट्रल सीड कमेटी का होगा। इसके तहत एक रजिस्ट्रेशन सब-कमेटी होगी जो कई जगहों पर किए जाने वाले (मल्टी-लोकेशनल) ट्रायल के आधार पर वैल्यू फॉर कल्टीवेशन एंड यूज (VCU) का आकलन कर बीज के रजिस्ट्रेशन की सिफारिश कर सकती है। राज्य स्तर पर स्टेट सीड कमेटी होगी जो राज्यों की बीज किस्मों के रजिस्ट्रेशन के लिए रजिस्ट्रेशन सब-कमेटी को सलाह देगी। मगर असली कंट्रोल केंद्रीय स्तर पर बनी सेंट्रल सीड कमेटी के पास रहेगा।
रजिस्ट्रेशन की दोहरी व्यवस्था
नए कानून के तहत पंजीकृत बीजों का एक राष्ट्रीय रजिस्टर बनेगा। वहीं प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटी एंड फार्मर्स राइट्स एक्ट (PPVFRA), 2021 के तहत बीज पंजीकरण के लिए पहले से एक राष्ट्रीय रजिस्टर बना हुआ है। PPVFR एक्ट के तहत भी पंजीकृत किस्मों के बीज उत्पादन और बिक्री का अधिकार मिलता है। इस तरह दो-दो कानूनों के तहत बीजों के पंजीकरण की दोहरी व्यवस्था बन जाएगी। इससे असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है।
पीपीवीएफआर एक्ट, 2021 के तहत विशिष्टता, एकरूपता और स्थिरता (DUS) के आधार पर बीजों का रजिस्ट्रेशन किया जाता है। जबकि बीज विधेयक, 2025 के तहत रजिस्ट्रेशन के लिए मल्टी-लोकेशनल ट्रायल के आधार पर वैल्यू ऑफ कल्टीवेशन एंड यूज (VCU) का मूल्यांकन अनिवार्य होगा। इस प्रकार दोहरी व्यवस्था काम करेगी, जिसमें VCU मूल्यांकन कराए बिना भी बीजों की बिक्री का रास्ता खुला होगा। किसानों के लिए बीज की वैल्यू ऑफ कल्टीवेशन एंड यूज (VCU) अधिक मायने रखती है। नए कानून को लागू करने से पहले इस दोहरी व्यवस्था के मामले को सुलझाना या इसमें स्पष्टता लाना जरूरी है।
बीजों का परीक्षण
सेंट्रल सीड कमेटी बीजों के ट्रायल और मूल्यांकन के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), सेंट्रल व स्टेट एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और अन्य संगठनों को अधिकृत कर सकती है। अन्य संगठनों के नाम पर प्राइवेट कंपनियों को बीजों के ट्रायल का जिम्मा मिल सकता है। यह बीज नियमन व्यवस्था में बड़ा बदलाव होगा, जिससे वैरायटी ट्रायल में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ेगी और आईसीएआर तथा कृषि विश्वविद्यालयों का दायरा सीमित होगा।
जर्मिनेशन, जेनेटिक प्योरिटी और अन्य बीज मानकों के लिए भारतीय बीज प्रमाणन मानकों का पालन करना होगा। बीजों के ट्रायल और वीसीयू मूल्यांकन के लिए केंद्र सरकार भारत से बाहर के किसी संगठन को भी मान्यता दे सकती है। देश में बीजों की बिक्री के लिए देश के बाहर हुए ट्रायल को मान्यता देना भी विवाद का मुद्दा बन सकता है।
बीज विधेयक में ट्रायल की कोई अवधि निर्धारित नहीं की गई है। हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि किसानों तक नई किस्मों के बीज पहुंचने में होने वाली देरी को कम करने के लिए तीन साल की ट्रायल अवधि को घटाकर दो साल किया जा सकता है।
निजी क्षेत्र की भूमिका
आल इंडिया को-आर्डिनेशन रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत आईसीएआर का एक ट्रायल सिस्टम है जिसमें आईसीएआर के संस्थान, केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्य कृषि विश्वविद्यालय शामिल हैं। ऐसे में प्राइवेट कंपनियों को बीजों के रजिस्ट्रेशन के लिए ट्रायल का अधिकार देने से बीज नियमन में निजी क्षेत्र का दखल बढ़ेगा। इसे बीजों पर प्राइवेट सेक्टर का कंट्रोल बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि, आईसीएआर सिस्टम में कई खामियां और संसाधनों की कमी जैसे समस्याएं हैं। लेकिन बीज ट्रायल का जिम्मा प्राइवेट कंपनियों को मिलने से हितों के टकराव और गुणवत्ता व विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस
प्रस्तावित बीज विधेयक में कई जगह ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के नाम पर प्राइवेट सेक्टर को सहूलियत देते हुए बीज नियमन में उनकी भूमिका बढ़ाने का रास्ता खोला गया है। बीज कारोबार को सुगम बनाने के मकसद से विभिन्न राज्यों में कार्यरत बीज कंपनियों के लिए एक सेंट्रल एक्रेडिटेशन सिस्टम बनाने का प्रस्ताव है। कहा जा रहा है कि इससे सीड सेक्टर में रिसर्च एंड डेवलपमेंट में उत्कृष्टता को प्रोत्साहन मिलेगा। इस सिस्टम के तहत केंद्र से मान्यता प्राप्त कंपनियों को स्टेट रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी को अपना प्रमाण-पत्र भेजना होगा और उनका रजिस्ट्रेशन हो जाएगा। इस तरह केंद्र से मान्यता प्राप्त बीज कंपनियां अलग-अलग राज्यों में अलग रजिस्ट्रेशन कराने के झंझट से बच जाएंगी।
अहम बात यह है कि सेंट्रल सिस्टम द्वारा मान्यता प्राप्त बीज कंपनियों के आवेदन को तकनीकी, वित्तीय या इंफ्रास्ट्रक्चर के आधार पर राज्य सरकारें रिजेक्ट नहीं कर सकेंगी। इस प्रकार के प्रावधान बीज नियमन में केंद्र सरकार की पावर को बढ़ाते हैं और राज्यों की शक्तियों को कम करते हैं। इससे प्राइवेट सेक्टर की राह भी आसान होगी।
किसानों को खराब और नकली बीजों से बचाने के नाम पर लाए जा रहे बीज विधेयक में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को महत्व देना कई सवाल खड़े करता है। बेहतर होता अगर इसके स्थान पर किसानों के हितों और खाद्य सुरक्षा को तरजीह दी जाती।
उत्पादक, डीलर व डिस्ट्रीब्यूटर का रजिस्ट्रेशन
बीज उत्पादक व उनके एजेंट, प्रोसेसिंग यूनिट, डीलर, डिस्ट्रीब्यूटर और प्लांट नर्सरी का रजिस्ट्रेशन संबंधित राज्य सरकार द्वारा नए कानून के प्रावधानों के तहत किया जाएगा। चूंकि राज्यों में बीज उत्पादकों व विक्रेताओं के पंजीकरण की व्यवस्था पहले से मौजूद है, इसलिए नई व्यवस्था राज्यों के नियमन के साथ दोहराव या टकराव की स्थिति पैदा कर सकती है।
नए कानून के प्रावधानों के तहत राज्यों को दी गई जिम्मेदारी को निभाने के लिए राज्यों की क्षमताओं का आकलन करना भी आवश्यक होगा। अपनी क्षमताएं बढ़ाने के लिए राज्य केंद्र से वित्तीय सहायता की मांग कर सकते हैं।

एक सवाल यह भी है कि क्या बीज उत्पादकों के साथ हर सीड ग्रोवर को भी रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा? अगर ऐसा हुआ तो बीज उत्पादन में शामिल किसानों के लिए कानूनी प्रक्रिया का बोझ बढ़ जाएगा। इस संबंध स्पष्टता लाने की आवश्यकता है।
ट्रेसेबिलिटी सिस्टम
नये कानून में बीज की ट्रेसेब्लिटी पर जोर दिया गया है। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा सीड ट्रेसेबिलिटी (साथी) पोर्टल बनाया गया है। बीज के हर कंटेनर पर क्विक रिस्पांस (QR) कोड अनिवार्य होगा जिससे सर्टिफिकेशन एजेंसी से लेकर बीज के ट्रायल और मानकों से जुड़ी जानकारी प्राप्त हो सकेगी। हरेक बीज उत्पादक, डीलर, डिस्ट्रीब्यूटर यहां तक कि आईसीएआर और कृषि विश्वविद्यालयों को भी सेंट्रलाइज्ड सीड ट्रेसेबिलिटी सिस्टम का पालन करना होगा।
बीजों का आयात
बीजों के आयात के मामले में प्लांट क्वारंटाइन (रेगुलेशन ऑफ इंपोर्ट इनटू इंडिया) ऑर्डर 2003 का पालन करना होगा। साथ ही जर्मिनेशन, प्योरिटी और उसके स्वास्थ्य के लिए भारतीय मानकों का पालन करना होगा। आयातित बीजों के मामले में निर्यातक देशों में किए गए मल्टी लोकेशनल ट्रायल के आधार पर रजिस्ट्रेशन मान्य होंगे। विदेश में किए गये ट्रायल के आधार पर देश में इस्तेमाल होने वाले बीजों के रजिस्ट्रेशन को लेकर विवाद पैदा हो सकता है। आईसीएआर के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने रूरल वर्ल्ड के साथ बातचीत में कहा कि यह प्रक्रिया उचित नहीं है। कंपनियां कीटनाशकों की तरह बाहर के डेटा के आधार पर पंजीकरण करा लेंगी और यहां बीज बेचना शुरू कर देंगी। उसके दो साल बाद स्थानीय डेटा देंगी। तब अगर कोई गड़बड़ी मिलती है तो उस स्थिति में नुकसान की भरपाई कैसे की जाएगी।
सीड सर्टिफिकेशन और टेस्टिंग
पुराने बीज कानून में केवल नोटिफाइड वैरायटी के बीजों के लिए सर्टिफिकेशन का प्रावधान था जबकि नए कानून में किसी भी रजिस्टर्ड वैरायटी के बीजों के लिए सर्टिफिकेशन का प्रावधान है। राज्य सरकार सीड सटिर्फिकेशन एजेंसी की स्थापना कर सकती है। कानून में यह भी प्रावधान है कि सेंट्रल सीड कमेटी या राज्य सरकार किसी संगठन को सीड सर्टिफिकेशन देने के लिए मान्यता प्रदान कर सकती है। इसमें केंद्र और राज्य के संगठनों के अलावा अन्य संगठनों को भी शामिल किया गया है। इससे निजी क्षेत्र के लिए सीड सर्टिफिकेशन के क्षेत्र में आने का रास्ता खुलेगा। इसे लेकर भी कई शंकाएं हैं, क्योंकि कई राज्यों में बीज प्रमाणन एजेंसियों की कार्यप्रणाली और क्षमताओं पर सवाल उठते रहे हैं।
केंद्र सरकार भारत से बाहर किसी अन्य देश की बीज सर्टिफिकेशन एजेंसी को भी मान्यता दे सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय सर्टिफिकेशन एजेंसियों के लिए देश के बीज नियमन में दखल बढ़ेगा। साथ ही देश की बीज संपदा से जुड़े डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता को भी खतरा हो सकता है। देश की बीज संप्रभुता के लिहाज से यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है।
बीजों की जांच के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर बीज टेस्टिंग लैब की स्थापना की जाएगी। इसमें प्राइवेट सेक्टर की लैब को स्टेट सीड टेस्टिंग लैब के तौर पर अधिकृत करने का रास्ता खोला दिया गया है।
बीज सर्टिफिकेशन के लिए तीन चरण में इंस्पेक्टर की विजिट बीज उत्पादन किये जा रहे स्थान पर करने का प्रावधान किया गया है। ये जर्मिनेशन, फ्लावरिंग और हार्वेटिंग की स्टेज हैं। लेकिन जिस तरह का मानव संसाधन इस काम के लिए है उससे यह निगरानी व्यावहारिक रूप से संभव ही नहीं है।
राज्य कर सकते हैं विरोध
केंद्रीकृत नियमन का दायरा बढ़ने से नये कानून का राज्यों की ओर से विरोध हो सकता है, क्योंकि केंद्रीय कानून बीजों पर राज्यों के नियमन के अधिकार को सीमित कर देगा। बिल में बीजों के रजिस्ट्रेशन, वैरायटी अप्रूवल और क्वालिटी कंट्रोल के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर बीज समितियों की व्यवस्था बनाई गई है। लेकिन असल कंट्रोल सेंट्रल सीड कमेटी के जरिए केंद्र सरकार के पास रहेगा, जिसे काफी अधिक शक्तियां और अधिकार दिए गये हैं। आपात स्थिति में बीज के दाम निर्धारित करने का अधिकार भी केंद्र सरकार के पास रहेगा।
कृषि राज्यों का विषय होने के बावजूद बीज नियमन की इस केंद्रीयकृत व्यवस्था को लेकर राज्यों ने अपनी आशंकाएं जतानी शुरू कर दी हैं। तेलंगाना के कृषि मंत्री थुम्माला नागेश्वर राव का कहना है कि बीज कानून में संशोधन इस तरह से किए जाने चाहिए कि पॉलिसी न केवल किसानों के हितों की रक्षा करे, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि राज्यों के अधिकारों से समझौता न हो।
कानून के प्रावधानों को लागू करने के लिए जरूरी ढांचागत सुविधाएं और मानव संसाधन पर आने वाले खर्च को कौन वहन करेगा, यह स्पष्ट नहीं है। कृषि राज्यों का विषय है और कानून के प्रावधानों को जमीनी स्तर पर लागू करने में राज्यों की भूमिका ही अधिक होगी। लेकिन जिस तरह केंद्र को अधिकार दिए गए हैं, राज्य खर्च की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर डाल सकते हैं।
सजा और जुर्माना
नकली बीजों की बिक्री को गंभीर अपराध माना गया है जबकि किसी बीज को मिसब्रांड कर बेचने को छोटा अपराध करार दिया गया है। बीजों को मिसब्रांड करने बेचने को छोटे अपराधों की श्रेणी में डालने पर सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि बड़ी कंपनियों के नाम पर किसानों को फर्जी बीच बेचे जाने से बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है। किसानों की तरफ से ऐसी शिकायतें अक्सर आती रहती हैं। लेकिन ऐसा अपराध करने वाले एक लाख रुपये का जुर्माना देकर छूट जाएंगे। गंभीर अपराधों में बीज उत्पादकों और प्रोसेसिंग प्लांट यानी बीज कंपनियों और डीलर यानी छोटे कारोबारियों पर बराबर जुर्माने का प्रावधान है।
मुआवजे की प्रक्रिया नहीं
प्रस्तावित विधेयक के जिस पहलू को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं, वह है खराब बीज के कारण फसल को नुकसान की स्थिति में किसानों के लिए मुआवजे की प्रक्रिया का प्रावधान नहीं है। अगर कंपनी के दावे के मुताबिक बीज काम नहीं करते हैं या खराब निकलते हैं तो नए कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसानों का मुआवजा सुनिश्चित कर सके। बीजों के प्रदर्शन के बारे में कंपनियों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर किए जाने वाले झूठे या भ्रामक दावों पर अंकुश लगाने के लिए कानून में पर्याप्त प्रावधानों की कमी दिखती है।
देखने में व्यापक और किसान हित में लाया जाने वाला यह ड्राफ्ट कानून कई सवालों के उत्तर नहीं देता है। मसलन किसान की शिकायत के आधार पर इसमें कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन इसके लिए किसी भी वैज्ञानिक तरीके जांच की अनिवार्यता का प्रावधान नहीं रखा है। एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने रूरल वर्ल्ड के साथ बातचीत में कहा कि खराब बीज की स्थिति में या बीज के पैकेट पर किए गये उत्पादकता के दावे के पूरा नहीं होने पर किसान द्वारा की जाने वाली शिकायत की प्रक्रिया क्या होगी, उसको लेकर विधेयक के मसौदे में कुछ नहीं कहा गया है।
छोटे बीज उत्पादकों की चुनौती
लेबल्ड और नॉन-सर्टिफाइड बीज उत्पादकों के लिए नया कानून मुश्किलें पैदा करेगा क्योंकि इसमें टूथफुल्ली लेबल्ड (टीएल) बीज के उत्पादन को हतोत्साहित करने के प्रावधान हैं। इससे छोटे बीज उत्पादक बाजार से बाहर हो जाएंगे। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अभी करीब 90 फीसदी हिस्सा टीएल बीज ही बिक रहा है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि नया कानून आने के बाद किसानों के जरिए छोटी कंपनियों द्वारा बीज उत्पादन संभव ही नहीं रह जाएगा। ऐसे में कंसोलिडेशन बढ़ेगा और छोटी कंपनियां कारोबार से बाहर हो जाएंगी।
आईसीएआर की भूमिका
यह देखना भी जरूरी है कि आईसीएआर नेटवर्क और दूसरे शोध संस्थानों द्वारा विकसित की जा रही किस्मों की किसानों तक पहुंच कैसे बढ़े। इस संदर्भ में रूरल वर्ल्ड के साथ बात करते हुए नीतिगत मामलों के एक वरिष्ठ एक्सपर्ट ने बताया कि यूपीए सरकार के समय एक प्रस्ताव आया था कि हमारे शोध संस्थान बहुत अच्छा फाउंडेशन बीज तैयार करने में सक्षम हैं। इन किस्मों की शुद्धता (प्योरिटी) बनाने रखने के लिए, ताकि सीड लाइन आखिर तक ऐसी ही बनी रहे, इन संस्थानों का सीड बिजनेस की साझेदारी में बने रहना जरूरी है। इसके लिए उस समय निजी क्षेत्र के साथ शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों द्वारा संयुक्त उद्यम (जेवी) स्थापित करने का विचार रखा गया था, जिसमें 51: 49 भागीदारी की बात कही गई थी।

प्रस्ताव में कहा गया था कि बिजनेस का जिम्मा निजी क्षेत्र का रहे लेकिन बोर्ड में दखल संस्थान का रहे। इस दीर्घकालिक भागीदारी से होने वाले मुनाफे का हिस्सा संस्थानों और नई किस्में विकसित करने वाले वैज्ञानिकों को मिले। दुनिया के कई देशों में यह मॉडल काम कर रहा है। लेकिन यह विचार आगे नहीं बढ़ सका। उनका कहना है कि अब जब करीब 60 साल बाद बीज को लेकर नये कानून की प्रक्रिया चल रही है तो हमें इस तरह के विकल्प पर विचार करना चाहिए क्योंकि इससे बीज कारोबार में सार्वजनिक क्षेत्र का दखल बरकरार रहेगा। देश के किसानों और बौद्धिक संपदा अधिकारों के लिए भी यह स्थिति बेहतर रहेगी।
इसी तरह, बीज परीक्षण को भी पूरी तरह से निजी क्षेत्र के हवाले नहीं किया जा सकता है। इसके लिए सख्त मानक तय कर उनका पालन करने वाली कंपनियों को यह सुविधा दी जा सकती है नहीं तो राज्यों में इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए वित्तीय प्रावधान करने होंगे। निजी क्षेत्र के निवेश, उनके पास उपलब्ध शोध एवं विकास की सुविधा के आधार पर उनकी ग्रेडिंग करने की भी जरूरत है।
किसानों का विरोध शुरु
प्रस्तावित बीज कानून को लेकर किसान संगठनों ने अपनी आपत्ति और आशंकाएं व्यक्त करनी शुरू कर दी हैं। अखिल भारतीय किसान सभा ने इसे बीज संप्रभुता, आजीविका और जैव विविधता के संरक्षक के रूप में किसानों के अधिकारों पर एक सुनियोजित हमला करार दिया है। संयुक्त किसान मोर्चा ने एक बयान जारी कर मांग की है कि बीज विधेयक का ड्राफ्ट वापस लिया जाए। यह भारत की बीज संप्रभुता को सरेंडर करता है और इसका मकसद बीज क्षेत्र में कॉर्पोरेट मोनोपॉली को बढ़ावा देना है।
ऑल इंडिया किसान सभा ने बीज विधेयक, 2025 के ड्राफ्ट को किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए बेहद हानिकारक बताया है। एआईकेएस के अध्यक्ष अशोक धवले ने कहा कि प्रस्तावित कानून कृषि को गहरे संकट में धकेल देगा। धवले ने दावा किया कि बीज क्षेत्र में कॉरपोरेट्स को अत्यधिक छूट दिए जाने से बीजों की कीमतें अनियंत्रित रूप से बढ़ेंगी और किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। यह किसानों की स्वतंत्रता, बीज बचाने की परंपरा और स्थानीय विविधताओं की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।
ड्राफ्ट कानून पर राय देने के लिए 11 दिसंबर, 2025 तक का समय दिया गया है। लेकिन इसको लेकर देश में कृषि वैज्ञानिक समुदाय, बीज उद्योग और रिसर्चर्स के बीच गहन मंथन जारी है। कहीं न कहीं कानून में जिस तरह से मल्टी लोकेशनल ट्रायल, मूल्यांकन और लैबोरेट्रीज की मान्यता के मामले में निजी क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई है वह रिसर्च और मूल्यांकन की गुणवत्ता से समझौता करने जैसा है।
नया बीज कानून समय की मांग है। अच्छी बात यह है कि सरकार ने विधेयक का मसौदा लोगों के सामने रखा है और कंसल्टेशन की प्रक्रिया को अपनाने को प्राथमिकती दी है। अभी संबंधित पक्षों, किसान संगठनों, उद्योग और वैज्ञानिकों व नीतिगत मामलों के एक्सपर्ट्स की राय सरकार को मिलेगी। अब सरकार इन सुझावों पर कितना अमल करती है वह इस कानून को बेहतर और व्यावहारिक बनाने में तो बड़ी भूमिका निभाएगा ही, साथ ही सरकार को हितधारकों को साथ जोड़ने में भी मदद करेगा। बेहतर यही होगा कि सरकार व्यापक विचार विमर्श के बाद ही विधेयक पर आगे बढ़े और देश के किसानों के हितों के संरक्षण, देश की खाद्य सुरक्षा और बीज कारोबार को नया स्वरूप देने का काम करे। तभी इस कानून को तीन कृषि कानूनों वाले हश्र से बचाया जा सकता है और कृषि क्षेत्र में एक बड़े सुधार को लागू करने का श्रेय सरकार ले सकती है।
RNI No: DELBIL/2024/86754 Email: [email protected]