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जन पहल ने माल्टा को बनाया 'उम्मीदों का ब्रांड'

सरकारी समर्थन मूल्य के बिना ही ए ग्रेड माल्टा को 60 रुपए के रेट पर बाजार में उपलब्ध कराया

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संजीव कंडवाल

उत्तराखंड ऐतिहासिक रूप से पलायन प्रभावित रहा है। साल 2000 में उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से यहां करीब 1700 गांव भुतहा यानि मानव आबादी विहीन हो चले हैं। पलायन की एक बड़ी वजह उत्तराखंड के गांवों में आर्थिक गतिविधियां लगभग शून्य होना है। अब उत्तराखंड की प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था धाद, खेती बाड़ी, उद्यानिकी के जरिए पहाड़ के गांवों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए प्रयास कर रही है। इसके लिए धाद, पहाड़ में बहुतायत में पैदा होने वाले नींबू प्रजाति के माल्टा जैसे फलों को बढ़ावा दे रही है। बिना किसी सरकारी या संस्थागत फंडिंग के किए जा रहे इन प्रयासों के शुरुआती नतीजे उम्मीद जगाते हैं।

 

माल्टा की कहानी

 

उत्तराखंड में परम्परागत रूप से नींबू प्रजाति के फलों का उत्पादन होता है। इसमें माल्टा प्रमुख फसल है। उद्यान विभाग के आंकड़ों के अनुसार राज्य में नींबू प्रजाति के फलों का सालाना औसत उत्पादन 36911.96 मीट्रिक टन है, जो अन्य प्रजाति वाले फलों के मुकाबले अधिक है। इसमें अगर माल्टा की बात की जाए तो यह उत्तराखंड के हर गांव में मिल जाता है। कुछ मामलों में ऐसा भी है कि माल्टा लगाने वाले परिवार कब के पलायन कर चुके हैं, लेकिन उनके लगाए पेड़ अब भी फल दे रहे हैं। माल्टा की खासियत यह है कि यह बिना देखरेख के भी हो जाता है। विटामिन का अच्छा स्रोत होने के साथ ही यह 100 प्रतिशत ऑर्गेनिक भी है।

 

बहुतायत उत्पादन के बावजूद, माल्टा के लिए ठोस बाजार की व्यवस्था अब तक नहीं हो पाई है। इस कारण किसानों को कभी इसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। पौड़ी में द्वारीखाल के माल्टा किसान अमर सिंह बिष्ट के अनुसार पहाड़ की जलवायु में माल्टा सबसे कम मेहनत में पैदा हो जाता है, इसके लिए बाजार उपलब्ध नहीं है। सरकार को सेब की तरह माल्टा की खरीद को भी प्रोत्साहन देना चाहिए। साथ ही किसानों को माल बाजार तक पहुंचाने के लिए सहायता प्रदान करनी चाहिए। दूसरी तरफ उत्तराखंड उद्यान विभाग ने पिछले सीजन में सी ग्रेड माल्टा के लिए 10 रुपए प्रति किलो का समर्थन मूल्य घोषित किया, लेकिन माल्टा खरीद की ठोस व्यवस्था अब तक नहीं हो पाई है। वहीं इस सीजन में अब तक विभाग न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित नहीं कर पाया है।

 

उद्यान विभाग के उप निदेशक योगेंद्र यादव ने बताया कि ए और बी ग्रेड का माल्टा बाजार में खप जाता है. इसलिए सरकार किसानों की सहायता के लिए सी ग्रेड के माल्टा पर ही न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। इस साल के लिए समर्थन मूल्य घोषित करने की प्रक्रिया जारी है. इसका निर्धारण जल्द किया जाएगा।

 

धाद ने उत्तराखंड के किसानों से माल्टा खरीद कर देहरादून के बाजार में उपलब्ध कराने की पहल की है। इसी क्रम में धाद द्वारा वर्ष 2023-24 से प्रति वर्ष सर्दियों में माल्टा महीना अभियान संचालित किया जा रहा है। संस्था अपनी कोऑपरेटिव सोसायटी के जरिए, पहाड़ के किसानों से माल्टा खरीदकर बाजार में उपलब्ध कराती है।

 

धाद के सचिव तन्मय ममगाई बताते है कि माल्टा माह के पहले साल धाद ने अपनी कोऑपरेटिव संस्था के जरिए किसानों से 30 रुपए प्रति किलो की दर पर 15 क्विंटल माल्टा खरीद कर, देहरादून में 50 रुपए की दर पर बेचा। इसके लिए देहरादून में माल्टा मोबाइल वैन संचालित की गई। यह प्रयोग अच्छा रहा। सभी जगह पहाड़ी माल्टा को हाथों हाथ खरीद लिया गया। अब संस्था हर साल सर्दियों में माल्टा माह का आयोजन करती है। इस साल धाद ए ग्रेड माल्टा को 60 रुपए प्रति किलो और बी ग्रेड को 50 रुपए प्रति किलो की कीमत पर बाजार में उपलब्ध करा रही है। इसी तरह नारंगी का रेट 80 प्रति किलो तय किया है।

 

अभियान के मुख्य संयोजक हरीश डोबरियाल के मुताबिक पिछले साल तक इस अभियान में प्रतिदिन दो क्विंटल तक माल्टा की खपत्त हो पाती थी, वहीं इस साल प्रारंभिक खपत ही 10 क्विंटल तक पहुंच रही है। शुरुआती एक सप्ताह में ही धाद अब तक दो टन माल्टा को बाजार उपलब्ध कराने में कामयाब रही है। इसके लिए धाद, देहरादून में माल्टा मोबाइल वैन, होम डिलीवरी और स्टूडेंट स्टाल जैसे प्रयोग कर रही है। साथ ही लोगों को थोक में खरीद के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।

 

संयोजक देवेंद्र नेगी के अनुसार सेब और कीवी के उत्पादन के लिए किसानों को प्रशिक्षण के साथ ही तकनीकी की जरूरत होती है. जबकि पहाड़ में पैदा होने वाले सिटरस या स्टोन फ्रूट (आडू, पुलम खुमानी) बिना किसी प्रशिक्षण या अतिरिक्त देखभाल के हो जाते हैं। गत सीजन में धाद के प्रयास से तीन लाख तक का माल्टा बिका, इससे कई किसानों के खाते में पहली बार पैसा गया।

 

धाद के प्रयोग

 

पहाड़ में आडू, पुलम खुमानी के रूप में गुठलीदार फल भी बहुतायत तौर पर होता है। इन फलों की अच्छी बात यह है कि ये मई-जून में पककर तैयार होते हैं। उस समय पहाड़ में तीर्थाटन से लेकर पर्यटन का सीजन रहता है। इस तरह, इन फलों को बेचने के लिए आस-पास ही बाजार उपलब्ध हो जाता है। उत्तराखंड में अब नैनबाग के आस-पास कई किसान स्टोन फ्रूट की खेती अपना रहे हैं, जिसे वो पर्यटन सीजन में मसूरी के आस पास आसानी से खपा सकते हैं।

 

इन सब संभावनाओं को देखते हुए धाद ने स्टोन फ्रूट पर काम किया। फंची कोऑपरेटिव, हरेला गांवों की उपज को बाजार उपलब्ध कराने के लिए धाद ने वर्ष 2024 में फंची कोऑपरेटिव का भी गठन किया है। धाद की इस मुहिम से जुड़े पवन बिष्ट और राजेश बिष्ट बताते हैं कि फंची कोऑपरेटिव, गांव के किसानों से उत्पाद खरीद कर इसे बाजारों में उपलब्ध कराती है। दूसरे साल में ही इसका टर्नओवर पांच लाख तक पहुंच चुका है।

 

कल्यो फूड फेस्टिवलः पहाड़ी अनाज को लोकप्रिय बनाने के लिए, धाद सदस्य मंजू काला प्रति माह कल्यो फूड फेस्टिवल का आयोजन करती हैं. जिसमें पहाड़ी डिश को नए प्रयोगों के साथ परोसा जाता है। धाद के सचिव तन्मय कहते हैं कि अब धाद स्कूली बच्चों के बीच जाकर 'बीज बचाओ' अभियान, शुरू कर चुकी है। इसमें वो बच्चों से फलदार पौधों के नेटिव बीज लाने के लिए कह रहे हैं, ताकि किसानों तक नेटिव और जांचा परखा पौधा और बीज ही पहुंचे।


संजीव कंडवाल

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