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एग्री क्रेडिट में सुधार का समय

सरकारी आंकड़ों में हर साल कृषि ऋण का आकार बढ़ता जा रहा है। कुछ राज्य ऐसे हैं, जहां कृषि ऋण का आकार फसल उत्पादन के मूल्य तक पहुंच गया है।

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हरवीर सिंह

सरकारी आंकड़ों में हर साल कृषि ऋण का आकार बढ़ता जा रहा है। कुछ राज्य ऐसे हैं, जहां कृषि ऋण का आकार फसल उत्पादन के मूल्य तक पहुंच गया है। लेकिन देश के अधिकांश राज्यों, खासकर पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में, किसानों को अब भी संस्थागत ऋण का बहुत कम हिस्सा मिल पाता है। इसके पीछे कृषि ऋण उपलब्ध कराने वाली सरकारी योजनाओं और ब्याज सब्सिडी व्यवस्था की मौजूदा खामियों के अलावा ढांचागत सुविधाओं की कमी, किसानों में जागरूकता का अभाव और राज्य सरकारों की प्रशासनिक अकुशलता जैसी वजहें भी हैं।

 

पिछले कई दशकों से सरकारें लगातार कोशिश करती रही हैं कि किसानों तक संस्थागत ऋण की पहुंच बढ़े ताकि वे ऊंची ब्याज दरों से बच सकें और ब्याज छूट के जरिये सस्तेवित्तीय संसाधन उपलब्ध हो सकें। कृषि ऋण किसान की उत्पादन लागत का अहम हिस्सा है और समय पर फसल इनपुट उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभाता है। कई राज्यों ने इस दिशा में उल्खनी ले य प्रगति की है, लेकिन अधिकांश राज्य अब भी पीछे हैं।

 

किसानों को सस्ता ऋण उपलब्ध कराने में किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) और मॉडिफाइड इटरेस ं ्ट सबवेंशन स्कीम (MIS) की बड़ी भूमिका है। लेकिन इसका पूरा लाभ सभी किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा है। हालांकि केसीसी की संख्या करीब आठ करोड़ हो चुकी है, लेकिन अधिकांश राज्यों में प्रति किसान ऋण की हिस्सेदारी काफी कम है।

 

रूरल वर्ल्ड के इस अंक में हमने विशेषज्ञों के जरिए इस विषय की अहमियत, मौजूदा स्थिति और सुधार के लिए जरूरी उपायों पर विस्तार से चर्चा की है। चिंताजनक है कि प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) का कमजोर होता ढांचा कर्ज तक किसानों की पहुंच में बाधक बन रहा है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत सहित कई राज्यों के ग्रामीण क्त्षे रों में बैंक शाखाओं की संख्या भी काफी कम है। बैंकिंग पहुंच के मामले में आज भी अनेक 'डार्क जोन' मौजूद हैं। ऐसे स्थानों पर सरकारी योजनाओं के बावजूद किसान कर्जप्राप्त नहीं कर पाते। जिन राज्यों में राजस्व विभाग अधिक कुशलता से काम कर रहे हैं, वहां के किसान कर्ज के मामले में बेहतर स्थिति में हैं, क्योंकि कर्ज के लिए बैंक को आवश्यक दस्तावेज किसान राज्य सरकार के अधिकारियों के सहयोग से ही समय पर उपलब्ध करा सकते हैं। इसलिए जिन राज्यों में किसानों को संस्थागत ऋण कम मिल रहा है, उन्हें अपनी व्यवस्थाओं की गंभीर समीक्षा करनी होगी।

 

दूसरा महत्वपर्ण ू मुद्दा फसल बीमा का है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत सरकार सब्सिडी देती हैं तथा किसान भी अपने हिस्से का प्रीमियम जमा करते हैं। इस योजना में समय-समय पर कई बदलाव किए गए हैं, लेकिन जिस मूलभूत सुधार की आवश्यकता है, वह अब तक नहीं हो पाया है। इसका नुकसान किसान को उठाना पड़ रहा है।

 

अभी तक फसल बीमा की एप्रोच कलस्टर आधारित है न कि किसान के खेत पर आधारित। इसे 'इंश्योरेंस यूनिट' भी कहते हैं। किसी इंश्योरेंस यूनिट में थ्रेसहोल्ड सीमा से ऊपर फसल नुकसान होने पर ही दावा राशि मिलती है। कई मामलों में किसी किसान की फसल को गंभीर नुकसान होता है, जबकि पूरे क्लस्टर का औसत नुकसान थ्रेसहोल्ड से कम रहता है। ऐसी स्थिति में किसान को कोई दावा नहीं मिलता या फिर पर्याप्त दावा राशि नहीं मिलती और वह खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।

 

जब सरकार के पास किसान आईडी, भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण और सैटेलाइट मैपिंग जैसी आधनिु क व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं, तो फिर व्यक्तिगत खेत को बीमा की आधार इकाई क्यों नहीं बनाया जा सकता? यदि फिलहाल ऐसा संभव नहीं है, तो कम-से- कम प्रीमियम निर्धारण की व्यवस्था भी क्लस्टर आधारित होनी चाहिए। अभी किसान प्रीमियम अपने खेत के आधार पर देता है, जबकि दावा क्लस्टर के आधार पर तय होता है। इस विसंगति को दूर किया जाना आवश्यक है। रूरल वर्ल्ड के इस अंक में फसल बीमा पर विस्तृत स्टोरी में ऐसे सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की गई है।

 

इस अंक में कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) द्वारा कृषि निर्यात के विविधीकरण और मूल्यवर्धित उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ाकर किसानों की आय में वृद्धि के लिए उठाए गए कदमों पर एक विशेष आलेख भी शामिल है। कृषि निर्यात से जुड़ेविभिन्न मुद्दों पर एपीडा के चेयरमैन अभिषेक देव के साथ एक एक्सक्लूसिव इटरव ं ्यू भी इस अंक का अहम हिस्सा है।

 

अंत में यह कहना जरूरी है कि यह वर्ष देश के कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। अल नीनो के प्रभाव से कमजोर मानसून और खरीफ फसलों के रकबे में संभावित गिरावट कृषि उत्पादन और ग्रामीण आय, दोनों पर प्रतिकूल असर डाल सकती है। ऐसे में सरकार को देश की 46 फीसदी कामकाजी आबादी वाले इस क्षेत्र के लिए एक वित्तीय पैकेज घोषित करना चाहिए ताकि कृषि क्षेत्र भी अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों के साथ कदमताल कर सके, क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए कृषि क्षेत्र का मजबूत होना जरूरी है। 


हरवीर सिंह
प्रधान संपादक

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