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ग्रामीण भारत का सेहत संकट

विशाल स्वास्थ्य बजट के बावजूद ग्रामीण भारत विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, कमजोर बुनियादी ढांच और निजी अस्पतालों पर बढ़ती निर्भरता स जूझ रहा है

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Harvir Singh

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था एक गहरे विरोधाभास का उदाहरण प्रस्तुत करती है। व्यापक स्तर पर देश ने ऐसी उल्खनी ले य उपलब्धियां हासिल की हैं जो मजबूत होते स्वास्थ्य तंत्र का संकेत देती हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, मानव संसाधनों की तैनाती और मरीजों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करते हैं। नेशनल हेल्थ अकाउंट्स 2022-23 के अनसार, ु भारत का सरकारी स्वास्थ्य व्यय पिछले एक दशक में लगभग तीन गना बढ़कर 3.85 लाख करोड़ ु रुपये तक पहच ग ुं या है। जीडीपी में सरकारी स्वास्थ्य व्यय की हिस्सेदारी बढ़कर 1.43% हो गई है। इससे लोगों द्वारा अपनी जेब से किए जाने वाले स्वास्थ्य खर्च में कमी आई है। यह 2013-14 में कल स् ु वास्थ्य व्यय का 64.2% था, जो 2022-23 में 43.4% रह गया।

 

इस अवधि में देश में अस्पतालों में प्रसव दर भी बढ़कर 90.6% तक पहच गई। हालां ुं कि, अस्पतालों में प्रसवों की कल संख ्या बढ़ने क बावजूद सरकारी संस्थानों में होने वाले प्रसवों का अनपात 61.9% से घटकर 58.6% रह ग ु या है। सवाल है कि ग्रामीण परिवार मफु्त सरकारी स्वास्थ्य सवुिधाओं को छोड़कर निजी अस्पतालों का रुख क्यों कर रहे हैं? अनसंधान ट्रस ु ्ट के एक्शन सेंटर ‘साथी’ से जुड़े स्वास्थ्य अधिकार कार्यकर्ता विनोद शेंडे का कहना है कि सरकारी निवेश अभी मख्य ु रूप से मेडिकल कॉलेजों, बड़े शहरी अस्पतालों और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) परियोजनाओं पर केंद्रित है। प्राथमिक और प्रिवटिव ें स्वास्थ्य सेवाओं की लगातार उपेक्षा की जा रही है। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जांच सवुिधाओं की कमी है और बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं। हेल्थ डायनेमिक्स ऑफ इंडिया 2023-24 के अनसार, ग् ु रामीण सामदा ु यिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 79.9% पद रिक्त हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के 31% से अधिक उप-स्वास्थ्य केंद्रों के पास आज भी अपना स्थायी भवन नहीं है।

 

इस संकट का सबसे अधिक असर हिंदी भाषी राज्यों में दिखाई देता है। मध्य प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 94%, बिहार में 80.9%, राजस्थान में 80.3% और उत्तर प्रदेश में 74.4% पद रिक्त हैं। मध्य प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 1,320 स्वीकृत पदों में से केवल 113 पद भरे हुए हैं।

 

उत्तरी राज्यों के विपरीत दक्षिणी राज्यों में हालात बेहतर प्रतीत होते हैं। तमिलनाडु की ट्राइबल हेल्थ इनिशिएटिव से जुड़े डॉ. रेगी जॉर्ज का कहना है कि दक्षिणी राज्यों में ऐसी गंभीर स्थिति इसलिए नहीं बनती क्योंकि वहां सरकारें स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर पर अधिक निवेश करती हैं। हालांकि डॉ. जॉर्ज का कहना है कि अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सामान्य बीमारियों का ही उपचार कर पाते हैं।

 

जब प्राइमरी और सेकंडरी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा केवल प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाता है, तो चिकित्सा सेवाओं के लिए लोग दूर जाने को मजबूर होते हैं। ‘स्टेट ऑफ हेल्थ इन रूरल इंडिया’ सर्वे के अनुसार, ग्रामीण भारत के 58% परिवारों ने बताया कि उनके आसपास के लोगों को गंभीर उपचार के लिए दूसरे क्षेत्रों में जाना पड़ता है। उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत में यह अनुपात क्रमशः 73% और 60% है।

 

सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर होती भूमिका ने शोषण की एक समानांतर अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है कि देश में सी-सेक्शन प्रसव की दर बढ़कर 27.2% हो गई है। निजी अस्पतालों में 54.1% प्रसव सी-सेक्शन के माध्यम से होते हैं, जबकि सरकारी में यह 16.9% है।

 

जन स्वास्थ्य अभियान के इंद्रनील मखोपाध ्याय ने बताया कि डब्ल्यूएचओ के अनसार आद ु र्श सी- सेक्शन दर अधिकतम 15% होनी चाहिए। लेकिन भारत में यह चिंताजनक रूप से अधिक है।

 

यदि स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन केवल बजटीय आवंटन, संस्थानों की संख्या या अन्य व्यापक आर्थिक इंडिकेटर्स के आधार पर किया जाएगा, तो कागजों पर सफलता हासिल करना आसान होगा। लेकिन बिना डॉक्टर वाला अस्पताल केवल एक इमारत है, और अनावश्यक सर्जरी के जरिए कराया गया प्रसव स्वास्थ्य व्यवस्था की नियामकीय विफलता को दर्शाता है। यदि भारत को वास्तव में यनिवर्स ू ल हेल्थ कवरेज हासिल करना है, तो नीति निर्माताओं को राष्ट्रीय आंकड़ों में दिखाई देने वाली उपलब्धियों और ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों तथा अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों के रोजमर्रा के संघर्ष के बीच मौजूद गहरी खाई को पाटना होगा।


Harvir Singh
Editor-in-Chief

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