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कोड परोदा: कृषि विज्ञान की सेवा में समर्पित एक जीवन

वैज्ञानिकों की आत्मकथाएं अक्सर किसी एक व्यक्ति के जीवन वृत्तांत से आगे बढ़कर संस्थानों, विचारों और राष्ट्रीय परिवर्तन की गाथा बन जाती हैं।

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Dr. A. Amarender Reddy

वैज्ञानिकों की आत्मकथाएं अक्सर किसी एक व्यक्ति के जीवन वृत्तांत से आगे बढ़कर संस्थानों, विचारों और राष्ट्रीय परिवर्तन की गाथा बन जाती हैं। संजय कुमार और अरुण तिवारी की लिखित पुस्तक ‘कोड परोदा’ ऐसी ही एक कृति है। यह पुस्तक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व महानिदेशक, प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक और संस्थान निर्माता डॉ. राजेंद्र सिंह परोदा के जीवन पर आधारित है। इसके माध्यम से पिछले छह दशकों में भारतीय कृषि विज्ञान के विकास की एक व्यापक और समग्र तस्वीर सामने आती है। यह एक संस्मरण मात्र नहीं, बल्कि इस बात का सशक्त वृत्तांत है कि दूरदर्शिता, प्रभावी नेतृत्व और वैज्ञानिक प्रतिबद्धता ने किस प्रकार भारत में कृषि अनुसंधान एवं विकास की दिशा और स्वरूप को आकार दिया।

 

यह पुस्तक चार भागों - मेकिंग ऑफ द मैन (व्यक्तित्व का निर्माण), एट द हेल्म (नेतृत्व की कमान), असेंड (उत्कर्ष) और लेगेसी (विरासत) - में विभाजित है। इसमें डॉ. परोदा की राजस्थान के एक किसान परिवार से निकलकर कृषि विज्ञान प्रशासन के सर्वोच्च पदों तक पहुंचने की प्रेरक यात्रा का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस क्रम में पुस्तक भारत के कृषि इतिहास के कई निर्णायक पड़ावों को भी समेटती है, जिनमें हरित क्रांति, जैव प्रौद्योगिकी का उदय, आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण तथा अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग के बढ़ते महत्व जैसे विषय प्रमुख हैं।

 

पुस्तक के शुरुआती अध्यायों में डॉ. परोदा के प्रारंभिक जीवन, शिक्षा और वैज्ञानिक प्रशिक्षण का विस्तृत विवरण दिया गया है। ये अध्याय विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे उस बौद्धिक वातावरण की झलक प्रस्तुत करते हैं, जिसने कृषि वैज्ञानिकों की उस पीढ़ी को तैयार किया, जिसने आगे चलकर भारतीय कृषि में ऐतिहासिक परिवर्तन किए। राजस्थान कृषि महाविद्यालय और बाद में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) में उनके अनुभव बताते हैं कि सफल वैज्ञानिक जीवन के निर्माण में मार्गदर्शकों, संस्थागत संस्कृति और वैज्ञानिक जिज्ञासा की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह विवरण यह भी दर्शाता है कि दृढ़ता, निरंतर प्रयास और अवसरों के प्रति खुला दृष्टिकोण किस प्रकार अप्रत्याशित ढंग से किसी व्यक्ति के पेशेवर जीवन की दिशा बदल सकते हैं।

 

पुस्तक की एक उल्लेखनीय विशेषता प्रणालीगत सोच पर इसका विशेष जोर है। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में कार्य करते हुए डॉ. परोदा ने यह समझ लिया था कि अधिक उपज देने वाली अनाज फसलों की व्यापक स्वीकृति का पशुधन उत्पादन पर एक अनपेक्षित दुष्प्रभाव पड़ रहा है, क्योंकि इससे चारे की उपलब्धता कम हो रही थी। चारा फसलों की उन्नत किस्मों के विकास के लिए उनके प्रयास इस बात को दर्शाते हैं कि वे कृषि को अलग-अलग तकनीकों का समूह नहीं, बल्कि एक परस्पर जुड़ी हुई समग्र प्रणाली के रूप में देखते थे। कृषि के प्रति यह दृष्टिकोण आज भी टिकाऊ कृषि पर चल रही बहसों में उतना ही प्रासंगिक है।

 

इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण योगदान संस्थान निर्माण की विस्तृत व्याख्या है। आईसीएआर के महानिदेशक के रूप में डॉ. परोदा का कार्यकाल भारत में आर्थिक और नीतिगत बदलावों के महत्वपूर्ण दौर के साथ जुड़ा रहा। इस संस्मरण में ‘आईसीएआर विजन 2020’ के निर्माण, जेनेटिक संसाधनों के संरक्षण के लिए विशेष राष्ट्रीय ब्यूरो की स्थापना, कृषि अनुसंधान इन्फ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ बनाने तथा राष्ट्रीय कृषि प्रौद्योगिकी परियोजना की शुरुआत का विस्तार से वर्णन किया गया है। ये सभी पहल भारतीय कृषि को उभरती चुनौतियों के लिए तैयार करने के साथ-साथ देश की खाद्य सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को बनाए रखने की एक दूरदर्शी और रणनीतिक सोच को प्रतिबिंबित करती हैं।

 

भारत के प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज के संरक्षण के प्रयासों का विवरण विशेष रूप से प्रभावशाली है। आधुनिक जीन बैंक इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास और राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) को सशक्त बनाना कृषि जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धियां थीं। पुस्तक इस बात को रेखांकित करती है कि वैज्ञानिक दूरदृष्टि और संस्थागत समर्थन मिलकर ऐसे दीर्घकालिक राष्ट्रीय संसाधनों का निर्माण कर सकते हैं, जिनका वास्तविक महत्व अक्सर कई दशकों बाद स्पष्ट होता है। यह संस्मरण कृषि नीति के विकासक्रम पर भी महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। बीज क्षेत्र में सुधार, जैव प्रौद्योगिकी, बौद्धिक संपदा अधिकार और सार्वजनिकनिजी भागीदारी जैसे विषयों पर चर्चा विज्ञान, नियमन और विकास के बीच जटिल संबंधों को उजागर करती है। डॉ. परोदा लगातार इस बात की वकालत करते रहे हैं कि नीतियां वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित हों और ऐसी नियामक व्यवस्था विकसित की जाए जो इनोवेशन को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ जनहित की भी रक्षा करे। चाहे विषय संकर फसलों के विकास का हो, जैव प्रौद्योगिकी हो या आनुवंशिक संसाधनों का प्रबंधन, उनका मूल संदेश यही है कि वैज्ञानिक प्रगति के साथ जिम्मेदार शासन और किसान केंद्रित दृष्टिकोण का समन्वय अनिवार्य है।

 

‘कोड परोदा’ की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक नेटवर्क के विकास का विस्तृत दस्तावेजीकरण है। पुस्तक में एशिया-पैसिफिक एसोसिएशन ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूशंस (APAARI), एशिया-पैसिफिक कंसोर्टियम ऑन एग्रीकल्चरल बायोटेक्नोलॉजी (APCoAB) तथा ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) जैसे संगठनों की स्थापना और विकास यात्रा का विस्तार से वर्णन किया गया है। इन पहलों के माध्यम से पुस्तक यह दर्शाती है कि आज के दौर में कृषि इनोवेशन विभिन्न विषयों, संस्थानों और देशों के बीच सहयोग पर पहले से कहीं अधिक निर्भर हो गया है।

 

डॉ. परोदा की सेवानिवृत्ति के बाद के योगदान पर आधारित अध्याय भी उतने ही रोचक हैं। सार्वजनिक जीवन से अलग होने के बजाय उन्होंने तास और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों के माध्यम से वैज्ञानिक संवाद को बढ़ावा देने, क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने तथा कृषि नीति संबंधी विमर्श को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जलवायु परिवर्तन, कृषि जैव विविधता, मृदा स्वास्थ्य और युवाओं की भागीदारी जैसे विषयों पर पुस्तक में की गई चर्चा कृषि क्षेत्र की उभरती चुनौतियों के समाधान के प्रति उनकी सतत प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।

 

 

इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण योगदान नेतृत्व पर इसका गहन चिंतन है। पूरे संस्मरण में सफल नेतृत्व को केवल प्रशासनिक अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि संस्थानों का निर्माण करने, प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने, साझेदारियां विकसित करने और सामूहिक प्रयासों को प्रेरित करने की क्षमता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। संस्मरण में बार-बार सहकर्मियों, मार्गदर्शकों और सहयोगियों के योगदान का उल्लेख किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक उपलब्धियां मूलतः सामूहिक सहयोग का परिणाम होती हैं।

 

पुस्तक को भारत और विदेश के अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं तथा विशेषज्ञों से जुड़े रोचक प्रसंगों ने और अधिक समृद्ध बनाया है। ये विवरण पाठकों को कृषि अनुसंधान प्रणाली के कार्य और उसे आकार देने वाले व्यक्तित्वों की अंदरूनी झलक प्रदान करते हैं। कृषि विज्ञान के भावी इतिहासकारों के लिए ये प्रत्यक्ष अनुभव और टिप्पणियां अत्यंत मूल्यवान संदर्भ सिद्ध होंगी।

 

पुस्तक का अंतिम भाग, जिसमें ‘कोड परोदा’ प्रस्तुत किया गया है, आत्ममंथन के साथ-साथ भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन, सार्वजनिक विज्ञान, पोषण सुरक्षा, डिजिटल कृषि, जल प्रबंधन, युवाओं की भागीदारी और सामूहिक प्रयास जैसे विषयों को समेटने वाला यह ढांचा विज्ञान और नीति के क्षेत्र में डॉ. परोदा के आजीवन अनुभव का सार प्रस्तुत करता है। इसका दायरा भले ही व्यापक और महत्वाकांक्षी हो, लेकिन इसकी नींव किसानों, वैज्ञानिकों और विभिन्न संस्थानों के साथ दशकों के व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित है।

 

समग्र रूप से ‘कोड परोदा’ भारत में कृषि विज्ञान, विज्ञान नीति और संस्था निर्माण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह पुस्तक व्यक्तिगत अनुभवों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और नीतिगत चिंतन का प्रभावी समन्वय प्रस्तुत करती है, जिससे यह वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों, नीति-निर्माताओं, प्रशासकों और विकास क्षेत्र से जुड़ेपेशेवरों सहित व्यापक पाठक वर्ग के लिए उपयोगी बन जाती है। यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि कृषि क्षेत्र में परिवर्तन केवल तकनीकी इनोवेशन से संभव नहीं होता, बल्कि इसके लिए दूरदर्शी नेतृत्व, मजबूत संस्थानों और विज्ञान के प्रति निरंतर सार्वजनिक प्रतिबद्धता भी उतनी ही आवश्यक है।

 

ऐसे समय में जब कृषि जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण, पोषण असुरक्षा और तकनीकी बदलाव जैसी अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रही है, इस पुस्तक में प्रस्तुत अनुभव और विचार विशेष महत्व रखते हैं। इसलिए ‘कोड परोदा’ केवल एक सफल कृषि वैज्ञानिक की जीवनगाथा नहीं है, बल्कि भारतीय कृषि विज्ञान के विकासक्रम का एक विचारोत्तेजक वृत्तांत भी है, जो इसके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण सीख और मार्गदर्शन प्रदान करता है।


Dr. A. Amarender Reddy
Ph.D (Agricultural Economics), FISPRD, FISAE Joint Director, School of Crop Health Policy Support Research (SCHPSR) ICAR-National Institute of Biotic Stress Management (NIBSM), Raipur

RNI No: DELBIL/2024/86754 Email: [email protected]