संकट में कृषि की रणनीतिक अहमियत
ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध के चलते विश्व अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर में है।
हरवीर सिंह
ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध के चलते विश्व अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर में है। कच्चे तेल के दाम 60 फीसदी बढ़ चुके हैं। होर्मुज स्ट्रेट बाधित होने से पश्चिमी एशिया से आयात-निर्यात प्रभावित हुए। इस युद्ध का भारत समेत दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है। भारत की चुनौती इसलिए भी अधिक है क्योंकि देश पेट्रोलियम उत्पादों की करीब 87 फीसदी जरूरत आयात से पूरी करता है। कोविड संकट के बाद सामने आए इस मुश्किल समय में आपूर्ति व महंगाई के मोर्चों पर प्रतिकूल स्थिति बन रही है। लेकिन कोविड की तरह इस बार भी कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाला क्षेत्र साबित हो रहा है। लगातार अनुकूल मौसम के चलते देश में बंपर खाद्यान्न उत्पादन हुआ और केंद्रीय पूल में गेहूं और चावल का भंडार बफर मानकों से कहीं अधिक है। चालू रबी सीजन में भी बेहतर उत्पादन के आसार हैं। यह सरकार के लिए सुकून की बात है, क्योंकि खाद्य महंगाई दर काबू में बनी रहेगी। लेकिन किसानों के लिए स्थिति सहज नहीं है। उनके लिए यह युद्ध बढ़ती लागत और कीमतों की अनिश्चितता लेकर आया है। वे पहले ही कृषि उत्पादों की कीमतों में भारी गिरावट का सामना कर रहे हैं। आर्थिक विकास के आंकड़े भी साबित करते हैं कि कृषि क्षेत्र की स्थिति मजबूत नहीं है। वित्त वर्ष 2025-26 में कृषि व सहयोगी क्षेत्र की वृद्धि दर सिर्फ 2.4 फीसदी रहने का अनुमान है।
सत्तर के दशक में खाड़ी युद्ध के चलते तेल की कीमतों में आई भारी बढ़ोतरी के मुकाबले इस बार संकट कृषि के लिए अधिक है। इसकी वजह कृषि क्त्र की जी षे वाश्म ईंधन पर बढ़ी निर्भरता है। फार्म मैकेनाइजेशन से लेकर न्यूट्रिएंट की खपत में आये बदलाव से भी यह निर्भरता बढ़ी है। सत्तर के दशक में खेती में मशीनीकरण और उर्वरकों की खपत, दोनों कम थे। लेकिन अब भारत सालाना 700 लाख टन उर्वरकों की खपत वाला देश है। इसमें करीब 400 लाख टन यूरिया, 100 लाख टन डीएपी, 150 लाख टन कॉम्प्लेक्स उर्वरक और 50 लाख टन एसएसपी है। इसमें लगभग 100 लाख टन यूरिया आयात होता है। डीएपी के मामले में तैयार उर्वरक व कच् माल के आयात में चे निर्भरता लगभग शत-प्रतिशत है। यूरिया उत्पादन में गैस का इस्तेमाल होता है और भारत कुल जरूरत का 50 फीसदी से अधिक गैस आयात करता है। अधिकांश आयात खाड़ी देशों से होता है जिनके रास्ते अभी लगभग बंद हैं।
ऐसे में किसानों को चालू खरीफ सीजन में उर्वरकों का संकट झेलना पड़ सकता है। हालांकि, सरकार के मुताबिक इस समय देश में करीब 180 लाख टन उर्वरकों का स्टॉक है, लेकिन खरीफ सीजन में ही करीब 350 लाख टन उर्वरकों की जरूरत है। वैकल्पिक स्रोतों से बाकी जरूरत कैसे पूरी होगी, यह बड़ा सवाल है। उर्वरक और गैस की कीमतें पहले ही काफी बढ़ चुकी हैं। कृषि के मशीनीकरण के चलते डीजल और बिजली पर निर्भरता भी बढ़ी है। कीटनाशकों के उत्पादन में पेट्रोलियम के सहउत्पादों का उपयोग होता है। शिपिंग खर्च और पैकेजिंग लागत बढ़ने के बाद कंपनियां कह चुकी हैं कि कीटनाशकों के दाम 25 से 30 फीसदी तक बढ़ेंगे। विधानसभा चुनाव के बाद डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे किसानों की लागत बढ़ जाएगी।
शिपिंग लागत बढ़ने और खाड़ी देशों को निर्यात बंद होने का असर कई कृषि उत्पादों की कीमतों पर पड़ने लगा है। यह किसानों पर दोहरी मार है। केला और प्याज किसान सीधे तौर पर प्रभावित हो रह हैं। े बासमती और गैर-बासमती चावल, मसाले, फल-सब्जियां और मीट का निर्यात प्रभावित होने का असर भी किसानों पर पडगा। दे ़े श के करीब 50 अरब डॉलर के कृषि निर्यात में खाड़ी देशों की बड़ी हिस्सेदारी है। कृषि पर ईरान युद्ध के असर को रूरल वर्ल्ड के इस अंक की कवर स्टोरी में विस्तृत रूप से समझाया गया है। इस पर बड एक ़े ्सपर्ट्स के आलेख भी हैं।
सबसे बड़ी मुश्किल उर्वरकों के मोर्चे पर आ सकती है। इस अंक में विश्व की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी उत्पादन और विपणन संस्था इफको के एमडी के.जे. पटेल का विस्तृत साक्षात्कार है। उन्होंने इफको के कारोबार और योजनाओं के साथ ही देश में उर्वरकों की खपत, आयात कम करने के विकल्पों और रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने के लिए उठाये जा रहे कदमों की जानकारी दी है। इसके अलावा असम से एक स्टोरी बता रही है कि उत्तर-पूर्व भारत में कृषि की तस्वीर कैसे बदल रही है।
यह तो सच है कि खाड़ी युद्ध का असर देश की अर्थव्यवस्था और हर वर्ग पर पडगा। कृ ़े षि ऐसा क्त्र है जो खा षे द्य उपलब्धता के मोर्चे पर देश को मजबूती देता रहा है। लेकिन आज यह क्त्र खुद मुश् षे किल में है और इसके लिए सरकार के पास कोई ठोस नीति नहीं है। केवल उर्वरक कीमतों को नियंत्रित रखने से बात नहीं बनेगी। सरकार ने निर्यातकों को पैकेज दिया है। मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता लिए पीएलआई दे रही है। लेकिन कृषि के लिए कोई समग्र नीति नहीं है। सरकार को कृषि क्त्र के षे लिए भी प्रोत्साहन नीति लानी चाहिए। यह प्रोत्साहन देश को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करगा ता े कि युद्ध जैसी अनिश्चितता की स्थिति में देश के सामने कोई अप्रत्याशित संकट पैदा न हो।
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