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किसानों के लिए NCOL ने खोले नए अवसर

जविै क किसान समूहों को बाजार पहच और बेहतर दाम ुं दिलाने के लिए नशने ल कोऑपरेटिव ऑर्नगेिक्स लिमिटेड की उल्खले नीय पहल

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हरवीर सिंह

देश में ऑर्गेनिक (जैविक) खेती को लेकर लंबे समय से उत्साह और संभावनाएं दिखाई देती रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा था। देश में जैविक उत्पादों की नियामक संस्था एपीडा की रिपोर्ट के अनुसार, 2023-24 में देश के ऑर्गेनिक उत्पादों का कुल मार्केट 16,800 करोड़ रुपये का था। वहीं 2024-25 में आर्गेनिक उत्पादों का निर्यात 66.59 करोड़ डॉलर का रहा। लेकिन जैविक खेती अपनाने वाले किसानों को न तो पर्याप्त बाजार मिल रहा है और न ही उनके उत्पादों का उचित मूल्य, जिसके लिए उन्होंने रसायन मुक्त खेती को अपनाया था। उन्हें बड पैमाने पर अपने ़े उत्पाद गैर-आर्गेनिक उत्पादों के समान कीमतो पर ही बेचने पड़ते हैं।

 

हालांकि, अब इस स्थिति में बदलाव की उम्मीद जगी है। वर्ष 2023 में स्थापित राष्ट्रीय स्तर की सहकारी संस्था नेशनल कोऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटड (NCOL) ने इस े दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है, जिससे किसानों के लिए ऑर्गेनिक बाजार तक पहुंच के दरवाजे खुल सकते हैं। एनसीओएल ने प्रमाणित (सर्टिफाइड) किसान समूहों को अपने साथ जोड़कर ऑर्गेनिक उत्पादों का संगठित बाजार खड़ा करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है।

 

एनसीओएल की स्थापना देश में ऑर्गेनिक उत्पादों की वल्यू ै चेन को बढ़ावा देने और किसानों के लिए बाजार तैयार करने के मकसद से की गई है। फिलहाल भारत ऑर्गेनिक्स ब्रांड के तहत करीब दो दर्जन उत्पादों की बिक्री की जाती है जिसमें दालें, गेह, आटा, चा ूं वल और कुछ दूसर उत े ्पाद शामिल हैं।

 

उपलब्धता की चुनौती

एनसीओएल के मैनेजिंग डायरके ्टर विपुल मित्तल ने रूरल वर्ल्ड के साथ बातचीत में बताया कि आम धारणा के विपरीत ऑर्गेनिक उत्पादों के लिए बाजार की कमी नहीं है, बल्कि असली चुनौती इन उत्पादों की उपलब्धता यानी सोर्सिंग की है। इसीलिए हम ऑर्गेनिक उत्पादक प्रमाणित किसान समूहों को अपने साथ सीधे जोड़ना चाहते हैं। हम उनके लिए बाजार खड़ा कर सकते हैं।

 

देश में 2024-25 में 5566 ऐसे समूह थे जो नेशनल प्रोग्राम फॉर ऑर्गेनिक प्रोडक्शन (NPOP) के तहत पंजीकृत थे। इन समूहों में 21,84,807 किसान थे। लेकिन समूहों की संख्या अब घटकर 4000 रह गई है। वहीं कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक पार्टिसिपेटरी गारंटी सिस्टम (PGS) के तहत 78,451 ग्रुप में 23,46,635 किसान पंजीकृत हैं, जिनमें से 2,48,911 के पास सर्टिफिकेट है। संगठित तरीके से इन किसानों के उत्पाद बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था अभी तक कमजोर रही है। यही वह अंतर है जिसे एनसीओएल भरना चाहता है।

 

एनसीओएल की पहल

किसानों से सीधे जुड़ने के लिए एनसीओएल ने ऑनलाइन पोर्टल (https://ncol.coop/sourcingregistration.html) पर पंजीकरण प्रक्रिया शुरू की है। विपुल मित्तल बताते हैं कि कोई भी प्रमाणित किसान समूह अपने उत्पाद, मात्रा और अन्य विवरण हमसे साझा कर सकता है। इसके बाद एनसीओएल सीधे इन समूहों के साथ व्यापारिक बातचीत करगा। य े दि उत्पाद निर्धारित गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं, तो कीमत तय की जाएगी। इस व्यवस्था की शुरुआत मार्च माह से कर दी गई है।

 

इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता को विशषे महत्व दिया गया है। एक महत्वपूर्णशर्त यह है कि जुड़ने वाले समूहों को यह बताना होगा कि उन्होंने किसानों को कितना मूल्य दिया है।

 

किसान और उपभोक्ता हितों का ध्यान

एनसीओएल की रणनीति का एक अहम पहलू यह है कि वह ऑर्गेनिक उत्पादों के लिए गैर-ऑर्गेनिक उत्पादों से अधिक कीमत देने को तैयार है। साथ ही, वह ऑर्गेनिक प्रमाणन की लागत भी वहन करने की योजना बना रहा है। हालांकि, इसके साथ एक संतुलन बनाना भी जरूरी है। संस्था का प्रयास है कि किसानों को बेहतर दाम मिलने के बावजूद ऑर्गेनिक उत्पाद उपभोक्ताओं के लिए किफायती बने रहें।

 

मित्तल बताते हैं कि “भारत ऑर्गेनिक्स” के उत्पाद सभी प्रमुख ई-कॉमर्सप्लेटफार्म पर उपलब्ध हैं। ऑर्गेनिक उत्पादों को लोगों की पहुंच में लाने की रणनीति के तहत हम बहुत ही किफायती दाम रख रह हैं ता े कि बाजार बड़ा हो सके और किसानों को रसायन मुक्त खेती करने का फायदा मिल सके। एनसीओएल द्वारा ऑर्गेनिक सर्टिफाइड ग्रुप्स को सीधे जोड़ने की हमारी रणनीति इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए है।

 

इकोसिस्टम की कमी

ऑर्गेनिक खेती की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक इसका अधूरा इकोसिस्टम है। रासायनिक खेती के लिए जहां एक मजबूत सप्लाई चेन और इकोसिस्टम मौजूद है, वहीं ऑर्गेनिक खेती के लिए ऐसी व्यवस्था अभी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई है।

 

मित्तल कहते हैं कि पहले हमें देखना है कि किसानों को ऑर्गेनिक उत्पाद उगाना आता है या नहीं। इसके लिए जरूरी इनपुट की सप्लाई चेन है या नहीं। साथ ही ऑर्गेनिक प्रमाणन में ढाई साल का समय लगता है। इस अवधि में किसान अपने उत्पाद को ऑर्गेनिक के रूप में नहीं बेच सकते हैं। इस अवधि में होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे होगी? जब तक इन सभी मुद्दों को हल करने वाला सिस्टम नहीं बनेगा, तब तक ऑर्गेनिक खेती की राह मुश्किल है।

 

इसके अलावा, ऑर्गेनिक खेती के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता की भी कमी है। जब तक इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक समग्र इकोसिस्टम विकसित नहीं किया जाता, तब तक ऑर्गेनिक खेती को व्यापक स्तर पर अपनाना चुनौतीपूर्ण बना रहगा।

 

विपुल मित्तल

एमडी, एनसीओएल

 

भारत ऑर्गेनिक्स के प्रत्येक पैकेट पर एक क्यूआर कोड दिया गया है, जिसे स्कैन करके उपभोक्ता उस उत्पाद के बैच की केमिकल रेजिड्यू रिपोर्ट देख सकता है। यह कदम पारदर्शिता बढ़ाता है और उपभोक्ताओं के विश्वास को भी मजबूत करता है।  

 

प्रमाणन और प्रशिक्षण

ऑर्गेनिक समूहों के लिए प्रमाणन और प्रशिक्षण की लागत भी एक बड़ी बाधा है। यह लागत पांच लाख रुपये से लेकर दो करोड़ रुपये तक हो सकती है। एक समूह में अधिकतम 500 किसान शामिल हो सकते हैं। जिन किसानों के पास चार हके ्टेयर या उससे अधिक भूमि है उनके लिए अलग से जांच की प्रक्रिया होती है। साथ ही ऐसे किसानों की जोत का आकार ग्रुप की कुल भूमि के 50 फीसदी से कम होना चाहिए।

 

सरकार का तर्क है कि अधिक जमीन और सदस्य होने से मॉनिटरिंग मुश्किल है। कई बार इन मानकों और प्रक्रियाओं में बदलाव की मांग भी उठी है। जनवरी 2024 में एनपीओपी का नया संस्करण जारी किया गया, जिसमें कुछ संशोधन किए गये। लेकिन व्यापक स्तर पर बदलाव की आवश्यकता बनी हुई है। दरअसल, आर्गेनिक उत्पादन की प्रक्रिया एक क्लोज्ड ग्रुप की तरह है और आम किसान तक इसमें पहुंच बढ़ाना आसान नहीं है।

 

भंडारण और लॉजिस्टिक्स की चुनौती

ऑर्गेनिक उत्पादों के भंडारण के लिए भी विशष व्यवस्था की आवश्यकता होती है। गोदाम भी ऑर्गेनिक सर्टिफाइड होने जरूरी हैं और पैकिंग के लिए विशषे कुकून बैग का उपयोग किया जाता है। भंडारण के बाद गोदामों में कार्बन डाइऑक्साइड की फॉगिंग की जाती है, जो उत्पादों को कीटों से सुरक्षित रखती है। इससे लागत बढ़ जाती है।

 

इसके विपरीत, गैर-ऑर्गेनिक उत्पादों के भंडारण में रासायनिक फॉगिंग का उपयोग किया जाता है, जिस पर कम खर्च आता है लेकिन खाद्य पदार्थों में केमिकल अवशषे का खतरा रहता है। विशषज्ञों े के अनुसार खाद्य पदार्थों में मिलने वाले अधिकांश केमिकल रेजिड् इस फॉ यू गिंग से ही आते हैं। उद्योग का कहना है कि स्टोरज की मॉ े निटरिंग एपीडा को करनी चाहिए ताकि उत्पादों की प्रामाणिकता पर नजर रखी जा सके।

 

विपुल कहते हैं कि एनसीओएल ने “भारत ऑर्गेनिक्स” ब्रांड के तहत एक अभिनव पहल की है। इसके प्रत्येक उत्पाद पैकेट पर एक क्यूआर कोड दिया गया है, जिसे स्कैन करके उपभोक्ता उस उत्पाद के बैच की केमिकल रेजिड् रयूिपोर्ट देख सकता है। यह कदम न केवल पारदर्शिता बढ़ाता है, बल्कि उपभोक्ताओं के विश्वास को भी मजबूत करता है। इससे ऑर्गेनिक उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ेगी और बाजार का विस्तार होगा।

 

बाजार की संभावनाएं

देश में ऑर्गेनिक उत्पादों के क्त्र में षे निजी कंपनियां भी सक्रिय हैं। कई ब्रांड बाजार में मौजूद हैं, लेकिन उनका अधिकांश कारोबार निर्यात पर आधारित है। उद्योग सूत्रों का कहना है कि देश में ये ब्रांड करीब 500 करोड़ रुपये के कारोबार पर ही सिमट जाते हैं, इसलिए ऑर्गेनिक उत्पादों के लिए बड़ी संभावना है।

 

यदि घरलू स े ्तर पर ऑर्गेनिक उत्पादों को किफायती बनाकर इनकी मांग को बढ़ाया जाए तो यह क्त्र तेजी से विस षे ्तार कर सकता है। भारत में ऑर्गेनिक खेती के सामने चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन संभावनाएं व्यापक हैं। अब तक किसानों को सीमित बाजार और कम कीमत जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा है, लेकिन एनसीओएल जैसी पहल इस स्थिति को बदल सकती हैं।

 

 

स्नकै करें: NCOL पोर्टल पर किसान समूह पंजीकरण फार्म


हरवीर सिंह
प्रधान संपादक

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