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दुधारू पशु नस्ल सुधार की दिशा में ऐतिहासिक सफलता

आईसीएआर-आईवीआरआई में विशेष तकनीक के जरिए स्वदेशी गोवंश प्रजनन को बढ़ावा, उन्नत प्रजनन से चार बछड़ों और एक बछिया का जन्म

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डॉ. राघवेंद्र भट्टा

आईसीएआर-भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान (आईसीएआरआईवीआरआई) ने पशु स्वास्थ्य और उनकी उन्नत प्रजाति तैयार करने में एक समृद्ध और गौरवशाली विरासत कायम की है। इस संस्थान ने ग्रामीण समृद्धि बढ़ाने और भारत के डयरी क् े त्र को मजबूत करने में पर षे िवर्तनकारी भूमिका निभाई है। ऐसी ही एक ऐतिहासिक वज्ञानि ै क उपलब्धि में संस्थान ने उन्नत प्रजनन तकनीक - अल्ट्रासाउंडनिर्देशित ट्रांसवेजाइनल ओसाइट एस्पिरेशन, इन विट्रो एम्ब्रियो प्रोडक्शन और एम्ब्रियो ट्रांसफर (OPU–IVF–ET) का उपयोग करते हुए साहीवाल नस्ल के चार बछड़ों और एक बछिया का उत्पादन किया है। सबसे पहले 28 फरवरी 2026 को बछिया जन्मी। उसे “गौरी” नाम दिया गया है। उसके बाद अगले चार दिनों में चार स्वस्थ बछड़ों का जन्म हुआ। यह उपलब्धि स्वदेशी गायों में उन्नत प्रजनन जैव-प्रौद्योगिकी के उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

 

इन बछियों का उत्पादन आनुवशंिक रूप से श्रेष्ठ जर्मप्लाज्म के उपयोग से किया गया है, जो आनुवशंिक सुधार के लिए एक रणनीतिक और विज्ञान-आधारित दृष्टिकोण को दर्शाता है। दाता (डोनर) साहीवाल गाय एक उत्कृष्ट पशु थी, जो प्रतिदिन 12 लीटर से अधिक दूध देती थी। वीर्य एक प्रमाणित सांड से लिया गया था, जिसकी मां का दूध उत्पादन लगभग 3,320 किलोग्राम प्रति दुग्ध-अवधि दर्जकिया गया था। इस तरह की श्रेष्ठ आनुवांशिक चयन प्रक्रिया देसी नस्लों की उत्पादकता और प्रदर्शन को सटीक प्रजनन तकनीक के माध्यम से बढ़ाने की आईवीआरआई की प्रतिबद्धता को रखां े कित करती है।

 

आईवीआरआई ने वर्ष 2018 में एम्ब्रियो ट्रांसफर के माध्यम से देसी गोवशं प्रजनन कार्यक्रम को पुनः शुरू किया था। इस दौरान इन-विवो तकनीक, विशषे रूप से मल्टीपल ओव्यूलेशन एंड एम्ब्रियो ट्रांसफर (MOET) के जरिए फार्म और फील्ड दोनों परिस्थितियों में लगभग 30 बछड़ों-बछियों का उत्पादन किया गया। हालांकि इन विधियों की अंतर्निहित सीमाएं थीं, जैसे उच्च हार्मोन लागत, सीमित दाता उपयोग और संचालन संबंधी चुनौतियां। इसे देखते हुए संस्थान ने 2022-23 के दौरान अधिक बहुमुखी और प्रभावी ओपीयू-आईवीएफ-ईटी तकनीक की ओर रणनीतिक रूप से कदम बढ़ाया।

 

उत्कृष्ट तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन करते हुए आईवीआरआई की टीम ने देसी गायों और भैंसों में बिना हार्मोनल उत्तेजना (नॉन-स्टिम्युलेटड डोनर कंडी े शन) के अल्ट्रासाउंड-निर्देशित ओपीयू (ओवम पिक-अप) प्रक्रिया को सफलतापूर्वक मानकीकृत किया है। इसके परिणाम बेहद उत्साहजनक रह हैं। े थारपारकर गायों में प्रति डोनर औसतन लगभग 14.5 ओसाइट (अंडाणु), साहीवाल में 13.14 और मुर्रा भैंस में 4.5–5.5 ओसाइट प्राप्त हुए। ब्लास्टोसिस्ट उत्पादन दर गायों में 47 प्रतिशत से अधिक और मुर्रा भैंस में 42 प्रतिशत से अधिक रही, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर की अग्रणी प्रयोगशालाओं के मानकों के बराबर है। इन नस्लों में सफल गर्भधारण इस तकनीक की कुशलता, दक्षता और फील्ड स्तर पर उपयोगिता को भी प्रमाणित करती है।

 

साहीवाल नस्ल की गायों में 2023 में शुरू किए गए आईवीएफ-भ्ण प्रत रू ्यारोपण कार्यक्रम को प्रारंभ में कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालांकि निरंतर वज्ञानि ै क सुधार और गहन अनुसंधान के परिणामस्वरूप 2025 में बड़ी सफलता हासिल हुई। इस दौरान क्रॉसब्रीड की वृंदावनी गायों में 16 भ्ण प्रत रू ्यारोपित किए गए, जिनमें से पांच में गर्भधारण की पुष्टि हुई। यह उपलब्धि आईवीआरआई टीम के धर्य ै, समर्पण और तकनीकी दक्षता को दर्शाती है। 

 

साहीवाल गाय में अल्ट्रासाउंड-निर्शिदे त ट्रांसवेजाइनल ओसाइट एस्पिरेशन।

 

अपनाई गई प्रक्रिया

यह सफलता एक सुव्यवस्थित, मानकीकृत और सावधानीपूर्वक तैयार की गई कार्यप्रणाली पर आधारित है। प्रक्रिया की शुरुआत उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता और अनुकूल एंट्रल फॉलिकल संख्या (18 से अधिक) वाले श्रेष्ठ दाता पशुओं के चयन से होती है। इसके बाद, प्रारंभिक ल्यूटियल या फॉलिक्युलर चरण के दौरान अल्ट्रासाउंडनिर्देशित ट्रांसवेजाइनल एस्पिरेशन तकनीक से अंडाणु (ओसाइट) निकाले जाते हैं, जिसमें नियंत्रित नकारात्मक दबाव (लगभग 70-75 एमएम एचजी) का उपयोग किया जाता है ताकि अधिकतम रिकवरी सुनिश्चित हो सके।

 

प्राप्त अंडाणुओं को उनकी संरचनात्मक गुणवत्ता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, जिसके बाद उन्हें सटीक रूप से नियंत्रित ट्राई-गैस इन्क्यूबेशन परिस्थितियों में इन-विट्रो परिपक्व किया जाता है। फिर, परिपक्व अंडाणुओं का निषेचन आनुवशंिक रूप से श्रेष्ठ सांडों के प्रसंस्कृत वीर्य के माध्यम से किया जाता है। उच्च गतिशीलता और बेहतर निषेचन क्षमता सुनिश्चित करने के लिए वीर्य को उन्नत पर्कोल ग्रेडिएंट तकनीक से प्रोसेस किया जाता है। इससे उत्पन्न भ्णों को लगभग रू सात दिनों तक नियंत्रित परिस्थितियों में संवर्धित किया जाता है, जिसमें ब्लास्टोसिस्ट के विकास और गुणवत्ता की लगातार निगरानी की जाती है। यह एकीकृत और अत्यधिक नियंत्रित प्रक्रिया उच्च ब्लास्टोसिस्ट उत्पादन और सफल गर्भधारण परिणाम प्राप्त करने में महत्वपूर्ण साबित हुई है।

 

यह कार्य डॉ. बृजेश कुमार (पशु प्रजनन विभाग) के नेतृत्व वाली टीम ने किया। उनके साथ डॉ. विक्रांत सिंह चौहान और डॉ. विकास चंद्र (फिजियोलॉजी एवं जलवायु विज्ञान विभाग), तथा डॉ. एम. के. पात्रा (पशुधन उत्पादन प्रबंधन) शामिल रहे, जिन्हें समर्पित शोधार्थियों का सहयोग प्राप्त हुआ। इस प्रयास का मार्गदर्शन संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. एस. के. सिंह के दूरदर्शी नेतृत्व में किया गया, जबकि संस्थागत सहयोग डॉ. मुकेश सिंह (प्रभारी, एलपीएम), डॉ. एम. एच. खान (प्रमुख, पशु प्रजनन विभाग), डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह (प्रमुख, फिजियोलॉजी एवं जलवायु विज्ञान विभाग) और डॉ. अनुज चौहान (प्रभारी, गाय एवं भैंस फार्म) से मिला।

 

पिछले ढाई वर्षों में टीम ने साहीवाल और थारपारकर जैसी देसी गाय की नस्लों के साथ-साथ मुर्रा भैंस के लिए ओपीयू-आईवीएफ प्रोटोकॉल को व्यवस्थित रूप से मानकीकृत किया है, जिससे उच्च स्तर की तकनीकी स्थिरता और पुनरुत्पादन क्षमता हासिल की गई है। आगे आईसीएआर-आईवीआरआई का लक्ष्य फार्म और फील्ड दोनों स्तरों पर उत्कृष्ट देसी गायों और भैंसों के उत्पादन को बढ़ाना है। साथ ही सहायक प्रजनन तकनीक में प्रशिक्षित कुशल मानव संसाधन का मजबूत समूह तैयार करना है। इन प्रयासों से देसी पशधुन की उत्पादकता बढ़ने, किसानों की आय में सुधार होने और सतत ग्रामीण विकास को मजबूती मिलने की उम्मीद है, जिससे भारत के पशधुन क्त्र में व षे ्यापक बदलाव आएगा।

 

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव और आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट भारतीय कृषि और पशुधन प्रणाली को सशक्त बनाने में उन्नत तकनीक की परिवर्तनकारी भूमिका पर जोर देते हैं। उन्होंने सहायक प्रजनन तकनीकों में आईसीएआरआईवीआरआई की उपलब्धियों की सराहना की और ओपीयू-आईवीएफ-ईटी तकनीक के सफल प्रयोग से उच्च गुणवत्ता वाली साहीवाल नस्ल की बछिया के उत्पादन को आनुवंशिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि क्षमता निर्माण और सहायक प्रजनन तकनीक के व्यापक प्रसार से किसानों की आय बढ़ाने और दीर्घकालिक सस्टेनेबिलिटी सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। उन्होंने विश्वास जताया कि आईवीआरआई के प्रयास देशभर में उन्नत प्रजनन तकनीक को तेजी से अपनाने में सहायक होंगे और पशुधन क्षेत्र को और मजबूत करेंगे। 

 

इन प्रयासों से देसी पशुधन की उत्पादकता बढ़ने, किसानों की आय में सुधार होने और सतत ग्रामीण विकास को मजबूती मिलने की उम्मीद है, जिससे भारत के पशुधन क्षेत्र में व्यापक बदलाव आएगा।


डॉ. राघवेंद्र भट्टा
उप महानिदेशक (पशु विज्ञान), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)

RNI No: DELBIL/2024/86754 Email: [email protected]