असम में रबी फसल की संभावनाओं का दोहन
आईसीएआर-अटारी का धान के परती इलाकों में रबी फसलें शुरू करने का प्रयोग, कृषि उत्पादन बढ़ने के साथ किसानों की आय में भी होगी वद्धि
डॉ. कादरीवेल गोविंदासामी
पूर्वोत्तर राज्य असम में कृषि की प्रमुख संरचनात्मक कमजोरियों में से एक है एकल फसल प्रणाली (मोनोक्रॉपिंग) का प्रभुत्व, विशेष रूप से खरीफ मौसम में साली धान की व्यापक खेती। असम में कृषि मुख्यतः वर्षा पर निर्भर है और अधिकांश किसान एक ही फसल चक्र पर निर्भर रहते हैं। यह आमतौर पर साली धान के इर्द-गिर्द केंद्रित होता है। राज्य में कुल कृषि योग्य क्षेत्र के बड़े हिस्से में इसकी खेती की जाती है। हालांकि साली धान राज्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन इस एक फसल पर अत्यधिक निर्भरता के कारण कृषि भूमि और संसाधनों का प्रभावी उपयोग नहीं हो पाता। साली धान की कटाई के बाद रबी मौसम में बड़े स्तर पर कृषि भूमि खाली पड़ी रहती है। यह राइस फेलो भूमि, फसल गहनता और विविधीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण संभावना प्रस्तुत करती है।
हर वर्ष इस भूमि के अपर्याप्त प्रयोग के कारण आर्थिक नुकसान होता है, भूमि और जल संसाधनों की बर्बादी होती है, और ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार के अवसर सीमित रह जाते हैं। यदि इन परती भूमि का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाए, तो इससे कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है, किसानों की आय बढ़ सकती है और असम की कृषि अर्थव्यवस्था के समग्र विकास को गति मिल सकती है।

साली धान की कटाई के बाद परती भूमि का बन ा रहना लंबे समय से नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं और कृषि विकास एजेंसियों के लिए एक गंभीर मुद्दा रहा है। विभिन्न अध्ययनों में बताया गया है कि असम में तिलहन, दलहन और सब्जियों जैसी अल्पावधि वाली रबी फसलों की खेती के लिए अनुकूल कृषि-जलवायु परिस्थितियां उपलब्ध हैं। हालांकि रबी फसल प्रणाली को अपनाने में कई बाधाएं भी आई हैं। इनमें अपर्याप्त सिंचाई इन्फ्रास्ट्रक्चर, उपयुक्त फसल किस्मों के बारे में जागरूकता की कमी, गुणवत्तापूर्ण बीजों की सीमित उपलब्धता, एक्सटेंशन सेवाओं का अभाव और कमजोर मार्केट लिंक शामिल हैं। इसके अलावा, छोटी और बिखरी हुई जोत तथा सीमित मशीनीकरण ने भी किसानों को दोहरी फसल प्रणाली अपनाने से रोका है। परिणामस्वरूप, मिट्टी में नमी और अनुकूल जलवायु होने के बावजूद, सर्दियों में भूमि का बड़ा हिस्सा अनुपयोगी बना रहता है।

राइस फेलो क्षेत्र की विशाल संभावनाओं को पहचानते हुए, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने "वन टीम वन टास्क" अवधारणा के तहत एक रणनीतिक पहल शुरू की है। इस पहल का उद्देश्य विशेषकर पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में, जहां एकल फसल प्रणाली प्रचलित है, परती भूमि के प्रभावी और टिकाऊ उपयोग को बढ़ावा देना है। इस कार्यक्रम में फसल गहनता, विविधीकरण और वैज्ञानिक तकनीक के समावेशन पर जोर दिया गया है, ताकि उत्पादकता और किसानों की आय में वृद्धि हो सके। सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए आईसीएआर ने इस समस्या के समग्र और समन्वित समाधान के लिए अनुसंधान संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, एक्सटेंशन एजेंसियों और राज्यों के विभागों को एक मंच पर जोड़ा है। यह पहल व्यावसायिक रूप से लाभकारी फसलों को बढ़ावा देने पर भी केंद्रित है, जो किसानों को अधिक आय प्रदान कर सके, साथ ही खाद्य और पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करे।
इस राष्ट्रीय पहल के तहत आईसीएआर क ृषि टेक्नोलॉजी एप्लिकेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-ATARI), गुवाहाटी ने फसल-विशिष्ट आईसीएआर संस्थानों, असम कृषि विश्वविद्यालय तथा असम सरकार के विभिन्न विभागों के समन्वय से चालू रबी मौसम के दौरान 30,000 हेक्टेयर परती भूमि को खेती के दायरे में लाने का कार्यक्रम शुरू किया है। यह प्रयास राज्य में फसल विविधीकरण और भूमि के बेहतर उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

राइस फेलो क्षेत्र की संभावनाओं को पहचानते हुए आईसीएआर ने एक रणनीतिक पहल शुरू की है। इसका उद्देश्य पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में, जहां एकल फसल प्रणाली प्रचलित है, परती भूमि के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देना है।
इस पहल के तहत स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों और बाजार की मांग के अनुरूप उपयुक्त एवं लाभकारी रबी फसलों - तोरिया, मक्का, आलू और मसूर की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। निर्धारित क्षेत्र में से तोरिया के लिए 17,000 हेक्टेयर, मक्का के लिए 7,000 हेक्टेयर, आलू के लिए 4,000 हेक्टेयर और मसूर के लिए 2,000 हेक्टेयर क्षेत्र आवंटित किया गया है।
कार्यक्रम का सफल क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए अधिक उत्पादकता वाली और प्रमाणित किस्मों के गुणवत्तापूर्ण बीज राज्य के 26 कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के नेटवर्क के माध्यम से किसानों को निःशुल्क उपलब्ध कराया गया। बीजों का समय पर वितरण रबी फसलों को अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ है। राज्य में खाद्य तेल की कमी दूर करने के लिए तोरिया की खेती पर विशेष जोर दिया गया है। किसानों के बीच टीएस-36, टीएस-38 और टीएस-67 जैसी उन्नत एवं अधिक उत्पादकता वाली किस्मों को बढ़ावा दिया गया है। साथ ही वैज्ञानिक फसल प्रबंधन पद्धतियों को भी प्रोत्साहित किया गया है। ये किस्में कम अवधि में तैयार होने, अधिक उत्पादन क्षमता और नमी की परिस्थितियों में अनुकूलन के लिए जानी जाती हैं। इसलिए ये धान कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों के लिए उपयुक्त हैं।
बीज वितरण के अलावा किसानों के ज्ञान और कौशल को बढ़ाने के लिए व्यापक क्षमता निर्माण कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। प्रशिक्षण कार्यक्रम और फील्ड प्रदर्शन आदि के माध्यम से किसानों को उन्नत उत्पादन तकनीकों, पोषक तत्व प्रबंधन, कीट एवं रोग नियंत्रण तथा फसल कटाई के बाद की प्रक्रियाओं के बारे में जागरूक किया गया। वैज्ञानिकों और एक्सटेंशन कर्मियों द्वारा नियमित रूप से खेतों के दौरे के जरिए कृषि परामर्श सेवाएं भी प्रदान की गईं। इससे किसानों को समय पर तकनीकी मार्गदर्शन सुनिश्चित हो सका है।
कार्यक्रम की निरंतर निगरानी और मूल्यांकन से जमीनी स्तर की चुनौतियों की पहचान करने और सुधार के उपाय लागू करने में मदद मिली है। इन समन्वित प्रयासों ने किसानों के विश्वास को काफी बढ़ाया और परती भूमि में रबी फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया है।
कार्यक्रम से प्राप्त प्रारंभिक परिणाम काफी उत्साहजनक रहे हैं। विभिन्न जिलों में किए गए क्रॉप कटिंग प्रयोगों से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि के संकेत मिले हैं। क्षेत्रफल और उत्पादकता के आधार पर उत्पादन में वृद्धि का अनुमान लगाया गया है, जिसमें मक्का में लगभग 50,000 टन, आलू में 32,000 टन और मसूर में 2,000 टन की बढ़ोतरी संभावित है। ये परिणाम दर्शाते हैं कि धान की परती भूमि का उपयोग कृषि उत्पादन बढ़ाने में काफी प्रभावी साबित हो सकता है। इन फसलों से किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त हुई है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और आजीविका सुरक्षा में सुधार हुआ है।

क्रॉप कटिंग प्रयोगों से उत्पादन बढ़ने के संकेत हैं। मक्का में लगभग 50,000 टन, आलू में 32,000 टन और मसूर में 2,000 टन की बढ़ोतरी संभावित है। ये परिणाम दर्शाते हैं कि धान की परती भूमि का उपयोग कृषि उत्पादन बढ़ाने में काफी प्रभावी साबित हो सकता है।
वर्तमान पहल की सफलता के आधार पर अगले पांच वर्षों में कार्यक्रम के विस्तार के लिए एक व्यापक रोडमैप प्रस्तावित किया गया है। इस रोडमैप का उद्देश्य परती क्षेत्रों को कम से कम 60% तक घटाना है, जिसके तहत लगभग चार से पांच लाख हेक्टेयर भूमि को रबी फसलों के अंतर्गत लाया जाएगा। इसका अर्थ है कि हर वर्ष कम से कम एक लाख हेक्टेयर परती भूमि को खेती में शामिल किया जाएगा। इतने बड़े पैमाने पर विस्तार से राज्य में फसल तीव्रता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है। वर्तमान में सीमित दोहरी फसल प्रणाली के कारण असम में फसल तीव्रता लगभग 120% है। रबी फसलों के विस्तार के साथ यह बढ़कर लगभग 180% तक पहुंचने का अनुमान है। यह बदलाव धान-तोरिया, धान-मक्का और धान-आलू जैसी दोहरी फसल प्रणालियों को व्यापक स्तर पर अपनाने में मदद करेगा।
प्रस्तावित पहल से प्रमुख रबी फसलों की उत्पादकता और उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार होने की उम्मीद है। तोरिया की खेती के क्षेत्रफल में महत्वपूर्ण विस्तार के साथ-साथ उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने से 20 से 30 प्रतिशत तक उत्पादकता वृद्धि का अनुमान है। इससे राज्य में खाद्य तेल की कमी को कम करने और आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिलेगी। इसी प्रकार, संकर किस्मों और बेहतर कृषि पद्धतियों के उपयोग से मक्का की उत्पादकता में 30 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि होने की संभावना है। मक्का एक बहु-उद्देशीय फसल है, जिसका उपयोग खाद्य और पशु आहार के अलावा बायो-एथेनॉल जैसे औद्योगिक उपयोग में किया जाता है। मक्का उत्पादन में वृद्धि से पशुधन और पोल्ट्री क्षेत्रों में चारे की कमी दूर करने में भी सहायता मिलेगी।
इस पहल में आलू की खेती भी एक महत्वपूर्ण घटक है। उपयुक्त कृषि-जलवायु क्षेत्रों में आलू के रकबे के विस्तार से 25 से 35 प्रतिशत तक उत्पादकता बढ़ने की उम्मीद है। उच्च मूल्य वाली नकदी फसल के रूप में आलू किसानों को पारंपरिक फसलों की तुलना में बेहतर आय प्रदान करता है। उन्नत किस्मों की उपलब्धता के साथ बेहतर भंडारण और विपणन सुविधाएं इसकी लाभप्रदता को और बढ़ाएंगी। धान की परती भूमि में मसूर की खेती को बढ़ावा देने से जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता में सुधार होगा, साथ ही स्थानीय समुदायों को प्रोटीन से भरपूर खाद्य स्रोत भी उपलब्ध होगा। कार्यक्रम का आर्थिक प्रभाव काफी महत्वपूर्ण रहने की उम्मीद है। परती भूमि में रबी फसल अपनाने वाले किसानों को प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष लगभग 30,000 से 60,000 रुपये तक अतिरिक्त आय होने का अनुमान है। यह आय वृद्धि फसल विविधीकरण, बेहतर उत्पादकता, बेहतर बाजार अवसरों और रोजगार सृजन के माध्यम से संभव होगी। साली धान की कटाई के बाद बेरोजगार रहने वाले ग्रामीण श्रमिकों को भूमि तैयार करने, बुवाई, अंतर-फसली कार्यों, कटाई और कटाई के बाद की गतिविधियों में रोजगार के अवसर मिलेंगे। इससे मौसमी बेरोजगारी में कमी आएगी और ग्रामीण आजीविका में सुधार होगा।
इसके अलावा, यह पहल इनपुट आपूर्ति, कृषि यंत्रीकरण, भंडारण, प्रसंस्करण और परिवहन से जुड़ेग्रामीण उद्यमों के विकास को भी प्रोत्साहित करेगी। मक्का, तिलहन और आलू के उत्पादन में वृद्धि से मूल्य संवर्धन और एग्रो-प्रोसेसिंग उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। इन सहायक क्षेत्रों के विकास से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और शहरों की ओर होने वाले पलायन में कमी आएगी। बेहतर मार्केट लिंकेज और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास से कृषि मूल्य श्रृंखला सशक्त होगी। इस कार्यक्रम का खाद्य और पोषण सुरक्षा पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। तिलहन उत्पादन बढ़ने से खाद्य तेल की कमी दूर करने में मदद मिलेगी, जबकि मसूर जैसी दलहनी फसलों की खेती से प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ेगी। मक्का और आलू का उत्पादन कार्बोहाइड्रेट आपूर्ति और पशु आहार संसाधनों को सुदृढ़ करेगा। फसलों का विविधीकरण ग्रामीण परिवारों के आहार में विविधता बढ़ाएगा और पोषण स्तर में सुधार करेगा। इसके अलावा, फसल प्रणाली में दलहनों को शामिल करने से जैविक पदार्थ की मात्रा और नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ने के कारण मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होगा।
आईसीएआर-अटारी की तरफ से अन्य आईसीएआर संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, संबंधित विभागों, कृषि विज्ञान केंद्रों तथा अन्य हितधारकों के साथ समन्वय के माध्यम से किए गए लक्षित हस्तक्षेपों ने यह प्रदर्शित किया है कि उचित योजना, समय पर इनपुट आपूर्ति और मजबूत विस्तार सेवाओं के जरिए परती क्षेत्रों को सफलतापूर्वक उत्पादक खेती के दायरे में लाया जा सकता है। इससे असम में परती भूमि में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है, जिससे फसल तीव्रता, उत्पादकता और किसानों की आय में वृद्धि होगी। संबंधित हितधारकों के निरंतर सहयोग से असम कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ सकता है और परती भूमि के उपयोग एवं गहन खेती के क्षेत्र में अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए एक मॉडल के रूप में उभर सकता है।
परती भूमि में रबी फसल अपनाने वाले किसानों को प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष लगभग 30,000 से 60,000 रुपये तक अतिरिक्त आय होने का अनुमान है। यह आय वृद्धि फसल विविधीकरण, बेहतर उत्पादकता, बेहतर बाजार अवसरों और रोजगार सृजन के माध्यम से संभव होगी।
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