कृषि में ग्रोथ के अवसर तलाशने होंगे
Prof. Ramesh Chand
भा रत की आजादी के समय रूस में कलेक्टिव फार्मिंग की व्यवस्था थी, चीन में कम्यून सिस्टम था। उसमें सभी किसानों की जमीन मिलाकर खेती करने की व्यवस्था थी। उसमें किसी किसान की व्यक्तिगत जमीन नहीं होती थी। हमारे पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत में भी ऐसी व्यवस्था चाहते थे। चौधरी चरण सिंह ने उस नीति के विरोध में किताब लिखी थी- जॉइंट फार्मिंग एक्सरेड। वे मानते थे कि भारत के किसानों का जमीन के साथ जुड़ाव संतान से भी ज्यादा है। आप चाहे उन्हें कलेक्टिव फार्मिंग के जितने आर्थिक लाभ बताएं, जमीन के साथ मां-बेटे का रिश्ता होने के कारण वे कभी इसके लिए तैयार नहीं होंगे, और न ही हमें इसका प्रयास करना चाहिए। उन्होंने किताब में इसके पक्ष में अच्छी दलीलें भी दी हैं। इससे कृषि के प्रति उनकी दूरदर्शिता का भी पता चलता है। यह भी कि वे कृषि, कृषक और ग्रामीण व्यवस्था को किस तरह देखते थे। इतने वर्षों के बाद भी उनकी बातें प्रासंगिक हैं। उन्होंने जो ग्रामीण कुटीर उद्योग को फोकस में रख कर ग्रामीण विकास करने की पैरवी की थी, आज हम दोबारा उसी की बात कर रहे हैं। आज हम एग्रीकल्चर-इंडस्ट्री लिंकेज पर जोर दे रहे हैं।
कृषि को इकोनॉमिक ग्रोथ का इंजन बनाने के लिए हमें कृषि के इर्द-गिर्द वातावरण के हिसाब से ही सोचना पड़ेगा। उस वातावरण से हटकर अगर हम सोचेंगे तो एक विरोधाभास पैदा होगा और बहुत ज्यादा सफलता भी नहीं मिलेगी। अगर हम समय और परिस्थिति के अनुसार अपने सेक्टर को आगे बढ़ाएं तो उसमें सफलता की संभावना अधिक होगी और गतिरोध भी नहीं होगा। हम रोज सुनते हैं कि देश का एजेंडा विकसित भारत का है। आगे विकसित भारत का लक्ष्य ही देश की प्राथमिकताओं को दिशानिर्देशित करेगा। प्रधानमंत्री ने भी नीति आयोग से इसका विजन तैयार करने के लिए कहा है कि 2047 का भारत विकसित भारत हो। देश दो चीजें लेकर चल रहा है। एक तो यह कि देश को विकसित बनाना है और दूसरा उसे विकसित सब की भागीदारी से बनाना है।
विकसित भारत का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अगले 24 वर्षों तक हमारी अर्थव्यवस्था के आउटपुट में सात से आठ प्रतिशत ग्रोथ चाहिए। अगर हम इतने वर्षों तक इस दर से आगे बढ़ेंगे तो हमारी प्रति व्यक्ति आय इतनी हो जाएगी की हम विकसित देश कहलाने के काबिल हो जाएंगे। वर्ल्ड बैंक के अनुसार जिस देश की प्रति व्यक्ति आय 12,000 डॉलर यानी 10 लाख रुपए से ऊपर होगी उसे हम विकसित कह सकते हैं। अभी प्रति व्यक्ति आय 1,70,000 हजार रुपए के आस-पास है। हमें उसे 24 साल में 6 से 7 गुना करना है। देश ने विकास के इसी रास्ते पर जाने का फैसला किया है और सभी नीतियां इसी के इर्द-गिर्द बनाई जाएंगी।
24 वर्षों तक इतनी ग्रोथ हासिल करने के लिए सभी गतिविधियों को शामिल करना पड़ेगा, चाहे वह कृषि हो, इंडस्ट्री हो या सर्विसेज हो। लेकिन मेरे विचार से कृषि क्षेत्र की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है। इसके कई कारण हैं। हम इकोनॉमी को 12 भागों में बांटते हैं और उसमें सबसे बड़ा कृषि क्षेत्र ही है। मैन्युफैक्चरिंग अब उसके करीब पहुंच गया है। देश की 18 से 20 प्रतिशत आय कृषि क्षेत्र से आती है। अगर इतनी बड़ी हिस्सेदारी वाला सेगमेंट 3.5% से 4% सालाना की दर से नहीं बढ़ेगा तो विकसित भारत का लक्ष्य पाने में बहुत मुश्किल आएगी, यह असंभव भी हो सकता है। इसलिए कृषि क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसमें ऊंची विकास दर सुनिश्चित किए बिना विकसित भारत का सपना पूरा करने में सफलता नहीं मिलेगी।
इसमें निराश होने की बात भी नहीं है। जब आप कोई लक्ष्य निर्धारित करते हैं तो उस तक पहुंचाने के रास्ते तलाशते हैं। अगर कृषि क्षेत्र की ग्रोथ वांछित नहीं होती है तो देश तब भी विकसित होगा, लेकिन हम जो चाहते हैं कि देश में गरीबी न हो, कुपोषण न हो, लोग भूखे न रहें और विकास समावेशी हो, तो वह ग्रोथ नहीं मिलेगी। हो सकता है 40 प्रतिशत लोगों की आय ज्यादा बढ़ जाए, लेकिन बाकी लोगों की स्थिति वही रहे जो पहले थी। वह ग्रोथ इनक्लूसिव नहीं होगी।
सवाल है कि हम कृषि क्षेत्र से जिस भूमिका की उम्मीद करते हैं, क्या वह वैसी भूमिका निभा सकता है। मैं आशावादी व्यक्ति हूं और मुझे लगता है कि ऐसी कोई वजह नहीं जिससे देश को विकसित बनाने में कृषि क्षेत्र अपनी भूमिका से पीछे रहेगा। लेकिन उसके लिए हमें अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मैं कृषक परिवार से हूं, इसलिए कृषि क्षेत्र से मेरा भावनात्मक जुड़ाव रहता है। मेरी राय में सबसे पहले कृषि क्षेत्र के प्रति अपना नजरिया नकारात्मक से बदलकर सकारात्मक की ओर लेकर जाना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि मैं अपनी आंखें मूंद लूं कि वहां कोई समस्या या चुनौती नहीं है। वहां समस्याएं हैं, लेकिन बड़े अवसर भी हैं। मैं इसके दर्जनों उदाहरण दे सकता हूं।
हमारे कुछ राज्य 20 साल से कृषि क्षेत्र में इतनी तेजी से विकास कर रहे हैं कि वहां गैर-कृषि क्षेत्र में भी उतना तेज विकास नहीं है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश इसके उदाहरण हैं। इन राज्यों में कृषि क्षेत्र की विकास दर छह प्रतिशत से ज्यादा है। वहां इंडस्ट्री की ग्रोथ भी इतनी नहीं है। वहां से एक भरोसा आता है कि अगर ये राज्य 6-7% की दर से कृषि विकास हासिल कर सकते हैं तो उनकी नीति को अपना कर हम पूरे देश में कृषि को इस ग्रोथ रेट से आगे क्यों नहीं बढ़ा सकते। यह उदाहरण किसी एक किसान, एक गांव का या एक जिले का नहीं, यह पूरे प्रदेश का उदाहरण है और वे सब बड़े प्रदेश हैं। इसी से हमें यह भरोसा मिलता है कि अगर सही नीतियां बनाई जाएं तो कृषि आर्थिक विकास का इंजन हो सकता है।
कई बार यह सवाल भी उठता है कि कृषि की हालत खराब है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं। मैं पूरी संवेदना के साथ एक उदाहरण देना चाहूंगा। अगर किसी गांव में 1000 युवा हैं और उनमें से 5-10% किसी वजह से कुपोषित या बीमार हैं तो क्या वह गांव खिलाड़ी तैयार करने का प्रयत्न नहीं करेगा? हम सही कदम उठाकर 80-90% लोगों की तकदीर बदल सकते हैं। लेकिन ये बातें सिर्फ कहने के लिए नहीं, इन्हें वास्तविकता का रूप भी देना होगा। मैं यहां दो-चार बातों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा कि कृषि में लंबे समय तक ऊंची विकास दर रखना कैसे संभव है। कृषि क्षेत्र रोजगार का बड़ा साधन रहा है और आगे भी रहेगा।
सवाल है कि कृषि में ग्रोथ के अवसर कहां-कहां से होंगे। बहुत से ऐसे प्रदेश हैं जहां अब भी प्रोडक्टिविटी बहुत कम है। उदाहरण के लिए असम में गाय-भैंस की औसत उत्पादकता दो किलो प्रतिदिन से भी कम है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अगर दो किलो वाला पंजाब या हरियाणा की तरह 8 किलो के स्तर पर आना चाहे तो उसके लिए 400% वृद्धि के अवसर हैं। इसी तरह किसी और फसल की उत्पादकता देख लीजिए। कहीं तो आपको मिलेगा कि हम एक एकड़ में 18 से 20 क्विंटल गेहूं लेते हैं और कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां हम 6 से 7 क्विंटल गेहूं ही ले पाते हैं। इसी तरह अन्य फसलों में, मवेशियों में, फिशरीज में, एग्रो फॉरेस्ट्री में संभावनाएं हैं।
एक और अवसर पैदा होना शुरू हुआ है क्वालिटी फूड में। आपने देखा होगा कि गांव में कई जगह दूध 35 से 40 रुपये लीटर बिकता है तो कहीं 200-300 रुपये लीटर भी बिकता है। आप दूध का उत्पादन करके अपनी आय दो से तीन गुना कर सकते हैं। आज इस देश में बहुत से ऐसे उपभोक्ता हैं जो क्वालिटी के लिए कीमत देने को तैयार हैं। यह सिर्फ दूध की बात नहीं है। आप चावल भी देख लें। यह 30 रुपये किलो बिकता है और 100 रुपये किलो से अधिक भी। इस तरह हम देखते हैं कि क्वालिटी को लेकर काफी संभावनाएं हैं। कृषि में नए तरह की डिमांड आ रही है। कृषि सिर्फ खाद्य का साधन नहीं रह गया है, बल्कि अब लोग इसे अपनी सेहत ठीक रखने में और बीमारी दूर करने में भी प्रयोग करने लगे हैं। साबुन, टूथपेस्ट और बहुत से इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट भी अब बायो किस्म के बनने लगे हैं। ग्रीन क्रेडिट में भी संभावनाएं हैं। इसके बारे में सरकार ने हाल ही घोषणा की है। सोलर एनर्जी को इस्तेमाल करने का अवसर है। यहां तक कि कृषि क्षेत्र में टूरिज्म की संभावनाएं भी आ रही हैं। बहुत से लोग शहर में रहते-रहते जीवन से इतना ऊब गए हैं कि वे गांव में जाकर रहना चाहते हैं। लेकिन इन सबके लिए हमें सकारात्मक फैलानी पड़ेगी और विकास के संसाधनों का प्रयोग करना होगा। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का अपना महत्व है। मैंने पिछले दिनों संसदीय समिति को बताया कि कई जगह आप एमएसपी सुनिश्चित कर दीजिए तो वहां ग्रोथ दोगुनी हो जाएगी। उनमें उत्तर प्रदेश भी एक है। ऐसे बहुत से प्रदेश हैं जहां आप चाहे जितनी मर्जी एमएसपी देते रहें, ग्रोथ नहीं होगी। वहां सैचुरेशन हो चुका है, वहां कुछ और करना पड़ेगा। लेकिन ऐसे प्रदेश भी हैं जहां एमएसपी मिलता ही नहीं। वहां अगर आप एमएसपी दें तो ग्रोथ रेट एकदम से दोगुनी हो जाएगी।
किसानों को अगर बाजार तक पहुंच का अवसर मिले तो उससे भी ग्रोथ तेजी से होगी। इस दिशा में भी कई कदम उठाए गए हैं। बिचौलियों का नेक्सस भी तोड़ने का प्रयत्न किया गया था, लेकिन कुछ किसान भाइयों की समझ से शायद वह ठीक नहीं था। आपने ओपन नेटवर्क डिजिटल कॉमर्स (ओएनडीसी) के बारे में सुना होगा। जैसे कोई इंडस्ट्री वाला अपना प्रोडक्ट अमेजॉन या किसी अन्य प्लेटफॉर्म पर बेच सकता है वैसे ही किसान, किसान संस्था या कोई और अपना प्रोडक्ट ओएनडीसी पर ऑनलाइन बेच सकता है। आप वेबसाइट पर उसकी मात्रा, क्वालिटी, कीमत आदि की जानकारी दीजिए। जिसे उसकी जरूरत होगी वह साइट पर देखेगा तो बिना किसी बिचौलिए के वह खरीद सकता है। मैंने पिछले दिनों इसकी समीक्षा की थी। मुझे यह सबसे अधिक डिसरप्टिव टेक्नोलॉजी लग रही है। इसी तरह सहकारिता क्षेत्र को भी भूमिका निभानी चाहिए, जो अभी डेयरी क्षेत्र तक सीमित रहा है। जहां कोऑपरेटिव अच्छा काम नहीं कर रहे हैं वहां भी डेयरी सेक्टर में अच्छा काम हो रहा है।
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