उम्मीद की किरण
Harvir Singh
कृषि अर्थव्यवस्था में डेयरी ऐसा क्षेत्र है जहां महिला किसान अग्रणी हैं। गाय और भैसों की देखभाल से लेकर उनको चारा देने, साफ सफाई और दूध दुहने तक का अधिकांश काम देश में महिलाओं के ही कंधे पर है। यही नहीं, गांवों में दूध खरीद केंद्र पर दूध ले जाने का काम भी उन्हीं के हिस्से अधिक है। इसके चलते उनके अंदर खुद के अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ी है और अब जब दूध की बिक्री से आने वाला पैसा उनके बैंक खातों में पहुंचने लगा तो यह महिला सशक्तीकरण के एक बड़े बदलाव के रूप में समाज में दिखने लगा है।
रूरल वर्ल्ड के इस अंक में हम पशुपालन और डेयरी सेक्टर के एक और सकारात्मक बदलाव को सामने लेकर आये हैं। पशु स्वास्थ्य यानी वेटरिनरी केयर और सर्विसेज में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी पर हमारी कवर स्टोरी इसे प्रभावी तरीके से सामने ला रही है। जिस तरह डेयरी किसानों में महिलाएं अधिक प्रभावी रूप से स्थापित हुई हैं, उसी तरह वेटरिनरी डॉक्टर से लेकर आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन (एआई) टेक्नीशियन के रूप में महिलाओं की भूमिका बढ़ना एक स्वाभाविक बदलाव है।
आश्चर्यजनक रूप से यह बदलाव आया है उस हरियाणा राज्य में जहां के समाज को पितृसत्तात्मक समाज के रूप में चित्रित किया जाता है। हमारी कवर स्टोरी में इस बदलाव को सामने लाते हुए बताया गया है कि जिस तरह हरियाणा ने साक्षी मलिक और विनेश फोगाट जैसे वैश्विक पटल पर छा जाने वाली महिला ओलंपिक पहलवान दिये हैं, उसी हरियाणा में महिला पशु चिकित्सकों ने पुरुष वर्चस्व वाले प्रोफेशन में एक-तिहाई स्तर पहुंच कर एक नया उदाहरण देश के सामने पेश किया है।
इसी तरह, पोल्ट्री के क्षेत्र में एक साइलेंट रिवोल्यूशन ने देश में करीब ढाई लाख करोड़ रुपये का ब्रॉयलर का मार्केट खड़ा कर दिया है। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के गावों से ग्राउंड रिपोर्ट के जरिये इस बड़े बदलाव को इस अंक में प्रस्तुत किया गया है। इनवेस्टमेंट, टेक्नोलॉजी, रिसर्च, कांट्रैक्ट फार्मिंग और मार्केटिंग के मिक्स ने यह बाजार खड़ा किया। देश के लाखों किसान कांट्रैक्ट फार्मिंग के जरिये कम रिस्क में बेहतर आय हासिल कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि पोल्ट्री बिजनेस की कामयाबी की कहानी में सब्सिडी की कोई भूमिका नहीं है। युवा किसानों के पोल्ट्री फार्मिंग में हाथ आजमाने और राजनांदगांव स्थित आईबी ग्रुप की कंपनी एबीआईएस और उसके जैसी चुनिंदा कंपनियों के पोल्ट्री इंटीग्रेटर के रूप में काम करने के बिजनेस मॉडल ने देश भर में इनवायरनमेंटली कंट्रोल्ड और ओपन पोल्ट्री फार्म के जरिये इसे हकीकत में बदला है। यह बिजनेस तेजी से संगठित क्षेत्र में तब्दील होने के साथ ही बैकवर्ड इंटीग्रेशन की कामयाबी के बाद अब डेयरी उद्योग की तरह फॉरवर्ड इंटीग्रेशन की दिशा में बढ़ रहा है।
एक बदलाव कृषि बजट को लेकर भी है। 23 जुलाई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने चालू वित्त वर्ष 2024-25 का बजट संसद में पेश किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तीसरी बार बनी एनडीए सरकार का यह पहला बजट था। लोगों को उम्मीद थी कि इसमें सरकार कृषि क्षेत्र को लेकर बड़ी घोषणाएं करेगी जो सरकार के पांच साल के कार्यकाल में कृषि और ग्रामीण भारत को लेकर उसकी सोच और नीतियों का संकेत भी देगी। लेकिन बजट के जो प्रावधान सामने आये, उससे लगा कि हमने बजट से कुछ अधिक ही उम्मीदें लगा ली थीं।
हालांकि बजट के एक दिन पहले आये आर्थिक सर्वेक्षण में कृषि को काफी प्राथमिकता दी गई और उसे अर्थव्यवस्था के ग्रोथ इंजन के रूप में एक उम्मीद की तरह पेश किया गया था, लेकिन बजट में ऐसा नहीं दिखा। इसमें कोई बड़ी योजना भी घोषित नहीं की गई। बजट प्रावधानों के साथ ही इनके क्या मायने हैं, बजटीय आवंटन में किस तरह का इजाफा किया गया है और जो घोषणाएं की गई हैं वह किस तरह से कृषि और किसानों पर असर डालेंगी, इसे विस्तार से बजट की स्टोरी में बताने की कोशिश की गई है।
साथ ही पूर्व कृषि एवं खाद्य सचिव टी नंदकुमार की बजट को लेकर एक व्याख्या बजट के पैकेज का हिस्सा है। अपने इस लेख में उन्होंने कृषि क्षेत्र के लिए किस तरह के कदम उठाने की जरूरत है, उस पर रोशनी डाली है। मध्य प्रदेश के पूर्व कृषि सचिव और कृषि मंत्रालय में स्मॉल फार्मर एग्री बिजनेस कंसोर्सियम के पहले प्रमुख रहे पूर्व आईएएस अधिकारी प्रवेश शर्मा ने यह बताते हुए बजट का आकलन किया है कि किसानों और कृषि के लिए किस तरह के प्रावधानों की जरूरत है।
रूरल वर्ल्ड का यह अंक पहले के अंकों की तरह ही देश के कृषि, किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर चल रहे घटनाक्रम, नीतिगत बदलावों और टेक्नोलॉजी के विषयों को समेटे हुए है।
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