कैसे होगा कृषि का कायाकल्प?
Harvir Singh
चालू वित्त वर्ष 2024-25 के पूर्ण बजट से एक दिन पहले संसद में पेश इकोनॉमिक सर्वे (2023-24) ने कृषि क्षेत्र की संभावनाओं की जो तस्वीर पेश की, उससे बजट को लेकर बड़ी उम्मीदें जगी थीं। अगले दिन आये बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कृषि और सहयोगी क्षेत्र को विकसित भारत की अपनी नौ प्राथिकताओं में पहले स्थान पर रखा। उन्होंने उत्पादकता बढ़ाने, रिसर्च को प्राथमिकता और जलवायु परिवर्तन अनुकूल किस्में लाने जैसी घोषणाओं के अलावा सार्वजनिक के साथ निजी क्षेत्र को भी कृषि अनुसंधान के लिए फंड देने जैसी पहल को बजट भाषण में स्थान दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तीसरी सरकार का यह पहला बजट था, इसलिए इससे सरकार के अगले पांच साल के कामकाज की प्राथमिकता का संकेत मिलता है। लेकिन जिस तरह के लक्ष्य हासिल करने की बात बजट में की गई है, उस तरह के नीतिगत प्रावधान और संसाधनों का आवंटन इसमें नहीं दिखता है। हो सकता है सरकार बजट के बाहर कुछ काम करना चाहती हो, अगर ऐसा है तो यह आने वाले दिनों में दिख जाएगा।
वित्त मंत्री ने 2024-25 के बजट में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र के लिए 1.52 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया है। यह पिछले साल से थोड़ा ही अधिक है। वित्त मंत्री ने कहा कि देश में कृषि अनुसंधान प्रणाली की समीक्षा की जाएगी। उत्पादकता में वृद्धि और जलवायु अनुकूल किस्मों के शोध को प्राथमिकता मिलेगी। वहीं, सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र को भी कृषि अनुसंधान के लिए फंड दिया जाएगा। लेकिन पूरे बजट में फंडिंग को लेकर स्पष्टता नहीं है। जहां तक कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के बजट की बात है, तो इसके लिए 9941.09 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है जो पिछले साल 9876 करोड़ रुपये था। बजट बढ़ाए बिना कृषि अनुसंधान का कायाकल्प कैसे होगा, इसे लेकर बजट में स्पष्टता नहीं है। जबकि कृषि अनुसंधान प्रणाली में सुधार के साथ ही बड़े स्तर पर संसाधनों की जरूरत है।
बजट में जलवायु अनुकूल और अधिक उपज वाली 109 किस्में जारी करने की बात कही गई थी। बजट के बाद तीन हफ्ते से भी कम समय में जिस तरह प्रधानमंत्री ने ये किस्में जारी कीं, उससे यही लगता है कि ये पहले से तैयार थीं। ऐसा है तो इन्हें अब तक जारी क्यों नहीं किया जा रहा था? देश में बेहतर पैदावार वाली किस्में नहीं होने से अधिकांश फसलों में हमारी औसत उत्पादकता उच्चतम वैश्विक स्तर के आधे से भी कम है। यह स्थिति कैसे बदलेगी, इसका कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है।
अगले दो साल में एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने की बात कही गई है। लेकिन प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की योजना के लिए बजट में केवल 365 करोड़ रुपये का प्रावधान है। यह राशि पिछले साल 459 करोड़ रुपये थी लेकिन वास्तव में केवल 100 करोड़ रुपये खर्च किये गये। प्राकृतिक खेती और खाद्य सुरक्षा को लेकर देश के वैज्ञानिक समुदाय के बीच एक राय नहीं है। गत वर्षों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के सरकार के प्रयासों का क्या परिणाम रहा है (2022-23 के बजट में गंगा नदी के किनारे प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की बात कही गई थी), उत्पादन और किसानों की आय पर क्या असर पड़ा, इसकी जानकारी न तो बजट में दी गई और न ही कृषि मंत्रालय ने बताया है।
बजट में टेक्नोलॉजी को लेकर कई अहम घोषणाएं हैं। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीई) के जरिए कृषि में डिजिटाइजेशन को बढ़ावा देने की बात कही गई है। लेकिन सवाल है कि इस प्रक्रिया का मकसद क्या है? डिजिटल एग्रीकल्चर में किसानों के हित कैसे सुनिश्चित होंगे? अभी किसानों को हर सीजन में अलग-अलग फसलों और योजनाओं के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने पड़ते हैं। अनेक किसान योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना होगा कि डेटा का दुरुपयोग ना हो और डिजिटल डिवाइड ना बढ़े।
कृषि कर्ज के तहत किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) को बढ़ावा देने के लिए इन्हें बनाने की प्रक्रिया कुछ स्थानों पर सरल की जाएगी, लेकिन ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। खाद्य तेलों और दालों में आत्मनिर्भरता के लिए मिशन शुरू करने की घोषणा की गई है। लेकिन इस मोर्चे पर पिछले कुछ बरसों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने और बफर स्टॉक बनाने जैसे कदमों का फायदा नहीं मिल सका है। उम्मीद है कि मिशन मोड में काम करने के बेहतर नतीजे मिलेंगे। हम दालों में तो आयात पर निर्भर हैं ही, खाद्य तेलों की भी 62 फीसदी जरूरत आयात से पूरी करते हैं। इससे आपूर्ति व कीमत दोनों मोर्चों पर मुश्किलें खड़ी होती हैं और जो पैसा हमारे किसानों की जेब में जाना चाहिए, वह विदेशी किसानों को जाता है।
सब्जियों की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के चलते भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार को महंगाई को लक्षित स्तर पर लाने में कामयाबी नहीं मिल रही है। ‘टॉप’ जैसी स्कीम कामयाब नहीं रही। ऐसे में सब्जियों का उत्पादन बढ़ाने, उनकी मार्केटिंग और भंडारण पर बजट की घोषणा सही दिशा में उठाया गया कदम है। लेकिन इसके लिए कितना बजट दिया है, यह नहीं बताया गया।
कृषि के सहयोगी क्षेत्रों डेयरी और फिशरीज को देखें तो केवल झींगा उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने के कदम उठाये गये हैं। इसका निर्यात 60 हजार करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। देश में दूध उत्पादन का मूल्य खाद्यान्न से अधिक हो गया है, उसको लेकर कोई नया कदम नहीं है। किसानों की आय में बढ़ोतरी के लिए खाद्य प्रसंस्करण अहम है, लेकिन इसका बजट भी पिछले साल से मामूली अधिक है और कोई नई योजना भी नहीं है।
कृषि शोध को प्राथमिकता जरूरी
जहां तक कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता की बात है, तो इसे सरकार समझ रही है। इसलिए इसे विकसित भारत की नौ प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा गया है। लेकिन सिर्फ प्राथमिकता में रखने से काम नहीं चलेगा। रिसर्च पर फोकस पर जोर देने के बावजूद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के आवंटन में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं की गई है। हालांकि इसे बाद में भी बढ़ाने का विकल्प सरकार के पास है।
सरकार को कम से कम 1000 करोड़ रुपये का रिसर्च फंड बनाना चाहिए। जिस चैलेंज की बात बजट भाषण में की गई है, उसे इसके जरिये जमीन पर उतारना चाहिए। इसमें आईसीएआर के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के दूसरे संस्थानों को भी मौका दिया जा सकता है। जरूरी नहीं कि सभी तरह के शोध केवल आईसीएआर और नेशनल एग्रीकल्चरल रिसर्च सिस्टम (नार्स) के तहत आने वाले संस्थान करें। कृषि शोध अब केवल फसलों की प्रजातियां विकसित करने और बीमारियों से बचाव तक सीमित नहीं हैं। यहां आईटी, क्लाइमेट चेंज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, लोकल क्लामेट इंफॉर्मेशन और इंपैक्ट, न्यूट्रीशन और मार्केटिंग टेक्नोलॉजी, स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे तमाम शोध की जरूरत है जो आईसीएआर के अलावा दूसरे संस्थानों से भी आ सकता है।
बजट में कृषि शोध में निजी क्षेत्र को शामिल करने जो बात की गई है उसे इसके जरिये अमल में लाया जा सकता है। इनमें निजी क्षेत्र की टेक्नोलॉजी कंपनियां, कृषि में रिसर्च पर काम करने वाली कंपनियां, एग्री स्टार्टअप और एग्रीगेटर को शामिल किया जा सकता है। कृषि में रिसर्च करने वाली निजी कंपनियों की शिकायत है कि उनको शोध खर्च पर आय कर छूट का फायदा नहीं मिलता है। पहले शोध पर होने वाले खर्च के 200 फीसदी तक आय कर छूट का प्रावधान था, इसे बाद में घटाकर 100 फीसदी कर दिया गया। नई व्यवस्था में सरकार शोध करने वाली कंपनियों को मैचिंग फंड दे सकती है।
वर्षा सिंचित (रेनफेड) क्षेत्रों के लिए भी अलग योजना बनाने की जरूरत है क्योंकि अधिक उत्पादकता वहीं से आ सकती है और उन स्थानों पर गरीबी भी अधिक है। सरकार, अर्थशास्त्रियों, विज्ञानियों और नीति विशेषज्ञों का मानना है कि देश की तरक्की के लिए कृषि क्षेत्र में चार फीसदी विकास दर जरूरी है। प्रभावी नीतिगत बदलाव के बिना यह संभव नहीं है।
बात केवल उत्पादकता या उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बात किसानों की आमदनी बढ़ाने की भी है। उसके लिए बड़े बदलाव चाहिए। ये बदलाव संघीय ढांचे की मूल भावना के दायरे में ही होने चाहिए। इसके लिए एक एग्रीकल्चर डेवलपमेंट काउंसिल गठित की जा सकती है। सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य होंगे। इसे जीएसटी काउंसिल की तरह स्थायी बनाने की जरूरत नहीं है। यह काउंसिल नीतिगत मसलों और सुधारों की एक फेहरिस्त तैयार करे जिसमें केंद्र व राज्यों की सहभागिता व सहमति हो। जिस तरह राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में राज्यों के कृषि बजट को अपने विवेक से उपयोग करने की छूट थी, वैसी ही छूट संसाधनों के इस्तेमाल में राज्यों को दी जानी चाहिए। इसके साथ यह शर्त होनी चाहिए कि वे अपने बजट में लगातार बढ़ोतरी करेंगे।
नई सहकारिता नीति
किसानों को सहकारिता के फायदे के लिए वित्त मंत्री ने राष्ट्रीय सहकारी नीति लाने की बात भी कही। इसके लिए सहकारिता मंत्रालय द्वारा गठित समिति अपनी रिपोर्ट सरकार को दे चुकी है। सरकार किसानों के लिए संस्थाओं का निर्माण सहकारिता के तहत कर सकती है, लेकिन अब वहां ज्यादातर काम मार्केटिंग और इनपुट मैटीरियल का है, क्योंकि कृषि क्रेडिट का अधिकांश हिस्सा सरकारी और निजी बैंकिंग सिस्टम के पास चला गया है। इसलिए सहकारी संस्थाओं को उपरोक्त दो बातों पर ही फोकस करना चाहिए।
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में फार्मर्स प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशन (एफपीओ) को भी बढ़ावा दिया। लेकिन यह जमीनी हकीकत है कि छोटे संस्थान अधिक कारगर नहीं होते हैं। मार्केटिंग और ब्रांड बिल्डिंग के लिए संस्थानों का बड़ा होना जरूरी है। सहकारी संस्थाओं और एफपीओ के जरिये बड़े संस्थान खड़े करने के लिए नीतिगत बदलाव की जरूरत है। इसमें भी केंद्र व राज्यों के बीच आपसी तालमेल की बड़ी भूमिका है। ये संस्थान एग्री स्टार्टअप के जरिये निजी क्षेत्र में भी हो सकते हैं। डेयरी के क्षेत्र में ऐसे कुछ कामयाब उदाहरण देश में हैं जहां निजी क्षेत्र ने सहकारिता की तर्ज पर किसानों को जोड़ा और उनके उत्पाद की बेहतर कीमत पर खरीद की है।
चालू साल के कृषि और सहयोगी क्षेत्र के बजट प्रावधानों और आवंटन पर गौर करने से यह बात साफ होती है कि सरकार को कृषि में चार फीसदी सालाना औसत विकास दर हासिल करने के लिए नये सिरे से सोचना होगा। बजट या इससे बाहर किसी भी योजना या कार्यक्रम के केंद्र में किसानों की आय में बढ़ोतरी होना चाहिए। जिस योजना से किसान की आय में वृद्धि नहीं हो रही, उसे लागू करने की जरूरत ही नहीं है। अगर ऐसी योजना है तो उसे बंद कर उसका आवंटन दूसरी नतीजे देने वाली योजनाओं के लिए कर देना चाहिए। यथास्थिति से कृषि और किसानों का फायदा नहीं होने वाला, इसे बदलने की जरूरत है। यह बदलाव तभी संभव है जब केंद्र व राज्यों की सोच एक दिशा में हो।
बजट में प्रमुख घोषणाएं
नई किस्मेंः 32 फसलों की 109 नई किस्में जारी की जाएंगी, जो ज्यादा उपज और मौसम के बदलाव सहने में सक्षम होंगी।
प्राकृतिक खेतीः दो साल में संस्थानों और ग्राम पंचायतों के माध्यम से एक करोड़ किसानों की मदद की जाएगी।
दलहन व तिलहनः इनमें आत्मनिर्भरता के लिए मिशन शुरू किया जाएगा।
सब्जी क्लस्टरः प्रमुख शहरों के नजदीक क्लस्टर बनेंगे। सप्लाई, स्टोरेज और मार्केटिंग में एफपीओ, कोऑपरेटिव, स्टार्टअप की मदद ली जाएगी।
डीपीआईः राज्यों के साथ कृषि डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा। तीन साल में 400 जिलों में 6 करोड़ किसानों और उनकी जमीन के रिकॉर्ड दर्ज किए जाएंगे।
भूमि सुधारः भूमि सुधारों और कार्यों को तीन वर्षों के भीतर पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
भू-आधारः भूमि के लिए विशिष्ट भूमि पार्सल पहचान संख्या या भू-आधार का आवंटन। भूमि रजिस्ट्री की स्थापना होगी।
राष्ट्रीय सहकारिता नीतिः सहकारी क्षेत्र के विकास के लिए राष्ट्रीय सहकारिता नीति लाई जाएगी।
जनजातीय उन्नत ग्राम अभियान: आदिवासी बहुल गांवों और आकांक्षी जिलों में यह शुरू होगा। इससे 63,000 गांवों के 5 करोड़ आदिवासियों को लाभ मिलेगा।
ग्रामीण विकास: नहीं बढ़ा मनरेगा का बजट, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का बजट घटा
संसद में वर्ष 2024-25 का आम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ग्रामीण विकास के लिए 2.66 लाख करोड़ रुपये आवंटित करने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पीएम आवास योजना के तहत तीन करोड़ अतिरिक्त घर बनाए जाएंगे।
ग्रामीण विकास विभाग का बजट गत वर्ष के संशोधित अनुमान 1.71 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.77 करोड़ रुपये किया गया है। लेकिन महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (मनरेगा) के बजट में गत वर्ष के संशोधित अनुमान 86 हजार करोड़ रुपये के मुकाबले कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। इस साल भी मनरेगा के लिए 86 हजार करोड़ रुपये का बजट दिया गया है। जबकि 2022-23 में मनरेगा का बजट 90.8 हजार करोड़ रुपये था जिसे घटाकर 2023-24 में 60 हजार करोड़ रुपये कर दिया था।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का चौथा चरण, लेकिन बजट घटा
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के चौथे चरण की शुरुआत की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि 25 हजार ग्रामीण बस्तियों को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान की जाएगी। हालांकि, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का बजट पिछले साल 19 हजार करोड़ रुपये के बजट अनुमान से करीब 37 फीसदी घटाकर इस साल 12 हजार करोड़ रुपये निर्धारित किया है। यह गत वर्ष पीएमजीएसवाई के संशोधित अनुमान 17 हजार करोड़ रुपये से भी कम है।
तीन करोड़ अतिरिक्त आवास
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पीएम आवास योजना के तहत तीन करोड़ अतिरिक्त घर बनाए जाएंगे। बजट में पीएम आवास योजना-ग्रामीण का बजट पिछले साल के बजट अनुमान के लगभग बराबर 54,500 करोड़ रुपये रखा गया है। हालांकि, यह गत वर्ष के संशोधित अनुमान 32 हजार करोड़ रुपये से करीब 70 फीसदी अधिक है।
भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण
बजट में भूमि से संबंधित कई सुधारों के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि के लिए विशिष्ट पहचान संख्या या 'भू-आधार' भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण का प्रस्ताव रखा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि केंद्र सरकार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इन भूमि सुधारों को लागू करने के लिए राज्यों के साथ मिलकर काम करेगी। अगले तीन वर्षों में इन सुधारों को पूरा करने के लिए राज्यों को प्रोत्साहन और वित्तीय सहायता दी जाएगी।
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