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कोल्हू उद्योग की वापसी बनी चीनी मिलों को चुनौती

कोल्हू द्वारा चीनी मिलों से बेहतर दाम देने के कारण गन्ने को लेकर 'प्राइस वार' की स्थिति

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अजीत सिंह

देश के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में चालू पेराई सीजन में बने नये समीकरण के चलते गुड़ और खांडसारी का उत्पादन करने वाले परंपरागत कोल्हू और खांडसारी इकाइयां चीनी सिल्लों को चुनौती दे रही हैं। गन्ने की कमजोर फसल और चीनी से महंगे गुड़ के दाम ने खत्म हो रहे इस कुटीर उद्योग में जान डाल दी है और गुड़ उत्पादक चीनी मिलों के बराबर ही नहीं बल्कि उससे अधिक दाम पर गन्ना खरीद रहे है। वहीं चालू सीजन में भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ने की उत्पादकता में 15 से 20 फीसदी तक की कमी के चलते कई चीनी मिले कम क्षमता पर चल रही हैं। इस बात की संभावना है कि चालू सीजन में चीनी का उत्पादन पिछले साल के स्तर पर ही अटक सकता है जबकि चीनी उद्योग ने इस साल उत्पादन में बेहतर बढ़ोती के अनुमान जारी किये थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसी स्थिति ही उत्तराखंड के इससे लगे क्षेत्रों में बनी हुई है।

 

गन्ना बेल्ट में यह बदलाव अब साफ नजर आ रहा है। जिन चीनी मिलों के बाहर गन्ने से लवे ट्रक और ट्रॉलियों की लंबी कतारें लगी रहती थीं, वहां अब भीड़ नहीं है। बिजनौर जिले के गन्ना किसान रोनित चौधरी बताते हैं कि कोल्हू पर गन्ने का भाव 400 से 450 रुपये प्रति क्विंटल तक का भाव मिल रहा है और पेमेंट भी नकद मिलता है, इसलिए चीनी मिलों पर किसानों की भीड़ नहीं है। गन्ना आपूर्ति के लिए पर्चियों की मारामारी भी अब खत्म हो चुकी है।

 

कोल्हू द्वारा चीनी मिलों से बेहतर वाम देने के कारण गन्ने को लेकर 'प्राइस वार' की स्थिति पैदा हो गई है। इस साल उत्तर प्रदेश सरकार ने गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में 30 रुपये की बढ़ोतरी कर इसे 400 रुपये प्रति कुंतल निर्धारित किया है। जबकि दो साल से यह 370 रुपये पर अटका हुआ था। गन्ने की फसल में रोगों के प्रकोप और गत वर्षों में दाम न बढ़ने से किसानों को दोहरा नुकसान उठाना पड़ा। इससे किसानों का रुझान गन्ने से हटकर एग्रो फॉरेस्ट्री जैसे विकल्पों पर गया है।

 

पेराई सीजन की पीक अवधि में भी चीनी मिलों को गन्ना जुटाने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है और जनवरी के आखिर में ही चीनी मिलों के परिचालन बंद करने का सिलसिला शुरू हो गया है। इन हालात में इस साल यूपी में चीनी उत्पादन में गिरावट की आशंका है।

 

नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 31 जनवरी तक यूपी की चीनी मिलों ने 559 लाख टन गन्ने की पेराई की. जबकि पिछले साल इस अवधि तक 579 लाख टन गन्ने की पेराई हुई थी। इस साल चीनी मिलों ने लगभग 20 लाख टन कम गन्ने की पेराई की है। हालांकि, गन्ने से चीनी रिकवरी 9.10 फीसदी से बढ़कर 9.85 फीसदी हो गई है।

 

 

मेरठ जिले में स्थित एक चीनी मिल के वरिष्ठ अधिकारी ने रूरल वॉयस को बताया कि इस साल गन्ने का भाव बढ़ने के बावजूद पर्याप्त गन्ना आपूर्ति सुनिश्चित करना मुश्किल हो रहा है। चीनी मिलों के बीच अधिक से अधिक पेराई करने की होड़ मची है। गन्ने की उपलब्ध को लेकर पैदा स्थिति के लिए वे गन्ने की पैदावार में आई गिरावट तथा कोल्हू व खांडसारी इकाइयों से मिल रही प्रतिस्पर्धा को मुख्य वजह मानते हैं।

 

इस साल किसान के नजरिए से गन्ने के दाम की स्थिति स्थिति कुछ बेहतर हुई है। गुड़ की खपत बढ़ने के कारण कोल्हू चीनी मिलों से अधिक दाम देने की स्थिति में हैं। जबकि दूसरी तरफ चीनी उत्पादन में गिरावट के हालात बन रहे हैं। इस साल कई चीनी मिलों को गन्ना न मिलने के कारण समय से पहले पेराई सत्र समाप्त करना पड़ सकता है। यूपी में पिछले साल 121 चीनी मिलें जनवरी के आखिर तक पेड़ाई कर रही थी, जबकि इस साल यह संख्या 118 है। फरवरी के आखिर तक कई चीनी मिले गन्ता न सिलने के कारण परिचालन बंच कर सकती हैं।

 

गन्ने को लेकर मची होड़ के बीच सवाल यह भी उठता है कि अगर असंगठित क्षेत्र के कोल्हू और खांडसारी इकाइयां गन्ने का भाव 450 रुपये प्रति कुंतल तक दे सकती हैं तो चीनी मिलें 400 रुपये के भाव पर ही क्यों अटकी हैं? जबकि वे चीनी के अलावा एथेनॉल, एल्कोहल सहित कई अन्य उत्पाद भी बनाती है।

 

उत्तर प्रदेश के शामली जिले में 'हंस हेरिटेज जैगरी' नाम से आधुनिक गुड़ कारखाने के संस्थापक कृष्णा पाल सिंह ने रूरल वॉयस को बताया कि इस साल गन्ने की उपलब्धता को लेकर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि इस साल गन्ने की फसल देखने में अच्छी लग रही थी, लेकिन पैदावार में गिरावट आई है। गन्ना जुटाने के लिए कोल्हू और खांडसारी इकाइयों को बेहतर रेट देना पड़ रहा है। चीनी के मुकाबले गुड़ की रिकवरी और अधिक दाम के कोल्हू और खांडसारी इकाइयां गन्ने का बेहतर रेट दे पा रहे हैं।

 

चीनी का एक्स-फैक्टरी दाम 3900-4000 रुपये प्रति कुंतल के आसपास है, वहीं गुड़ का भाव थोक मंडियों में 4000 से 4500 रुपये प्रति कुंतल के बीच चल रहा है। चीनी की रिकवरी 9.85 फीसदी है, वहीं गुड़ की रिकवरी 12-14 फीसदी तक होती है। मुजफ्फरनगर जिले में कोल्हू संचालक मंजीत सिंह बताते हैं कि गुड़ की मांग लगातार बढ़ रही है। खुदरा बाजार में गुड़ 60 रुपये किलो त्तक बिक रहा है जबकि बहुत से खरीदार कोल्हू से ही 45-50 रुपये के रेट पर गुड़ खरीद रहे हैं। गुड़ की बढ़ती खपत के कारण बहुत से कोल्हू संचालक पुरानी चीनी से गुड़ बना रहे हैं, जिसके कारण लागत और भी कम हो जाती है।

 

नीतिगत शिकंजा

 

उत्तर प्रदेश सरकार ने गुड़ और खांडसारी की इकाइयों को प्रोत्साहित करने के लिए पांच की एक नीति घोषित की थी। लेकिन जनवरी, 2025 में इसमें संशोधन कर नई इकाइयों की स्थापना को मुश्किल कर दिया है। खांडसारी लाइसेंसिंग नीति के जरिए खांडसारी उद्योग पर नियमों में बदलाव को इस छोटे उद्योग पर शिकंजा की तरह देखा जा रहा है। राज्य सरकार ने पांच वर्षों (पेराई सत्र 2021-22 से 2025-26) की अवधि के लिए खांडसारी लाइसेंसिंग नीति घोषित की थी। पिछले वर्ष इस नीति में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए, जिससे राज्य के अधिकांश हिस्सों में नई खांडसारी यूनिट लगाने की राह काफी मुश्किल हो गई है।

 

नए नियमों के अनुसार, पावर क्रशर और खांडसारी इकाइयों के नए लाइसेंस के लिए चीनी मिल से त्रिज्यात्मक दूरी को 7.5 किलोमीटर से बढ़ाकर 15 किलोमीटर कर दिया गया है। यानी पहले स्थापित चीनी मिल से 15 किलोमीटर से कम दायरे में किसी पावर क्रशर या नई खांडसारी इकाई को लाइसेंस नहीं मिलेगा।

 

राज्य के अधिकांश गन्ना क्षेत्रों में चीनी मिलें लग चुकी हैं। ऐसे में खांडसारी इकाइयों के लिए चीनी मिलों के बराबर दूरी के प्रावधान से नए गन्ना क्षेत्र मिलना मुश्किल हो जाएगा। नए प्रावधानों के जरिए खांडसारी इकाइयों और पावर क्रशर पर नियम-कायदों का झंझट भी बढ़ा दिया है।

 

केंद्र सरकार की नीति के अनुसार दो चीनी मिलों के बीच भी न्यूनतम 15 किलोमीटर की दूरी होनी चाहिए। इस तरह दूरी के मामले में खांडसारी इकाइयों को चीनी मिलों के बराबर खड़ा कर दिया है। एक अन्य शर्त के तहत लाइसेंस प्राप्त खांडसारी और पावर क्रशर इकाइयों के लिए किसानों को गन्ना मूल्य का ऑनलाइन भुगतान अनिवार्य कर दिया है।

 

वहीं पिछले साल केंद्र सरकार ने भी शुगर कंट्रोल ऑर्डर में संशोधन कर गुड़, खांडसारी, शक्कर और बूरा को चीनी की परिभाषा में शामिल कर लिया है। साथ ही 500 टन प्रतिदिन क्रशिंग क्षमता वाली इकाइयों पर चीनी मिलों की तरह फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) के भुगतान समेत कई अन्य शर्तें भी लागू कर दी थी।

 

ऐसे प्रावधान पावर क्रशर और खांडसारी इकाइयों पर नियमन का बोझ बढ़ाएंगे और इन उद्योगों को हतोत्साहित कर सकते हैं। इससे इन इकाइयों के लिए चीनी मिलों के सामने प्रतिस्पर्धा में टिकना मुश्किला हो जाएगा। इससे गन्ना किसानों के लिए बेहतर दाम पाने का विकल्प कमजोर पड़ सकता है।


अजीत सिंह

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