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खेती की जमीन की सटीक मैपिंग

इक्रीसैट का हाई रिजॉल्यूशन मानचित्र बताता है कि खेती कहां वर्षा पर निर्भर है और कहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है

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अजीत सिंह

भारत का कृषि परिदृश्य मूल रूप से सिंचित और वर्षा आधारित प्रणालियों के बीच विभाजित है। यही विभाजन फसलों के चयन, उत्पादकता, जलवायु प्रभावों के प्रति लचीलापन और दीर्घकालिक स्थिरता को आकार देता है। इसके बावजूद अधिकांश कृषि डेटासेट इतने मोटे पैमाने के हैं कि वे इन अंतरों को पकड़ नहीं पाते। 30 मीटर या उससे कम रिजॉल्यूशन पर आधारित आंकड़ों में मिश्रित सिंचाई पद्धतियां, छोटे किसानों के खेतों की सीमाएं और मौसमी बदलाव जैसे अंतर अक्सर छूट जाते हैं। इसे देखते हुए हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (इक्रीसैट) ने एक हाई रिजॉल्यूशन राष्ट्रीय मानचित्र जारी किया है, जो भारत में सिंचित और वर्षा आधारित कृषि भूमि के बीच अंतर दर्शाता है।

 

इक्रीसैट का नया डेटासेट इस स्थिति को बदल सकता है। कृषि वर्ष 2024-25 के आधार पर विकसित इस मानचित्र में 10 मीटर रिजॉल्यूशन वाली सैटिनल-2 उपग्रह तस्वीरों का उपयोग किया गया है। उनका विश्लेषण सघन टाइम-सीरीज डेटा से किया गया और फील्ड ऑब्जर्वेशन से सत्यापित किया गया। समय के साथ फसलों के मौसमी व्यवहार को ट्रैक करके शोधकर्ताओं ने कहीं अधिक सटीकता से सिंचित और वर्षा आधारित कृषि भूमि की पहचान की है। यह कार्य दक्षिण एशिया में इक्रीसैट के पहले के प्रयासों पर आधारित है. जिनमें लैंडसैट-8 (30 मीटर) और MODIS (250 मीटर जैसे अपेक्षाकृत मोटे डेटासेट का उपयोग किया गया था।

 

इकीसैट के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक के अनुसार, इस मानचित्र का समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, "राष्ट्रीय जल मिशन और 'मोर क्रॉप पर ड्रॉप जैसी पहलों के तहत जय भारत सतत जल उपयोग की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है. तब कृषि के लिए जल बजट बनाना अनिवार्य होता जा रहा है। यह मानचित्र नीति निर्धारकों को नीति और निवेश के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है।"

 

इक्रीसैट के अनुसार, खेती की जमीन की पहचान में इस डेटासेट की सटीकता लगभग 90 प्रतिशत है. जबकि सिंचित और वर्षा-आधारित क्षेत्रों के बीच अंतर करने में यह लगभग 70 प्रतिशत तक सटीक है। भारत की छोटी जोतों और विविध कृषि प्रणालियों को देखते हुए यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। यह उन परिवर्तन वाले क्षेत्रों और मिश्रित पद्धतियों को भी पकड़ता है, जो आमतौर पर राष्ट्रीय स्तर के डेटासेट में दिखाई नहीं देते।

 

नीति निर्धारकों और योजनाकारों के लिए इसके निहितार्थ दूरगामी हैं। इक्रीसैट में अनुसंधान एवं नवाचार के उप महानिदेशक डॉ स्टैनफोर्ड ब्लेड ने कहा कि यह डेटासेट शासन में विभिन्न स्तरों पर निर्णय लेने में सहायक हो सकता है। उन्होंने कहा, "ग्राम पंचायतों से लेकर केंद्रीय मंत्रालयों तक, यह मानचित्र हितधारकों को भारत के अर्थ-शुष्क और सिंचित परिदृश्यों को बेहतर ढंग से CRIFAT समझने और पानी के उपयोग की चक्षता बढ़ाने में मदद करता है।"

 

इसकी सुलभता भी महत्वपूर्ण है। इस डेटासेट को केवल विशेषज्ञों तक सीमित रखने के बजाय, इकीसैट ने इसे यूजर फ्रेंडली गूगल अर्थ इंजन एप्लिकेशन के माध्यम से उपलब्ध कराया है। यूजर जिला स्तरीय मानचित्र देख सकते हैं. श्रेणीवार आंकड़ों का विश्लेषण कर सकते हैं और डेटा को समझ सकते हैं। यह कदम इसके संभावित प्रभाव को काफी व्यापक बनाता है।

 

इक्रीसैट में भू-स्थानिक और बिग डेटा साइंस के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मुरलीकृष्ण गुम्मा ने इस डेटासेट के विश्लेषणात्मक महत्व पर जोर देते हुए कहा, "यह पानी की बजटिंग, सूखा और जोखिम की निगरानी, फसल की प्लानिंग और उपज की मॉडलिंग के लिए मजबूत आधार प्रदान करता है। एजेंसियां सिंचित क्षेत्रों में बदलावों को ट्रैक कर सकती हैं, संवेदनशील वर्षा आधारित क्षेत्रों की पहचान कर सकती हैं और जमीनी वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने वाले डिजाइन तैयार कर सकती हैं।"

 

जैसे-जैसे चरम जलवायु स्थितियां तीव्र हो रही हैं और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है. भारत की कृषि का भविष्य सटीक और क्रियान्वयन योग्य डेटा पर निर्भर करेगा। इक्रीसैट का यह हाई रिजॉल्यूशन मानचित्र केवल स्क्रीन पर खेतों की तस्वीर नहीं उकेरता. बल्कि यह कृषि को अधिक लचीला बनाने, दक्षता बढ़ाने और अनुमानों के बजाय साक्ष्यों पर आधारित नीति निर्माण के लिए एक व्यावहारिक उपकरण प्रदान करता है।


अजीत सिंह

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