बदलती प्राथमिकताओं में कृषि और किसान
कुल बजट में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों का आवंटन सिर्फ 3 प्रतिशत, कृषि शोध पर खर्च में कटौती, किसानों की आय बढ़ाने और जलवायु संकट पर भी ठोस पहल नहीं
अजीत सिंह
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार नौवां बजट पेश कर सबसे अधिक बजट पेश करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय मोरारजी देसाई के रिकॉर्ड के करीब पहुंचने में काफी हद तक कामयाबी हासिल कर ली है। वह उनसे बस एक कदम पीछे हैं। आजादी से पहले गुजरात के दूध किसान जब प्राईवेट डेयरी कंपनी पोलसन के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे तो उस आंदोलन को मजबूत करने के लिए सरदार पटेल ने मोरारजी देसाई को भेजा था। उस समय गुजरात, बांबे प्रोविन्स का हिस्सा था। यह वाकया हम क्यों बता रहे हैं, उसके पीछे किसानों की अहमियत छिपी है।
वित्त मंत्री ने 2026-27 का जो बजट पेश किया, उसमें पहली बार ऐसा हुआ कि बजट में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए कोई बड़ा सेक्शन नहीं है। बजट में करीब आधा दर्जन बार ही किसान शब्द आता है और एक छोटा सब-हेड किसानों की आय बढ़ाने के बारे में है। बजट देखने पर यह साफ होता है कि कृषि को वित्त मंत्री ने इस साल लगभग अछूता छोड़ दिया है। बजटीय प्रावधानों में कुछ बदलाव किये गये हैं। प्लांटेशन फसलों व फसल सलाह के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एग्रीस्टैक व आईसीएआर को जोड़कर विस्तार की दो पहल घोषित की गई, जिसका कुल बजटीय प्रावधान 500 करोड़ रुपये है। कृषि और सहयोगी क्षेत्र का बजट पिछले साल के बजटीय प्रावधान से थोड़ा सा अधिक है, लेकिन संशोधित अनुमान कम है तो उसे कुछ बढ़े हुए आंकड़ों के रूप में देखा जा सकता है। केंद्रीय बजट और कृषि व सहयोगी क्षेत्र को किस तरह के संसाधनों का आवंटन हुआ और इसमें कृषि व सहयोगी क्षेत्र के लिए किस तरह की दिशा दिखती है, उस पर इस लेख में आगे बढ़ने पर स्थिति साफ होती है।
वित्त मंत्री ने बजट की प्राथमिकताओं को तीन कर्तव्यों में बांटा है। पहले कर्तव्य के तहत आर्थिक विकास को गति देने के लिए जिन छह प्राथमिकताओं का जिक्र किया, उनमें कृषि क्षेत्र को शामिल न करना चौंकाने वाला था। दूसरा कर्तव्य देशवासियों की आकांक्षाओं को पूरा करने और क्षमता निर्माण पर केंद्रित था। किसानों का जिक्र तीसरे कर्तव्य "सबका साथ, सबका विकास" के तहत दिव्यांगजनों सहित सबसे कमजोर वर्गों के साथ आया।
कुल बजट में कृषि का घटता अनुपात
कृषि और संबद्ध क्षेत्रों का कुल बजट 1,62,671 करोड़ रुपये है, जो पिछले वर्ष 1,58838 करोड़ रुपये था। इसमें से 1,51.853 करोड़ रुपये के खर्च का संशोधित अनुमान वित्त मंत्री ने बजट में पेश किया है। ये आंकड़े बताते हैं कि बजट में कोई बड़ा बदलाव नहीं है, बल्कि वास्तविक खर्च कम रहने के अनुरूप कई योजनाओं के आवंटन घटा दिए गए हैं। कृषि व संबद्ध क्षेत्रों के लिए बजटीय आवंटन घटकर कुल केंद्रीय बजट का मात्र 3.04 प्रतिशत रह गया है, जबकि 2019-20 में यह 5.44 प्रतिशत था।
बजट आवंटन के मुकाबले वास्तविक खर्च कम होने की समस्या भी बढ़ती जा रही है। पिछले साल केंद्र सरकार ने कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये का बजट अनुमान दिया गया था, लेकिन संशोधित अनुमान घटकर 1.52 लाख करोड़ रुपये रह गया। यह लगभग 20,000 करोड़ रुपये यानी करीब 12 फीसदी की कटौती है। इस तरह, 2026-27 के लिए कृषि व सहयोगी क्षेत्रों का बजट अनुमान 2025-26 के संशोधित अनुमान से तो अधिक है, लेकिन वास्तव में पिछले साल से भी कम है। इस कारण वास्तविक व्यय में इस वर्ष कृषि का हिस्सा 3 प्रतिशत से भी नीचे जाने की आशंका है। अर्थव्यवस्था और रोजगार में कृषि के योगदान को देखते हुए यह बेहद कम है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का बजट पिछले साल 1.37 लाख करोड़ रुपये था जो वर्ष 2026-27 के लिए 1.40 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है और मात्र 2.1 फीसदी की वृद्धि है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग का बजट गत वर्ष के बजट अनुमान 1.27 लाख करोड़ से बढ़ाकर 1.30 लाख करोड़ रुपये किया गया है जबकि कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (डेयर) का बजट 10,466 करोड़ रुपये से लगभग 5 फीसदी घटकर 9967 रुपये रह गया है।
जहां कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा में निवेश बढ़ाने की मांग की जा रही थी, उल्टे उसमें करीब 300 करोड़ रुपये की कटौती हो गई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) का बजट 6,559 करोड़ रुपये से घटाकर 6,275 करोड़ रुपये किया गया है जबकि कृषि विज्ञान केंद्रों का बजट मामूली वृद्धि के साथ 210 करोड़ रुपये है। यह संकेत है कि सरकार कृषि शोध पर खर्च बढ़ाने को लेकर अधिक आश्वस्त नहीं है, जबकि किसानों की उत्पादकता बढ़ाने और जलवायु संकट जैसी चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए कृषि में शोध को बढ़ावा देना जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (IFPRI) दक्षिण एशिया के निदेशक डॉ. शाहिदुर राशिद का कहना है कि कृषि शोध में निवेश बढ़ाना बेहद जरूरी है. खासकर बीजों में नवाचार और उत्पादकता बढ़ाने के लिए। इन क्षेत्रों में सरकारी निवेश बढ़ाने से ग्लोबल साउथ में कृषि क्षेत्र का नेतृत्व करने की भारत की दावेदारी को बल मिलेगा। कई विशेषज्ञ बजट में कटौती को शोध संस्थानों की बजट व्यय की दक्षता और प्रशासनिक क्षमताओं से भी जोड़कर देखते हैं।
पशुपालन और मत्यपालन को प्राथमिकता
पशुपालन और मत्स्यपालन को इस बजट में विशेष प्राथमिकता दी गई है जो इन क्षेत्रों से जुड़ी घोषणाओं तथा संबंधित मंत्रालय के बजट आवंटन में भी दिखाई देता है। वर्ष 2026-27 के लिए मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय का बजट पिछले साल के बजट अनुमान 7,544 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 8,915 करोड़ रुपये किया गया है जो करीब 18 फीसदी की बढ़ोतरी है।

कृषि आय में लगभग 16 प्रतिशत योगदान करने वाले पशुपालन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी योजना शुरू करने की घोषणा की गई है, जिससे देश में 20 हजार से अधिक वेटनरी प्रोफेशनल्स की उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी। निजी क्षेत्र में पशु चिकित्सा और पैरा-वेट कॉलेज, अस्पताल, डायग्नोस्टिक लैब और प्रजनन केंद्र स्थापित करने के लिए क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी दी जाएगी। साथ ही इस क्षेत्र में विदेशी संस्थानों के साथ भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया जाएगा।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए पशुपालन सेक्टर में उद्यमिता विकास को बढ़ावा दिया जाएगा। वित्त मंत्री ने पशुधन उद्यमों को आधुनिक बनाने, पशुधन, डेयरी और पोल्ट्री केंद्रित वैल्यू चेन बनाने और पशुधन किसान प्रोड्यूसर संगठनों (एफपीओ) की स्थापना पर भी जोर दिया।
मत्स्यपालन के लिए बजट में 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों के विकास की घोषणा की गई है। साथ ही तटीय क्षेत्रों में फिश वैल्यू चेन को मजबूती देने तथा स्टार्टअप, महिला समूहों और फिश फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (एफपीओ) के माध्यम से बाजार से जोड़ने की बात कही है।

मत्स्यपालन विभाग के लिए पिछली बार 2,703 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया गया था, जिसे संशोधित अनुमानों में घटाकर 1,732 करोड़ रुपये कर दिया गया। बजट अनुमान के मुकाबले संशोधित अनुमान का 36 फीसदी कम रहना विभागों की व्यय करने की क्षमताओं पर सवाल खड़े करती है। वर्ष 2026-27 के लिए मत्स्यपालन विभाग को 2.761 करोड़ रुपये का बजट दिया है जो संशोधित अनुमान से तो अधिक है लेकिन पिछले साल के बजट अनुमान के लगभग बराबर है।
उच्च मूल्य वाली फसलों पर जोर
बजट में वित्त मंत्री ने फसल विविधता और किसानों की आय बढ़ाने के लिए उच्च मूल्य वाली फसलों पर जोर दिया। तटीय क्षेत्रों में नारियल, चंदन, कोको और काजू जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। पूर्वोत्तर क्षेत्र में अगर (वुड) तथा पर्वतीय क्षेत्रों में बादाम, अखरोट और पाइन नट को भी बढ़ावा दिया जाएगा। लेकिन उच्च्च मूल्य वाली खेती को बढ़ावा देने के लिए बजट में केवल 350 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पूरे देश के लिए पर्याप्त नहीं है।
नारियल संवर्धन योजना की घोषणा की गई है, जिसके तहत पुराने और अनुत्पादक पेड़ों को नई उत्कृष्ट किस्मों से बदला जाएगा। काजू और कोको के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किया जाएगा ताकि भारत काजू और कोको उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सके। वित्त मंत्री ने भारतीय काजू और कोको को 2030 तक वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित करने की बात कही है।
चंदन के प्लांटेशन और प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ मिलकर भारतीय चंदन की ख्याति को लौटाने का प्रयास करेगी। अखरोट, बादाम और चिलगोजा के पुराने, कम उत्पादकता वाले बागानों के जीर्णोद्धार तथा सघन खेती के विस्तार के लिए भी एक समर्पित कार्यक्रम चलाया जाएगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, फसल विविधता और उच्च मूल्य वाली फसलों पर फोकस बढ़ाना ठीक है, लेकिन ये योजनाएं किसानों के बहुत छोटे वर्ग के लिए ही प्रासंगिक है। इन घोषणाओं को तमिलनाडु और केरल में चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है। इससे सरकार की नजर चुनाव-प्रभावित राज्यों पर होने का संकेत भी मिलता है।
हाई-वैल्यू एग्रीकल्चर के अलावा बजट में वित्त मंत्री ने कृषि और बागवानी क्षेत्र के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा, जबकि इनसे देश के करोड़ों किसान जुड़े हैं। आलू, प्याज और टमाटर उगाने वाले किसानों की समस्याओं, दलहन-तिलहन में आत्मनिर्भरता और कॉटन की चुनौतियों का बजट में कोई जिक्र नहीं था। जलवायु संकट जैसी बड़ी चुनौती से निपटने के लिए भी बजट में कोई चिंता या योजना सामने नहीं आई।
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने बजट पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि किसानों को इस बजट से बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन उनकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हुई। बढ़ती महंगाई और खेती की लागत, कर्ज के बोझ और गिरती आय से जूझ रहे किसानों के लिए बजट में न तो कोई ठोस पहल की गई और न ही एमएसपी की कानूनी गारंटी देने का प्रावधान किया गया। किसान सम्मान निधि बढ़ाने और कृषि बजट में ठोस वृद्धि जैसी प्रमुख मांगों को नजरअंदाज किया गया है।

सामाजिक कार्यकर्ता और जय किसान आंदोलन के संस्थापक योगेंद्र यादव का कहना है कि 2026 का बजट साफ संदेश देता है कि गांव, किसान और खेती अब सरकार की प्राथमिकताओं से बाहर हैं। पहली बार ऐसा बजट आया जिसमें किसान का नाम तक नहीं है न सिंचाई, न खाद, न खेतिहर मजदूर। किसान का जिक्र है भी तो 'बेचारों' की कतार में।
कृषि में AI: भारत-विस्तार
बजट में एक अहम घोषणा डिजिटल पहल भारत-विस्तार (Virtually Integrated System to Access Agricultural Resources) से जुड़ी है। यह एक बहुभाषी एआई टूल होगा, जो एग्रीस्टैक पोर्टल और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के कृषि पैकेज को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) प्रणाली से जोड़ेगा। इसके लिए बजट में 150 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। वित्त मंत्री का कहना है कि भारत-विस्तार के जरिए किसानों को उनकी जरूरत के अनुसार कृषि सलाह मिलेगी, जिससे कृषि उत्पादकता बढ़ेगी, किसानों को बेहतर निर्णय लेने और जोखिम घटाने में मदद मिलेगी। हालांकि, कृषि को आधुनिक तकनीक से जोड़ना एक सकारात्मक कदम है लेकिन देश में अधिकांश छोटी जोत वाले किसानों को इसका कितना लाभपहुंचेगा, इस पर सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीण महिला उद्यमों के लिए SIME-मार्ट
लखपति दीदी कार्यक्रम की सफलता को आगे बढ़ाते हुए वित्त मंत्री ने सेल्फ हेल्प एंटरप्रेन्योर (SHE) मार्ट शुरू करने की घोषणा की है। ये सामुदायिक स्वामित्व वाले रिटेल आउटलेट होंगे, जो ग्रामीण महिलाओं को उद्यम की मालिक बनने की दिशा में आगे बढ़ाएंगे।
महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल
खादी, हथकरघा और हस्तशिल्प को सशक्त बनाने के लिए बजट में महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल शुरू करने की घोषणा की गई है। इससे वैश्विक बाजार से जुड़ाव और ब्रांडिंग को बढ़ावा मिलेगा। यह पहल बुनकरों, ग्राम उद्योगों, एक जिला-एक उत्पाद (ODOP) योजना और ग्रामीण युवाओं को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू की जा रही है।
कई योजनाओं के बजट में कटौती
बजट में कृषि से जुड़ी कई योजनाओं के आवंटन में कटौती की गई है। कई योजनाओं में तय प्रावधानों के मुकाबले काफी कम खर्च हुआ है और नए बजट में उनके लिए आवंटन भी घटा दिया गया है। पिछले बजट में दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन, सब्जी और फल मिशन, उच्च उत्पादक बीज मिशन और कपास प्रौद्योगिकी मिशन जैसी योजनाएं 500 करोड़ या 1,000 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ घोषित की गई थीं। लेकिन 2025-26 के संशोधित अनुमान और 2026-27 के बजट में इन्हें कोई राशि नहीं दी गई, जिससे इन मिशन को लागू करने की सरकार की मंशा पर ही सवाल उठ रहे हैं।
आशा-किसान स्वराज संगठन के किरण बिस्सा का कहना है कि कृषि से जुड़ी कई योजनाओं के आवंटन में कमी आई है। हैरानी की बात है कि पिछले साल बड़े जोर-शोर से घोषित की गई कुछ स्कीमों को 2025-26 के संशोधित बजट में कोई फंड नहीं मिला है, और नए साल भी कोई आवंटन नहीं है। इस बजट में कृषि से जुड़ी अहम चुनौतियों जैसे जलवायु परिवर्तन, भूजल संकट और मिट्टी का क्षरण रोकने के लिए कुछ नहीं किया गया है।

जलवायु परिवर्तन के संकट के बीच चरम मौसमी घटनाएं और उनसे होने वाला नुकसान किसानों की मौजूदा वास्तविकता बन चुकी है। लेकिन सरकार की प्रमुख योजना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) का बजट 2024-25 के वास्तविक व्यय 14,473 करोड़ रुपये की तुलना में 15.7 प्रतिशत घटाकर 12,200 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो 2019-20 के बाद सबसे कम आवंटन है। जबकि जलवायु संकट की बढ़ती मार के चलते फसल बीमा जैसी योजनाओं पर अधिक खर्च किए जाने की जरूरत है।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, विशेषकर सूक्ष्म सिंचाई और 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' जैसी पहलों के लिए आवंटन 2025-26 के 8,259.85 करोड़ रुपये से घटाकर 7,137 करोड़ रुपये किया गया है, यानी 13.6 प्रतिशत की कटौती। नदियों को जोड़ने की योजना के लिए पिछले वर्ष 2,400 करोड़ रुपये का बजट था, लेकिन संशोधित खर्च 1,808 करोड़ रुपये रहा। अगले वर्ष के लिए इसे 1,906 करोड़ रुपये किया गया है।
किसान क्रेडिट कार्ड पर मिलने वाले कर्ज पर ब्याज छूट (इंटरेस्ट सबर्वेशन) के लिए पिछले वर्ष के बराबर 22,800 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है और किसान सम्मान निधि के लिए भी पिछले वर्ष के समान 63.500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

फसल खरीद योजना पीएम-आशा के लिए 7,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. जो पिछले वर्ष के 6,941 करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक है। प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड के तहत 4,100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए है, जबकि पिछले वर्ष इसका आवंटन 4,020 करोड़ रुपये था और खर्च 3,019 करोड़ रुपये यानी करीब 30 प्रतिशत कम हुआ था। खाद्य प्रसंस्करण के लिए पीएमएफएमई योजना में पिछले वर्ष 2,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन खर्च 1,500 करोड़ रुपये हुआ। नए बजट में इसके लिए 1,700 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
उर्वरक सब्सिडी की बात करें तो यूरिया सब्सिडी के लिए 1,16,805 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो चालू वर्ष के संशोधित अनुमान 1,26,475 करोड़ रुपये से कम है। वहीं गैर-यूरिया उर्वरकों के लिए 54,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. जबकि चालू वर्ष में 60,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
इस प्रकार यदि कृषि और सहयोगी क्षेत्रों के बजटीय प्रावधानों को देखें तो एक स्पष्ट रुझान दिखाई देता है- मंत्रालयों को दी गई राशि का पूरा उपयोग नहीं हुआ और वित्त मंत्री ने अधिकांश मामलों में कम खर्च को आधार बनाकर नए आवंटन भी घटा दिए हैं।
इन योजनाओं का आवंटन बढ़ा
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लिए चालू वर्ष में 8,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन संशोधित अनुमान के अनुसार खर्च 7,000 करोड़ रुपये रहने की संभावना है। नए वर्ष के लिए इस योजना में फिर से 8,550 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
कृषोन्नति योजना के लिए 8,000 करोड़ रुपये के प्रावधान में से 6,800 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है, लेकिन नए बजट में इसे बढ़ाकर 11,200 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसकी एक वजह पिछले बजट में घोषित प्रधानमंत्री धन-धान्य योजना को इसके तहत शामिल किया जाना हो सकता है। प्राकृतिक खेती के लिए सिर्फ 750 करोड़ सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की बात बार-बार करती रही है। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने भी स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इसका उल्लेख किया था। लेकिन राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के लिए बजट आवंटन मात्र 750 करोड़ रुपये है, जो कार्यक्रम के सतत विस्तार के प्रति गंभीर प्रतिबद्धता नहीं दर्शाता। यही वजह है कि प्राकृतिक खेती का विस्तार ठहराव का शिकार है, जो एक बार फिर कथनी और करनी के बीच के बड़े अंतर को दिखाता है।
बजट भाषण में रोजगार गारंटी की बात नहीं
बजट भाषण में कृषि श्रमिकों का कोई उल्लेख नहीं है। मनरेगा की जगह लाई जा रही वीबी-जी राम जी योजना का बजट भाषण में जिक्र तक नहीं हुआ। इस योजना के लिए 96,962 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, लेकिन आशंका है कि केंद्र सरकार के केवल 60 प्रतिशत हिस्सेदारी के नए नियम के कारण इसका एक छोटा हिस्सा ही खर्च हो पाएगा। इस खर्च के अनुपात में राज्यों को 60 हजार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। इतना बड़ा आंकड़ा राज्यों की खर्च क्षमता के हिसाब से व्यावहारिक नहीं दिखता है।
सहकारी क्षेत्र को टैक्स रियायतें
बजट में सहकारी क्षेत्र के लिए टैक्स रियायतों का ऐलान किया गया है। अब पशु आहार और कपास बीज की आपूर्ति करने वाली प्राथमिक सहकारी समितियों को भी कटौती का लाभ मिलेगा, बशर्ते यह आपूर्ति सरकारी संगठन या फेडरल कोऑपरेटिव को की जाए। नई कर व्यवस्था के तहत अंतर-सहकारी समिति लाभांश आय यानी एक सहकारी समिति से अन्य सहकारी समिति को दिए जाने वाले लाभांश को भी कटौती के रूप में मान्य किया जाएगा, बशर्ते इसे आगे सदस्यों में वितरित किया जाए।

अधिसूचित राष्ट्रीय सहकारी महासंघ (National Cooperative Federation) को किसी कंपनी में किए गए निवेश से प्राप्त लाभांश आय पर तीन वर्षों के लिए टैक्स छूट दी जाएगी। यह छूट 31 जनवरी 2026 तक किए गये निवेश पर मिलेगी और सहकारी समितियों में वितरित किए गए लाभांश पर ही मान्य होगी।
किसान नेताओं ने बताया निराशाजनक बजट
महाराष्ट्र के किसान नेता पूर्व सांसद और स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के अध्यक्ष राजू शेट्टी ने रूरल वर्ल्ड को बताया कि बजट बहुत निराशाजनक है और इसमें किसानों व कृषि क्षेत्र की अनदेखी की गई है। दालों और खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता की जरूरत है. उसके लिए अधिक दाम का इंसेंटिव दिया जाना चाहिए था। बजट में रिसर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने का कोई कदम नहीं उठाया गया है। खासतौर से दलहन और तिलहन फसलों को बढ़ावा देने के लिए किसानों को एमएसपी के अलावा सीधे प्रति क्विंटल प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए था।
ऑल इंडिया किसान सभा (एआईकेएस) का भी मानना है कि बजट 2026-27 कृषि संकट दूर करने के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाता। संगठन ने कहा कि उर्वरक सब्सिडी और खाद्य सब्सिडी, दोनों में कटौती किसानों के लिए अतिरिक्त संकट पैदा करेगी। कपास मिशन, दलहन मिशन, हाइब्रिड बीज और मखाना बोर्ड जैसे पुराने मिशनों का बजट में कोई उल्लेख नहीं है।
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