कृषि और बजट की प्राथमिकताएं
देश की अर्थव्यवस्था के लिए साल का सबसे अहम पड़ाव बजट होता है क्योंकि उससे देश की अर्थव्यवस्था की दिशा और प्राथमिकताएं तय होती हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को वित्त वर्ष 2026-27 का बजट पेश किया।
हरवीर सिंह
देश की अर्थव्यवस्था के लिए साल का सबसे अहम पड़ाव बजट होता है क्योंकि उससे देश की अर्थव्यवस्था की दिशा और प्राथमिकताएं तय होती हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को वित्त वर्ष 2026-27 का बजट पेश किया। इस बजट पर देश के किसानों के साथ ही कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सभी हितधारक इस उम्मीद में थे कि सात फीसदी से अधिक तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था में 3.1 फीसदी की वृद्धि दर से पिछड़ रहे कृषि और सहयोगी क्षेत्र को गति देने के लिए वित्त मंत्री किस तरह के प्रावधान और पहल लेकर आने वाली हैं। लेकिन जिस तरह से वित्त मंत्री ने इस साल के बजट भाषण में कृषि और किसान को बहुत सीमित दायरे में समेट दिया वह अच्छा संकेत नहीं है।
कृषि और सहयोगी क्षेत्र के लिए जो बजट प्रावधान किया गया है वह पिछले साल के बजटीय प्रावधान से मामूली अधिक है। साथ ही चालू साल के बजट में जो प्रावधान किया गया था उसका एक हिस्सा खर्च के बिना ही रह गया और उसके आधार पर दो बरसों के प्रावधान में कुछ अंतर दिखता है। दो अहम बातें वित्त मंत्री ने इस बजट में कृषि क्षेत्र के लिए की हैं। एक है उच्च मूल्य वाली प्लांटेशन फसलों को प्रोत्साहन और दूसरा, किसानों की सलाह के लिए एक नया आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस आधारित सूचना व प्रसार का ढांचा। साथ ही पशुपालन और मत्स्यपालन क्षेत्र के लिए बजट में पिछले साल के मुकाबले बेहतर बढ़ोतरी की गई है। लेकिन जब वित्त मंत्री किसानों की आय की बात करती हैं तो उसे वह एक सीमित दायरे तक ही रखती है और कृषि अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से को अछूता छोड़ देती है। चालू योजनाओं एवं कार्यक्रमों के बारे में भी बहुत विस्तार से बात नहीं की गई और पिछले कुछ बजटों में खेती के तरीकों में नये विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहनों का कोई जिक्र नहीं किया गया है।
बजट पेश होने के चंद दिन पहले संसद में पेश चालू साल की आर्थिक समीक्षा में देश की अर्थव्यवस्था के स्थायित्व के लिए कृषि की अहमियत पर जोर दिया गया था और सुधारों की वकालत की गई थी। साथ ही यह भी स्वीकार किया गया था कि करीब 6 फीसदी कामकाजी हाथों को कृषि में काम मिलता है और कृषि कई तरह की चुनौतियों से जूझ रही है। जिसमें जलवायु परिवर्तन, बिगड़ता मृदा स्वास्थ्य, घटती या स्थिर हो चुकी उत्पादकता और नीतिगत फैसलों के चलते फसल उत्पादन की प्राथमिकताओं में असंतुलन शामिल हैं। लेकिन इन सवालों का जवाब देने की वित्त मंत्री ने बजट में जरूरत नहीं समझी। वहीं कृषि शोध, जो भारत जैसे छोटी जोत और किसानों की बड़ी संख्या के चलते उनकी आय में वृद्धि का एक अहम माध्यम है, उसकी अनदेखी की गई। कृषि शोध और शिक्षा के बजट में करीब 300 करोड़ रुपये की कटौती की गई जिससे एक गलत संदेश जाएगा।
पिछले बजट में सरकार ने निजी क्षेत्र के लिए शोध प्रोत्साहन देने की बात कही थी लेकिन इस मोर्चे पर भी चुप्पी का अर्थ है कि सरकार की सोच में यहां कोई उलझन है और वह तय नहीं कर पा रही कि कृषि के लिए शोध पर खर्च को नहीं बढ़ाने की साफ वजह क्या है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के बजट में इस्टेबलिशमेंट पर ही बजट का करीब 90 फीसदी हिस्सा खर्च हो जाता है तो शोध के लिए कितने संसाधन है यह समझा जा सकता है। बजट प्रावधानों और प्राथमिकताओं पर रूरल वर्ल्ड के इस अंक की कवर स्टोरी में विस्तार से जानकारी दी गई है। साथ ही कृषि पर प्रतिष्ठित विशेषज्ञों के माध्यम से भी हमने बजट को समझाने की कोशिश की है।
दूसरा एक बड़ा मुद्दा अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों का है। भारत ने पिछले एक साल में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए कई बड़े फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) किये हैं। इनमें भारत-यूरोपीय यूनियन (ईयू) एफटीए को बहुत बड़ा व्यापार समझौता माना जा रहा है। वहीं न्यूजीलैंड, ओमान और ब्रिटेन के साथ भी एफटीए किये गये हैं। बदलती वैश्विक व्यापार व्यवस्था में डब्ल्यूटीओं की खत्म होती अहमियत के बीच एफटीए अहम हो गए हैं। सरकार ने कहा है कि इन समझौतों में कृषि और सहयोगी क्षेत्र और किसानों के हितों को संरक्षित रखा गया है। लेकिन जब यह समझौते अमल में आएंगे तभी साफ होगा कि इनकी असलियत कृषि क्षेत्र के लिए क्या है, क्योंकि हमारे देश में इन समझौतों को अंतिम रूप देने के पहले हितधारकों की राय नहीं ली जा रही है। इस विषय पर प्रतिष्ठित एक्सपर्ट प्रोफेसर विस्वजीत घर का आलेख प्रकाश डालता है। वहीं अमेरिका के साथ भी भारत व्यापार समझौता करने के अंतिम चरण में है। इन समझौतों से भारतीय कृषि और किसान अछूता नहीं रह सकता है। इनका फायदा होगा या नुकसान यह तो आने वाले दिनों में साफ होगा लेकिन हमें यह सच भी मानना चाहिए कि कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था केवल हमारे फायदे के लिए यह समझौता नहीं कर रही है. बल्कि वह इसमें अपना हित देख रही है। इसलिए आने वाला समय कृषि के लिए एक बदलाव का दौर होगा जिसके लिए हमें खुद को तैयार करना पड़ेगा।
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