कैसे आएगा कृषि का अमृत काल
भारतीय कृषि की अधिकतर उपलब्धियां उत्पादन में वृद्धि की हैं, लेकिन खेती को किसानों की बेहतर आजीविका का माध्यम बनाना सबसे बड़ी चुनौती
Ajeet Singh
भारत की इकोनॉमी दुनिया की सबसे तेज बढ़ती इकोनॉमी है और पूरी दुनिया यहां संभावनाएं देख रही है। इसी ने सरकार को उम्मीद दी है कि वह अमृत काल में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखे। आजादी के इन सौ साल में यह सपना तभी पूरा हो सकता है जब इसे हासिल करने का रास्ता किसान और कृषि क्षेत्र की समृद्धि से होकर जाए। लेकिन इसके लिए सरकार की नीतियों के केंद्र में किसान की आय में बढ़ोतरी का लक्ष्य होना चाहिए। वैसे पिछले दिनों सरकार ने कहा भी कि अब उसकी नीति उत्पादन की बजाय आय बढ़ाने पर है लेकिन जमीन पर यह बात अभी तक नहीं उतरी है। लोक सभा चुनावों के बाद केंद्र में नई सरकार गठित होगी, उसके लिए अमृत काल में कृषि और किसान की बेहतरी का रोडमैप तैयार कर उस पर अमल करना सबसे अहम काम होना चाहिए। यह मानना है उन एक्सपर्ट्स का जो कृषि और किसान से जुड़ी नीतियों के निर्धारण में भागीदार रहे हैं और सरकारी, कॉरपोरेट व संस्थागत स्तर पर कृषि क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
भारतीय कृषि के सामने खड़े इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए रूरल वर्ल्ड के सहयोगी रूरल वॉयस और भारत कृषक समाज ने मंथन किया। नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में “अमृत काल में कृषि” विषय पर हुए इस मंथन में एक्सपर्ट्स के नजरिये से एजेंडा का एक खाका सामने आया, जो हम यहां आपके सामने रख रहे हैं।
देश ने हरित क्रांति के बूते खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता हासिल की और निर्यात करने की स्थिति में आ गये। श्वेत क्रांति के जरिए हम विश्व के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक बने। देश में फल-सब्जियों के उत्पादन ने खाद्यान्न उत्पादन को पीछे छोड़ दिया। लेकिन अब तक नीतियों से मिश्रित सफलता मिली है। खेती को किसानों के लिए फायदे का सौदा बनाना आज भी सबसे बड़ी चुनौती है। छोटी होती जोत के कारण अधिकांश किसानों के लिए खेती से गुजारा करना मुश्किल होता जा रहा है। साथ ही जलवायु परिवर्तन, घटते भूजल स्तर, उत्पादकता और कृषि अनुसंधान के लिए फंडिंग की कमी जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए पुराने तौर-तरीकों से अलग हटकर सोचने की जरूरत है।
2024 के लोक सभा चुनाव में किसानों से जुड़े मुद्दों और वादों की गूंज सुनाई दी। कई राजनीतिक दलों ने किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी देने का वादा किया है तो किसानों की कर्ज माफी और गरीबों को पांच किलो के बजाय 10 किलो राशन जैसे वादे भी किए गये। लेकिन बुनियादी समस्या यह है कि किसानों को उनकी उपज का सही दाम कैसे मिले? उपभोक्ताओं के लिए खाद्य वस्तुओं की कीमतें कम रखने की सरकार की नीति किसानों को उपज के सही दाम से वंचित रखती है। इस चुनौती से भारतीय कृषि अमृत काल में कैसे उबरेगी और उसके लिए क्या कदम हो सकते हैं, इस पर हमारे एक्सपर्ट्स की राय देखते हैं।
चार प्रमुख चुनौतियां
आईटीसी के कृषि और आईटी बिजनेस के प्रमुख एस. शिवा कुमार कृषि क्षेत्र की चार प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित करते हैं। पहला, पिछले 75 वर्षों में भारतीय कृषि की कई उल्लेखनीय सफलताओं के बावजूद किसानों की आमदनी का स्तर बहुत कम है। प्रति व्यक्ति कृषि आय देश के बाकी क्षेत्र के लोगों की प्रति व्यक्ति आय से एक चौथाई से भी कम है।
आईएमएफ के मुताबिक, अगले पांच वर्षों में भारत विश्व जीडीपी ग्रोथ में 18 फीसदी योगदान करेगा। लेकिन क्या इस ग्रोथ में हम किसानों को साथ लेकर आगे बढ़ रहे हैं? यह बड़ा सवाल है। अमृत काल में कृषि को किसानों के लिए अधिक लाभकारी बनाने की आवश्यकता है। कृषि समृद्ध हो लेकिन किसान गरीब होते जाएं, यह नहीं होना चाहिए।
दूसरी चुनौती यह है कि यदि हम भारतीय किसानों को समृद्ध बनाना चाहते हैं तो उन्हें विश्व स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। खासकर उन उत्पादों में जहां निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं। किसानों की आमदनी बढ़ाने में निर्यात अहम भूमिका निभा सकता है। विशेष रूप से हाई वैल्यू उत्पादों का निर्यात बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें अधिक इनोवेटिव होना पड़ेगा।
शिवा कुमार मानते हैं कि किसानों की आमदनी बढ़ाने, देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, उपभोक्ताओं के लिए कीमतें कम रखने और निर्यात को बढ़ावा देने की नीतियों के बीच विरोधाभास रहा है। किसानों को बेहतर दाम भी दिलाना है और उपभोक्ताओं के लिए कीमतें कम भी रखनी हैं क्योंकि सरकार और पॉलिटिकल इकोनॉमी के लिए किसानों को मिलने वाले दाम की बजाय उपभोक्ता की जेब पर पड़ने वाला बोझ अधिक मायने रखता है। इन विरोधाभासों के बीच संतुलन बनाना होगा।
निर्यात में बेहतर दाम तभी मिलता है जब मांग के अनुरूप आपूर्ति होती है, ना कि हमारे पास क्या अधिक उपलब्ध है, उसके हिसाब से। अभी भारत मुख्य रूप से कच्चे माल का निर्यात करता है जबकि वैल्यू एडेड वस्तुओं का निर्यात 2 से 5 फीसदी के बीच है। शिवा कुमार का कहना है कि निर्यात के लिए मांग के अनुसार सप्लाई चेन तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए। तमाम कारगर तकनीकों, तौर-तरीकों और इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ ऐसे क्लस्टर बनाने होंगे जो प्रतिस्पर्धी हों और मांग के अनुसार आपूर्ति कर सकें। इस प्रकार चरणबद्ध तरीके से देश भर में वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार की जा सकती हैं। इससे निर्यात बढ़ेगा जिसका लाभ किसानों को मिलेगा और इससे घरेलू बाजार भी प्रभावित नहीं होगा। भारत, अमेरिका और दूसरे देशों के साथ स्थापित क्वाड का हिस्सा है। इसके तहत निर्यात के लिए इस प्रकार की वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाने पर चर्चा हुई थी। जिस प्रकार दुनिया से आईटी सेवाएं भारत में आउटसोर्स होती हैं उसी प्रकार दुनिया भर के लिए उच्च गुणवत्ता का फूड प्रोडक्शन भी भारत में हो सकता है। हम 350 अरब डॉलर का आईटी सर्विसेज का निर्यात करते हैं। इसी स्तर का निर्यात कृषि से भी संभव है, लेकिन उसके लिए हमें समानांतर सप्लाई चेन बनानी पड़ेगी जो घरेलू मार्केट के बदलावों से अछूती रहे।
आज कृषि में उपयोगी बहुत-सी आधुनिक तकनीक उपलब्ध हैं। डिजिटल टेक्नोलॉजी का भी प्रसार हो रहा है। कृषि और किसानों के हित में टेक्नोलॉजी का लाभ कैसे उठाया जाए, यह तीसरी चुनौती है। शिवा कुमार कहते हैं कि जब कृषि को किसानों के लिए लाभकारी बनाने की बात होती है तो सबसे बड़ा सवाल है कि “पावर ऑफ स्केल” का फायदा छोटे किसानों तक कैसे पहुंचेगा। भारत में कृषि से जुड़े 1500 से अधिक एग्रीटेक स्टार्टअप काम कर रहे हैं। इनमें से कई स्टार्टअप अपनी कामयाबी और संभावनाएं प्रदर्शित कर रहे हैं। शिवा कुमार कहते हैं कि स्टार्टअप की कामयाबी का लाभ किसानों तक कैसे पहुंचे और किसानों की आमदनी कैसे बढ़े, यह बड़ी चुनौती है। वह मानते हैं कि इसके लिए सॉल्यूशन इंटीग्रेटर्स यानी समाधान को जोड़ने वालों की जरूरत है, ताकि किसानों को केंद्र में रखकर तमाम समाधान और सेवाओं को एक प्लेटफॉर्म पर लाया जा सके। इसमें डिजिटल टेक्नोलॉजी कारगर साबित हो सकती है। लेकिन यह तभी होगा जब कोई सॉल्यूशन इंटीग्रेटर इसमें कारगर बिजनेस मॉडल बनाएगा, जिसमें किसानों का भी लाभ हो और उसका भी फायदा हो।
चौथी चुनौती है जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने में सक्षम टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देना। शिवा कुमार का मानना है कि क्लाइमेट चेंज और सस्टेनेबिलिटी के मामले में बहुत से प्रयास बड़े स्तर पर हो रहे हैं। लेकिन समस्या है कि किसानों को जलवायु परिवर्तन की मार से कैसे बचाया जाए, जलवायु संकट से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर हो रहे कामों से जमीनी स्तर पर किसान कैसे लाभान्वित हों। शिवा कुमार बताते हैं कि उन्होंने एक एआई स्टार्टअप की मदद से क्लाइमेट फोरकास्ट मॉडल को माइक्रो एग्री जोन के लिए ऑप्टिमाइज किया है। इससे जिला स्तर पर अगले 10, 20 या 30 वर्षों में विभिन्न फसलों के उत्पादन और गुणवत्ता पर प्रतिकूल मौसम की घटनाओं (एक्ट्रीम वैदर इंसिडेंट्स) के प्रभाव का आकलन किया जा सकता है। इसका उपयोग जलवायु संकट से निपटने के लिए कृषि पद्धतियों में सुधार के लिए किया जाएगा। इस तरह के काफी काम हो रहे हैं जिनके केंद्र में किसानों को रखने की आवश्यकता है।
कृषि अनुसंधान में निवेश
हरित क्रांति के बाद देश के खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि के बावजूद तमाम कृषि उपजों में भारत की पैदावार विश्व औसत से कम है। उदाहरण के तौर पर मक्का की सर्वाधिक पैदावार विश्व में 284.66 क्विंटल प्रति हेक्टेअर तक होती है और विश्व की औसत पैदावार 59.24 क्विंटल है। लेकिन भारत में औसत पैदावार सिर्फ 30.24 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है जिसमें बढ़ोतरी की काफी गुंजाइश है। अधिकांश फसलों में हम विश्व के सर्वाधिक पैदावार वाले देशों से बहुत पीछे हैं। दलहन और तिलहन में आयात पर हमारी निर्भरता का एक बड़ा कारण कम उत्पादकता है। घरेलू खपत और निर्यात के लिए कृषि उत्पादकता बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए कृषि अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना होगा। जोत के घटते आकार के कारण भी पैदावार बढ़ाने के लिए कृषि अनुसंधान और विकास पर ध्यान देने की जरूरत है।
भारतीय कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड (एएसआरबी) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सीडी माई कृषि अनुसंधान और विकास के लिए फंडिंग की कमी पर चिंता जताते हुए कहते हैं कि पिछले 18 वर्षों में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) में वैज्ञानिकों की संख्या 9.5 फीसदी बढ़ी है, फिर भी 20 फीसदी पद खाली पड़े रहते हैं। हर साल वैकेंसी बढ़ती जा रही हैं। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में वैज्ञानिकों/शिक्षकों की औसत संख्या पिछले दो दशक में 426 से घटकर 270 रह गई है क्योंकि लगभग 30 फीसदी पद खाली हैं। इस प्रकार कृषि विश्वविद्यालयों और संस्थानों की संख्या तो बढ़ी है लेकिन वहां रिसर्च और शिक्षण के लिए स्टॉफ कम हुए हैं। पिछले 18 वर्षों में कृषि अनुसंधान में निवेश लगभग 80 फीसदी बढ़ा, लेकिन इस बजट का 87 फीसदी वेतन पर खर्च होता है।
डॉ. माई के अनुसार, पिछले 15 वर्षों में कई नए संस्थान स्थापित किए गये हैं लेकिन वहां आरएंडडी के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में भी सुविधाओं की कमी है। भारत में कृषि आरएंडडी पर इस सेक्टर की जीडीपी का मात्र 0.6 फीसदी खर्च होता है जबकि विश्व औसत 0.94 फीसदी है। डॉ. माई कहते हैं कि हमें अगले 25 वर्षों में कृषि शोध पर खर्च को कृषि जीडीपी के एक प्रतिशत तक बढ़ाने की जरूरत है। भारत सरकार के बजट में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के बजट और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के बजट के बीच भारी अंतर है। वहीं, 2019-20 के बाद से आईसीएआर के बजट में कटौती हुई या बहुत कम वृद्धि हुई है।
यह स्थिति तब है जबकि कृषि अनुसंधान पर होने वाला निवेश अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद होता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी रिसर्च (एनआईएपी) के वर्किंग पेपर के अनुसार, कृषि अनुसंधान पर खर्च होने वाले हर एक रुपये से लगभग 13.85 रुपये का रिटर्न मिलता है। गरीबी मिटाने में भी यह अन्य क्षेत्रों में निवेश की अपेक्षा अधिक कारगर है। डॉ. माई बासमती की पूसा 1121 किस्म का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि 25 हजार करोड़ रुपये के बासमती निर्यात में पूसा 1121 ने 15 हजार करोड़ रुपये की हिस्सेदारी हासिल की है। ऐसे उदाहरण सामने होने के बावजूद कृषि अनुसंधान के लिए फंडिंग की कमी है। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) की 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को कृषि उत्पादन में चीन के आसपास पहुंचने के लिए कृषि अनुसंधान में निवेश तीन गुना बढ़ाना होगा।
देश में 70 से अधिक कृषि विश्वविद्यालय हैं जिनमें स्टेट, सेंट्रल और डीम्ड एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी शामिल हैं। इसके अलावा आईसीएआर के लगभग 113 रिसर्च इंस्टीट्यूट, सेंटर, डायरेक्टोरेट हैं जो अलग-अलग फसलों या क्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता रखते हैं। इन सबसे मिलकर नेशनल एग्रीकल्चर रिसर्च सिस्टम (एनएआरएस) बनता है जिसने पिछले 75 वर्षों में कृषि के विकास में अहम योगदान किया। कृषि के अमृत काल के लिए डॉ. माई एनएआरएस के विस्तार का सुझाव देते हैं। उनका कहना है कि कृषि से जुड़े शोध संस्थानों और वैज्ञानिकों को एनएआरएस सिस्टम से बाहर आईआईटी, सीएसआईआर, डीबीटी के संस्थानों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ समन्वय बनाना चाहिए। इससे भविष्य की कई समस्याओं के समाधान में मदद मिल सकती है।
देश के लगभग हर जिले में स्थापित कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका और फंडिंग को लेकर भी नए सिरे से विचार करना चाहिए क्योंकि जिस उद्देश्य से इनकी स्थापना हुई थी वह हासिल नहीं हो रहा है। देश के कुल फूड प्रोडक्शन में डेयरी उत्पादों, फल-सब्जियों और अंडे की हिस्सेदारी 50 फीसदी से अधिक है। लेकिन इस अनुपात में इन क्षेत्रों को फंडिंग नहीं मिलती है। इस तरफ भी ध्यान देने की जरूरत है। डॉ. माई मानते हैं कि कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक वृद्धि और किसानों की आय में बढ़ोतरी कृषि अनुंसधान में निवेश बढ़ाए बिना संभव नहीं है।
कृषि नीति या किसान नीति
कृषि के लिए बनने वाली नीतियां किसानों का कितना भला कर पा रही हैं, यह बड़ा सवाल है। भारत सरकार के पूर्व कृषि एवं खाद्य सचिव टी. नंदकुमार का कहना है कि अगर हमें किसानों की आमदनी बढ़ानी है तो कृषि नीतियों के केंद्र में उपभोक्ता की बजाय किसान को रखना होगा। यह मानसिकता बदलने की जरूरत है कि कृषि नीति और किसानों की नीति अलग-अलग हैं। कृषि नीति निर्माण का उद्देश्य किसानों को स्वतंत्रता देना और उनके हितों को प्राथमिकता देना होना चाहिए।
इसके लिए व्यापक नीतिगत बदलाव की जरूरत है। किसानों पर फसल की बुवाई से लेकर बीज, उर्वरक, भंडारण और बिक्री तक कदम-कदम पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी जाती हैं। किसान पर ज्यादातर पाबंदियां महंगाई नियंत्रण और उपभोक्ता के नजरिये से लागू होती हैं। नंदकुमार मानते हैं कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को अत्यधिक महत्व देने तथा स्टॉक लिमिट व निर्यात प्रतिबंध जैसी नीतियों में स्थायित्व ना होने से किसानों को नुकसान पहुंचता है। इसकी भरपाई कैसे होगी, इस बारे में भी सोचना चाहिए। वह कहते हैं कि कृषि नीतियों का लक्ष्य किसानों के विकल्प और निर्णयों को सीमित करने की बजाय किसानों को स्वतंत्रता देने पर होना चाहिए।
इस संदर्भ में प्याज का उदाहरण हमारे सामने है कि कैसे निर्यात पर प्रतिबंध के चलते महाराष्ट्र के प्याज उत्पादक किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। दरअसल, आयात-निर्यात और स्टॉक लिमिट से जुड़े फैसलों की जानकारी किसानों को ना तो बुवाई से पहले होती है और ना ही इस तरह के फैसलों में उनकी कोई भागीदारी होती है। हालांकि कई दालों के मामले में सरकार ने 2025 तक की नीति स्पष्ट कर दी है।
क्रेडिट गैप
किसान क्रेडिट कार्ड की वजह से पिछले दो दशक में किसानों को मिलने वाले कम अवधि के फसल ऋण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। लेकिन अब भी देश में 14.5 करोड़ कृषि जोत वाले किसानों के मुकाबले किसान क्रेडिट कार्ड की संख्या करीब 6.62 करोड़ यानी लगभग 45 फीसदी है। द्वारा होल्डिंग के सह-संस्थापक और कार्यकारी उपाध्यक्ष समीर शाह बताते हैं कि इनमें अगर एनपीए वाले खातों को हटा दें तो केसीसी खातों की संख्या 2.82 करोड़ के आसपास है। एग्रीकल्चर आउटपुट में 40 फीसदी योगदान के बावजूद पशुपालन, वानिकी और फिशरीज के लिए कुल कृषि कर्ज का केवल 10 फीसदी लोन प्राप्त होता है। केवल 30 फीसदी किसान औपचारिक स्रोतों से कर्ज प्राप्त करते हैं और 50 फीसदी से अधिक छोटे किसानों को बैंक या वित्तीय संस्थानों से कर्ज नहीं मिल पाता है।
समीर शाह का मानना है कि कृषि कर्ज का दायरा बढ़ाने में यूपीआई जैसे डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर कारगर साबित हो सकते हैं। बैंक और फिनटेक की भागीदारी और एआई की मदद से सिबिल स्कोर की तर्ज पर खेतस्कोर जैसे टूल्स के जरिए किसानों को आसानी से लोन उपलब्ध कराए जा सकता हैं। कर्ज के अलावा फसल और मवेशियों के लिए बीमा सेवाएं उपलब्ध कराने में भी डिजिटल सॉल्यूशंस अहम भूमिका निभाएंगे।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के सेंटर फॉर फोर्थ इंडस्ट्रियल रेवोलूशन के प्रमुख पुरुषोत्तम कौशिक बताते हैं कि नई तकनीक और इनोवेशन के जरिए कृषि से जुड़ी कई चुनौतियों का समाधान संभव है। ऐसे कारगार उपायों को साथ लाने की आवश्यकता है। इसके लिए एग्रीकल्चर डेटा एक्सचेंज बनाए जा रहे हैं। तेलंगाना में प्रोजेक्ट सागू बागू के पायलट प्रोजेक्ट के तहत एआई4एआई फ्रेमवर्क के जरिए डिजिटल एग्रीकल्चर, इनोवेटिव सॉल्यूशंस और किसानों को उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराकर पैदावार में 21 फीसदी बढ़ोतरी और उर्वरकों व कीटनाशकों के इस्तेमाल में 9 फीसदी कमी करने में कामयाबी मिली है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी ऐसी पहल की जा रही हैं।
भूजल संकट
कृषि क्षेत्र की कई समस्याएं बरसों पुरानी हैं जबकि जलवायु परिवर्तन और भूजल के गिरते स्तर जैसी कई नई चुनौतियां भी सामने हैं। नीति आयोग की 2019 की रिपोर्ट बताती है कि देश में करीब 60 करोड़ लोग भीषण जल संकट का सामना कर रहे हैं। 2030 तक देश में पानी की खपत बढ़कर दोगुनी हो जाएगी। आज भी देश का लगभग आधा कृषि क्षेत्र असिचिंत है और सिंचाई के लिए बारिश पर निर्भर है। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में भूजल के अत्यधिक दोहन की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है। पंजाब के पूर्व कृषि आयुक्त बलविंदर सिद्धू का कहना है कि साल 2000 में पंजाब के 30 फीसदी क्षेत्र में वाटर लेवल 10 मीटर से ज्यादा गहराई पर था। साल 2020 में पंजाब के 75 फीसदी क्षेत्र में वाटर लेवल 10 मीटर से गहरा हो गया है। इससे पंजाब में भूजल स्तर की समस्या का अंदाजा लगा सकते हैं। तीन दशक में पंजाब में पावर सब्सिडी का बिल 385 करोड़ रुपये से 18 गुना बढ़कर 7200 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। सिद्धू कहते हैं कि 2050 तक घरेलू खपत के लिए लगभग 45 करोड़ टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी। यह आवश्यकता हमें कम पानी और चरम मौसम की घटनाओं के बावजूद पूरी करनी होगी। साथ ही जल प्रबंधन के एप्रोच में भी बदलाव लाना होगा। नई तकनीक और बेहतर नीतियों के जरिए कृषि में जल संसाधन के कुशल इस्तेमाल के उपाय निकालने होंगे।
भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ का कहना है कि भारतीय कृषि से जुड़ी कई चुनौतियां पिछले 20 वर्षों से जस की तस बनी हुई हैं। कृषि अनुसंधान और प्रसार में निवेश पिछले 20 वर्षों में महंगाई के मुकाबले कम बढ़ा है। इसका मतलब यह है कि वास्तव में रिसर्च और एक्सटेंशन में निवेश साल दर साल घटता जा रहा है। अजय जाखड़ मानते हैं कि जिस तरह मुफ्त या बेहद कम दाम पर पीडीएस के तहत अनाज लोगों को बांटा जाता है उससे किसानों की उपज के दाम नहीं बढ़ पाते हैं। यह भारतीय कृषि की बड़ी समस्या है। यह नीतियों की वजह से पैदा हुई समस्या है।
दरअसल, स्वतंत्रता के बाद से हमारे पास कृषि क्षेत्र में उपलब्धियों की कमी नहीं है, लेकिन ये उपलब्धियां उत्पादन के बारे में अधिक हैं और किसान की आय के बारे में कम। इसलिए जरूरी है कि जब देश की आजादी के 100 साल पूरे हों तो हम उत्पादन के साथ किसान के जीवन और आजीविका की उपलब्धियों पर भी बात करें। ग्रामीण और शहरी आबादी के बीच जीवन से जुड़ी सुविधाओं के अंतर को पाटने की बात करें और यह सब होगा किसान की आय बढ़ाने से।
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