ग्रामीण भारत की समृद्धि का विचार है रूरल वर्
ग्रामीण भारत की समृद्धि का विचार है रूरल वर्
हरवीर सिंह
तीन साल पहले कृषि और ग्रामीण भारत के लिए नई सोच के रूप में हमने रूरल वॉयस की शुरुआत की थी। महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत गांवों में बसता है, और देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का कहना था कि देश की खुशहाली का रास्ता गांवों से होकर गुजरता है। आर्थिक उदारीकरण की लहर पर सवार भारत पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, लेकिन आर्थिक तरक्की की इस लहर के उतार-चढ़ाव में गांव और ग्रामीण आबादी कहीं पीछे छूटती जा रही है। तमाम आंकड और स ़े र्वेक्षण इस बात की तस्दीक करते हैं कि ग्रामीण भारत और कृषि क्षेत्र शहरी भारत और अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों से कहीं पीछे छूट गया है। यह अंतर जीवन के हर पहलू में बढ़ रहा है। यह अंतर कैसे कम हो, इसी विचार को आगे बढ़ाने का क्रम है ‘रूरल वर्ल्ड’ का आरंभ। रूरल वर्ल्ड, मीडिया वेंचर रूरल वॉयस मीडिया प्राइवेट लिमिटेड की यात्रा में एक नई कड़ी है। रूरल वॉयस की अनुभवी टीम में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ, टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट, साइंटिस्ट, नीतिगत मामलों के एक्सपर्ट, छोटे गांव और कस्बों की मंडियों से लेकर ग्लोबल मार्केट्स पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ तीन साल से जुड हुए हैं। ़े रूरल वॉयस के माध्यम से ये गांव और किसान के आर्थिक और सामाजिक जीवन को बेहतर करने के लिए खबरों, सूचनाओं और सूचना तंत्र की ताकत के जरिये ग्रामीण भारत और कृषि को दूसरे क्षेत्रों के करीब लाने की कोशिश कर रहे हैं।
रूरल वर्ल्ड के प्रवेशांक में नीति आयोग के सदस्य और देशदुनिया के प्रतिष्ठित कृषि अर्थविद व नीति विशेषज्ञ प्रोफेसर रमेश चंद ने स्वयं तर्क दिया है कि विकसित राष्ट्रों में कृषि पर निर्भर लोगों को मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र में ले जाकर इस पर बोझ कम करने का फॉर्मूला कामयाब रहा है। लेकिन अब यह फॉर्मूला नाकाम है क्योंकि उन क्षेत्रों की दो अंकों की वृद्धि दर भी रोजगार के बेहतर अवसर पैदा करने में नाकाम है। ताजा आंकड कहते ़े हैं कि भारत में कामकाजी लोगों का 45.8 फीसदी अब भी कृषि और सहयोगी क्षेत्र में काम करता है। ऐसे में भारत के लिए नया फॉर्मूला तलाशना होगा। भारत के विकसित राष्ट्र बनने का रास्ता कृषि केंद्रित अर्थव्यवस्था की नीति ही होगी, लेकिन यह रास्ता आसान नहीं है।
रूरल वॉयस और साक्रेटस ने छह माह की जमीनी पड़ताल में यह जानने की कोशिश की, कि ग्रामीण नागरिकों की नजर में ग्रामीण भारत की समस्याएं और मुद् कदे ्या हैं। उनके नजरिये में बेहतर जीवन और जीवन यापन के क्या विकल्प हैं और ग्रामीण भारत की आकांक्षाएं क्या हैं। रूरल वर्ल्ड के प्रवेशांक की कवर स्टोरी के लिए इससे सटीक विषय नहीं हो सकता था। दोनों संस्थानों की टीम ने छह माह की इस प्रक्रिया के जरिये देश के पांच अलग-अलग राज्यों, जिनकी आर्थिक-सामाजिक और एग्रो क्लाइमेटिक परिस्थिति अलग है, के 60 जिलों के ग्रामीण नागरिकों के माध्यम से ग्रामीण भारत का एजेंडा और आकांक्षाएं जानने की कोशिश की और उसे हम अपने इस प्रवेशांक के माध्यम से अपने पाठकों और देश के सामने रख रहे हैं। रूरल वर्ल्ड केवल एक नया मीडिया प्रॉडक्ट नहीं है, यह एक विचार है समृद्ध ग्रामीण भारत का, कृषि और किसान की आर्थिक तरक्की का वाहक बनने का, भारत और इंडिया के बीच के अंतर को पाटने का। अभी तक जो बेहतर हासिल हुआ उसको साथ लेकर मजबूत भविष्य के नये भारत की राह को सुगम बनाने का विचार है रूरल वर्ल्ड। इसके जरिये पाठकों को सूचनाओं, खबरों और विश्लेषण के जरिये समृद्ध करना मूल मंत्र है। टेक्नोलॉजी और बाजार तथा कृषि व ग्रामीण भारत के बीच एक पुल के रूप में भी रूरल वर्ल्ड काम करेगा, जिसमें सरकार, कॉरपोरेट, सहकारिता और उद्यमिता के तमाम विकल्प एक साथ चलेंगे। यही भविष्य भी है। पिछले तीन साल में रूरल वॉयस को सभी वर्गों से जो सहयोग और समर्थन मिला है, उसी ने हमें इस नये वेंचर के लिए साहस दिया। इस सकारात्मक सोच के साथ रूरल वर्ल्ड की यात्रा शुरू हो रही है कि कृषि और ग्रामीण भारत एक विकसित और नये भारत के लक्ष्य को हासिल करने में बराबर का भागीदार होगा।
यहां एक बात रूरल वर्ल्ड की भाषा के चयन को लेकर भी मैं कहना चाहगा। हमने रूरल वर ूं ्ल्ड में हिंदी और अंग्जी दोनों रे भाषाओं में रिपोर्ट एवं आलेख प्रकाशित करने का फैसला लिया है। इसकी वजह जहां देश के सभी हिस्सों के पाठकों के बीच इस पत्रिका की पहुंच बनाना है, वहीं जिस तरह से ग्लोबलाजेशन और डिजिटाइजेशन के चलते पूरा विश्व एक कड़ी की तरह जुड़ गया है उसके चलते रूरल वर्ल्ड की पहुंच भी वैश्विक स्तर पर होनी जरूरी है। मुझे उम्मीद है कि हमारा यह प्रयास पाठकों और सभी स्टेकहोल्डर्स के बीच अपनी जगह बनाने में कामयाब रहेगा।
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