पानी की किल्लत से जूझते ग्रामीण
पानी की सुविधा न केवल कृषि, बल्कि मानव समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
Adrija Chaudhuri
पानी की सुविधा न केवल कृषि, बल्कि मानव समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों को पीने, घरेलू उपयोग और खेती में पानी के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। स्वच्छ पानी जैसी बुनियादी जरूरत देश भर के ग्रामीण समुदायों की एक प्रमुख आकांक्षा थी। जोधपुर सम्मेलन में दो महिलाओं ने बताया कि पानी लेने के लिए वे प्रतिदिन लगभग 10 किलोमीटर पैदल जाती हैं। वे राजस्थान के अर्ध-शुष्क जिले नागौर से आई थीं और ट्बवेल या नल तक उनकी यू पहुंच नहीं थी। बाड़मेर, बालोतरा, फलोदी, सीकर, जोधपुर, पाली और उदयपुर सहित राजस्थान के अन्य जिलों से आए प्रतिभागियों ने पीने और सिंचाई के लिए पानी की कमी का मुद्दा उठाया। इन क्षेत्रों के किसानों ने भूजल स्तर में गिरावट और खेती में इस्तेमाल होने वाले केमिकल के कारण इसके प्रदूषित होने पर भी अफसोस जताया। ओडिशा और मेघालय जैसे ज्यादा वर्षा वाले राज्यों में भी पानी तक पहुंच की समस्याएं थीं। मेघालय के तीन मुख्य पहाड़ी क्षेत्रों- गारो, खासी और जैंतिया के प्रतिभागियों को सर्दियों में पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। उन्हें पीने का पानी आसानी से उपलब्ध नहीं होता। सिंचाई के लिए पानी की कमी के कारण वे खेती के लिए वर्षा पर निर्भर हैं। इसलिए साल में केवल एक या दो फसलें ही उगा पाते हैं। ओडिशा के 30 में से 21 जिलों से प्रतिभागी आए थे। उन्होंने पीने के पानी और सिंचाई सुविधाओं की कमी को प्रमुखता से उठाया।
किसानों के अलावा अन्य ग्रामीण नागरिकों ने भी स्थानीय जल स्रोतों के क्षरण पर चिंता जताई। मेघालय के प्रतिभागियों ने कहा कि मैकेनिकल तरीके से मछली पकड़ने से नदियां उथली हो रही हैं और मछलियों की संख्या कम हो रही है। तमिलनाडु के प्रतिभागी पश्चिमी घाट की नदियों, झीलों और जलधाराओं के प्रदूषण और प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा जैसी आक्रामक प्रजातियों के पानी से संबंधित मुद्दों के बारे में अत्यधिक जागरूक थे।
गांव में रहने वाली पुरानी पीढ़ी समाज में बदलाव को देख रही है। उन्हें लगता है कि लोगों में भाईचारा कम होता जा रहा है। युवा पीढ़ी हमेशा अपने फोन में लगी रहती है और वह गांव-परिवार से दूर हो गई है। खानपान और जीवन शैली बदलने के साथ युवाओं में मोटापे की बीमारी बढ़ रही है। अक्सर अनियोजित तरीके से सड़कों और इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होने से पेड़ काटे जा रहे हैं। वाहनों की संख्या और कचरा बढ़ता जा रहा है। लोगों के बैठने के लिए पहले जो खुली जगह हुआ करती थी, अब वह कहीं नहीं दिखती। अब लोग पेड़ के नीचे बैठकर जीवन और राजनीति की चर्चा नहीं करते। ऐसे स्थान की जरूरत है जहां लोग एकत्र हो सकें, आराम से बैठ सकें, बातें कर सकें तथा जहां युवा खेलकूदव्यायाम कर सकें। एक स्थान सबके मनोरंजन का भी हो। गांव को पुनर्जीवित करने के लिए इस तरह के स्थान का निर्माण करना सबसे आसान और महत्वपूर्ण तरीका हो सकता है।
चुनावी राजनीति और प्रशासन में भ्रष्टाचार
“सबसे पहले वादा यह हो कि वादा करने वाला वादा नहीं निभाए तो उसे कानूनन अपराध माना जाए और इसके लिए सजा का प्रावधान हो। क्योंकि वे वादा करते हैं, आप वोट देते हैं, वे चले जाते हैं फिर अगले 5 साल बाद आए ही नहीं तो बात ही खत्म हो गई।” कोयंबटूर सम्मेलन में विभिन्न जिलों से आए ग्रामीण लोगों ने चुनावी राजनीति में धनबल और बाहुबल का मुद्दा उठाया। वहां एक व्यक्ति का कहना था कि कानून अभी सिर्फकिसानों को निशाना बनाता है। अगर कहीं भ्रष्टाचार सामने आता है तो सरकारी अधिकारी पर भी कारवाई ्र होनी चाहिए।
भ्रष्टाचार के खिलाफ राजस्थान में भी तगड़ा माहौल दिखा। सम्मेलन में आए लोगों ने पैसे देकर और ‘मुफ्त’ का वादा करके मतदाताओं को लुभाने पर रोक लगाने की मांग की। वे चाहते हैं कि भ्रष्टाचारी नेताओं और आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों के चुनाव लड़ने पर रोक लगे। लोग जुमले सुनकर थक गए हैं। वे चाहते हैं कि उनका प्रतिनिधि जो वादे करके चुनाव जीता है, उन वादों को वह पूरा करे। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत अभी दूर का सपना है। प्रशासनिक कार्यों में भ्रष्टाचार भी एक बड़ा मुद्दा उभर कर सामने आया। ज्यादातर लोगों का कहना था कि
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