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कृषि का हाथ थामने की दरकार ग्रामीण भारत के लिए अस्तित्व का संकट

भारतीय कृषि अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। पूरा ग्रामीण क्षेत्र सामाजिक और पर्यावरण की चुनौतियों से घिरा है।

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Harvir Singh

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Prachur Goel

भारतीय कृषि अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। पूरा ग्रामीण क्षेत्र सामाजिक और पर्यावरण की चुनौतियों से घिरा है। हालांकि सड़क और स्वच्छता जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर और मोबाइल फोन के क्षेत्र में स्पष्ट सुधार भी हुए हैं। आप पूछ सकते हैं, तो क्या यह विरोधाभास है? जवाब है, ‘हां’। इस जवाब का आधार है किसान संगठनों, सिविल सोसायटी, नीति निर्माताओं और मार्केट इंटरमीडियरी जैसे स्टेकहोल्डर के साथ छह महीने तक हुई चर्चा। यह चर्चा नई दिल्ली या अन्य महानगरों में नहीं, बल्कि विविध कृषि-जलवायु, आर्थिक शक्ति और फसल पैटर्न वाले पांच राज्यों के छोटे शहरों में हुई। हमारे निष्कर्ष आपको कृषि की हकीकत से अवगत कराएंगे। यह नई दिल्ली अथवा किसी प्रदेश की राजधानी में बैठे ब्यूरोक्रेट के आकलन के विपरीत हो सकता है, लेकिन यह ग्रामीण क्षेत्र के समग्र विचार को प्रदर्शित करता है, जिसे एक प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप और राजनीतिक मदद की दरकार है।

 

अगर आप नई दिल्ली में किसी वरिष्ठ सरकारी अधिकारी से बात कीजिए तो वे आपको बताएंगे कि नई सड़कों के निर्माण, बिजली कनेक्शन, घर और टॉयलेट बनाने जैसे क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। वे आपको यह भी बता सकते हैं कि ग्रामीण इलाकों में मोबाइल फोन अब आम हो गए हैं तथा वहां हर तरह के सामान और सेवाओं का बाजार बढ़ रहा है। वास्तव में ग्रामीण भारत ने अनेक बदलाव देखे हैं। सड़क, बिजली जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर तथा विभिन्न सेवाओं तक पहुंच निश्चित रूप से बेहतर हुई है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं को श्य रे दिया जाना चाहिए। लेकिन ये भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाएं गांव और छोटे शहरों में रहने वालों की बढ़ती आकांक्षाओं की ओर भी इशारा करती हैं। उनकी आकांक्षाएं शहर वासियों के समान हैं, भले ही ग्रामीण क्षेत्र के केंद्र ‘कृषि’ के सामने अपने हाल पर छोड़ दिए जाने का जोखिम है। हालांकि ग्रामीण भारत की आकांक्षाएं सही और अमल में लाने योग्य हैं। बशर्ते इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तथा भ्रष्टाचार की समस्या के साथ प्रभावी तरीके से निपटा जाए।

 

 

देशभर में हमारी चर्चा में कृषि क्षेत्र के लिए जो जोखिम उभर कर सामने आए, उनमें कर्ज का बढ़ता स्तर, श्रमिकों की मजदूरी समेत बढ़ती इनपुट लागत, नकली कीटनाशकों की बेरोकटोक बिक्री, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, उपज की उचित कीमत न मिलना और राजनीतिक उदासीनता शामिल हैं। राजस्थान के जोधपुर में बालोतरा, बाड़मेर, जैसलमेर, सीकर, नागौर तथा अन्य जिलों से आए लोगों से जब हमने सवाल किया कि “2030 में आपका गांव का सपना क्या है,” तो उनका जवाब था, “प्लास्टिक मुक्त, पर्यावरण युक्त, नशा मुक्त, वाई-फाई युक्त। परिवहन सुविधा सहित, प्रदूषण रहित, 24 घंटे बिजली और एक स्टेडियम हो जिसमें लड़के, लड़कियां, महिलाएं रोज दौड़ें। आधुनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं हों और कृषि संबंधी जानकारी विज्ञान के आधार पर मिले।”

 

एक अन्य प्रतिभागी ने कहा, “हमारे गांव हरे-भरे हों, जल स्रोत पर्याप्त और शुद्ध हो। साफसुथरे गांव हों, प्लास्टिक मुक्त हो, विद्यालयों में लड़के-लड़कियों की संख्या खूब बड़ी हो, खास कर सरकारी संस्थानों में।” गांवों में रहने वालों का एक सपना है। वे अपने गांव में शहरों के समान सुविधाएं चाहते हैं। वे भी बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली आदि की उम्मीद रखते हैं जिनसे जीवन आसान हो। लेकिन शांतिपूर्ण और प्रदूषण मुक्त ऐसा गांव जहां सबके पास काम हो, हकीकत से काफी दूर है। ग्राम्य जीवन काफी बदल गया है। अनेक ग्रामीण क्षेत्र अब भी निरंतर बिजली, अच्छी सड़कें, साफ पानी, क्वालिटी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं से महरूम हैं। लोग संघर्ष कर रहे हैं तथा अधिकतर के लिए खेती मुनाफे का काम नहीं रह गया है। ना आमदनी के लिहाज से, ना सामाजिक स्टेटस के लिहाज से। यही नहीं, ग्राम वासी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जीवन शैली से पनपने वाली बीमारियों, बेरोजगारी, ड्रग्स जैसी नई समस्याओं का सामना कर रहे हैं। एक समय यह समस्याएं शहरों की हुआ करती थीं, गांवों की नहीं।

 

मीडिया संस्थान रूरल वॉयस, जो रूरल वर्ल्ड का साझा पब्लिकेशन भी है, और गैर-लाभकारी संस्था सॉक्रेटस ने ग्रामीण भारत के नागरिकों की चुनौतियों और आकांक्षाओं को सुनने-समझने के लिए उनके साथ अपनी तरह की पहली अखिल भारतीय सम्मेलन श्रृंखला शुरू करने का फैसला किया। इसके पीछे दो मुख्य कारण थे। पहला, ग्रामीण क्षेत्रों को अक्सर मुख्यधारा के विमर्श में हाशिए पर रखा जाता है। खबरों में किसान आत्महत्या, मिलावटी शराब या मध्याह्न भोजन योजना पर बहस को छोड़ दें तो ग्रामीण क्षेत्र की बातों को शायद ही जगह मिलती है। ऐसे देश में जहां आधी से अधिक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में बसी है, यह बेमेल बड़ा अविश्वसनीय लगता है। दूसरा कारण इंटरनेट और बेहतर बुनियादी ढांचे के साथ ग्रामीण परिदृश्य में पिछले 15 वर्षों में हुए बड बदलावों से संबं ़े धित है। इन सम्मेलनों के माध्यम से, सॉक्रेटस और रूरल वॉयस का उद्शदे ्य ग्रामीण भारत की वर्तमान मनःस्थिति को समझना और वहां उठाए 

 


Harvir Singh
Editor-in-Chief
Prachur Goel
Director of Socratus

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