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कृषि क्षेत्र की बढ़ती मुश्किलें

ग्रामीण भारत पर कोई भी चर्चा कृषि पर बातचीत के बिना पूरी नहीं हो सकती। देश भर में ग्रामीणों के साथ हमारी बैठकों में प्रतिभागियों में से लगभग 60 फीसदी किसान थे।

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Adrija Chaudhuri

ग्रामीण भारत पर कोई भी चर्चा कृषि पर बातचीत के बिना पूरी नहीं हो सकती। देश भर में ग्रामीणों के साथ हमारी बैठकों में प्रतिभागियों में से लगभग 60 फीसदी किसान थे। पिछले दो दशकों से ग्रामीण समुदायों को परेशान करने वाले कृषि संकट की वास्तविकता प्रतिभागियों की चिंताओं, आशाओं और सपनों में स्पष्ट रूप से दिख रही थी। हालांकि, उनके द्वारा उठाए गए अधिकांश मुद् नए नहीं थे, दे फिर भी यह किसानों की धारणाओं और प्राथमिकताओं को समझने के लिए काफी हैं। किसानों ने बताया कि केवल कृषि आय से गुजारा करना लगभग असंभव होता जा रहा है। फसलों की कीमतें लागत के अनुपात में कम हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक युवा किसान ने हमें बताया, "उर्वरक और कीटनाशक सहित हर चीज महंगी होती जा रही है, हम हर तरफ से दबाव में हैं।" उत्तर भारत की "गन्ना बेल्ट" का हिस्सा कहे जाने वाले मुजफ्फरनगर में प्रतिभागियों ने गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) न बढ़ने और चीनी मिलों से भुगतान में देरी को एक बड़ी समस्या के रूप में उठाया। यहां के किसानों ने कीटनाशकों, उर्वरकों, बीज और मजदूरी की लागत सहित कृषि इनपुट की बढ़ती लागत की भी शिकायत की। इस अपेक्षाकृत समृद्ध कृषि क्षेत्र में भी किसानों को खेती जारी रखने के लिए कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

 

ओडिशा के किसानों का मानना था कि फसल की कीमतें लाभकारी नहीं हैं। केंद्रपाड़ा जिले के एक किसान ने कहा, "किसानों को मिलने वाली कम कीमत का मुख्य कारण गोदामों और कोल्ड स्टोरेज जैसी भंडारण सुविधाओं की कमी है।" अधिकांश किसानों को अपनी उपज सीधे अपने खेतों-खलिहानों पर ही स्थानीय व्यापारियों और बिचौलियों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। राजस्थान के प्रतिनिधियों ने बताया कि कैसे फसल की कीमतें बीज, उर्वरक और कीटनाशकों जैसे कृषि इनपुट की बढ़ती लागत के साथ तालमेल बिठाने में वे असमर्थ हैं। शिलांग में भी हमने यही कहानी सुनी- खराब सड़क संपर्क, भंडारण सुविधाओं की कमी और देरी से भुगतान। कोयंबटूर के किसानों ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बहुत कम है और इसे किसानों को खुद तय करना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि तमिलनाडु में आमतौर पर उगाई जाने वाली फसलों, जैसे चाय, कॉफी, सब्जियां और मसालों का भी एमएसपी तय किया जाना चाहिए।

 

हमारे कई सम्मेलनों में प्रतिभागियों की धारणा थी कि अकेले एमएसपी और अच्छी कीमतें कृषि की घटती व्यवहार्यता के मुद् का समाधान नहीं दे कर सकतीं। कई जगह किसानों ने कहा कि सरकारें पीएम-किसान जैसी योजनाओं के तहत सहायता बढ़ाकर उनकी आय सुरक्षित करें। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि किसानों का मुनाफा बढ़ाने के लिए कृषि में मूल्यवर्धित उत्पादों और स्थानीय उद्योगों को सरकारों द्वारा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। किसानों ने महसूस किया कि इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) और सहकारी समितियों की क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए। 

 

हर जगह इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई। चाहे गेह या धान हो, आम या ग ूं न्ना हो या फिर टमाटर हो, हर फसल पर जलवायु परिवर्तन का असर है और लोग असहाय दिख रहे हैं। मानव और पशु का संघर्ष देश के अलग-अलग हिस्से में अलग रूप में सामने आया। उत्तर प्रदेश में आवारा पशुओं की समस्या गंभीर नजर आई जिनकी वजह से किसान खेतों में ही सोने के लिए मजबूर हैं। ओडिशा और राजस्थान में भी पशु फसलों को बर्बाद कर रहे हैं। कोयंबटूर के आसपास हाथी जैसे जानवरों का अक्सर किसानों से सामना होता है। एक प्रतिभागी के अनुसार, “केमिकल का अत्यधिक प्रयोग गांव में सबसे ज्यादा बर्बादी का कारण है। केमिकल बहुत ज्यादा है, चाहे वह जमीन में हो, जानवरों में हो, इंसानों में हो, हर जगह केमिकल ही केमिकल है।”

 

हम लोग पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शहर मुजफ्फरनगर में थे। पंजाब के साथ यह क्षेत्र भी भारत में हरित क्रांति के केंद्र में रहा है। लेकिन यहां भी किसान स्वयं उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल का मुद्दा सामने लेकर आए। इससे पता चलता है कि इनका प्रयोग कितना असंतुलित तरीके से हो रहा है। किसानों का कहना था- “नकली पेस्टिसाइड आ गई है कोई चेकिंग नहीं है।” “डीलर ट्ड में लाला ल रे ोग बैठे हैं जिनको एग्रीकल्चर का एबीसीडी भी नहीं पता। वे हमें दवाइयां दे रहे हैं।”

 

अत्यधिक रसायनों के इस्तेमाल को लेकर आलोचना हर जगह दिखाई दी। आश्चर्यजनक रूप से प्राकृतिक खेती का नैरेटिव लोकप्रिय दिखा। लोगों का कहना था कि रसायनों से मिट्टी की उर्वरता कम हो गई है, पानी प्रदूषित हो गया है, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता गिर गई है, फसलों में गंभीर बीमारियां लगने लगी हैं और खर्च भी बढ़ गया है। किसान प्राकृतिक और नियमित खेती के नैरेटिव में फस गए हैं। हर साल होने वाले और कई बार अप्रत्याशित रूप से कीटों के हमले पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। खेती को सस्टेनेबल और खाद्य पदार्थों को सेहतमंद बनाने का विचार लगभग हर जगह दिखा, खासकर राजस्थान और ओडिशा में। मुजफ्फरनगर और कोयंबटूर में किसान ज्यादा प्राकृतिक की ओर जाना चाहते हैं, लेकिन वे पसोपेश में हैं कि यह सफल होगा या नहीं। अनेक लोगों के लिए यह जोखिम बहुत बड़ा है। कुल मिलाकर समाधान के लिए जो सुझाव आए उनमें नकली कीटनाशकों पर रोक, डीलरों का नियमन, किसानों को कृत्रिम इनपुट के संतुलित इस्तेमाल की जानकारी देना, ऑर्गेनिक खेती अपनाना और प्राकृतिक सॉयल सप्लीमेंट को अपनाना शामिल हैं। मेघालय के पश्चिमी खासी हिल्स के एक किसान का कहना था कि किसान होने के नाते उन्हें प्रकृति का ध्यान रखने की जरूरत है, और बदले में प्रकृति उनका ख्याल रखेगी।

 

यह बात हर जगह सामने आई कि कृषि संबंधी सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता की कमी जरूरतमंदों तक इनकी पहुंच में बाधक है। राजस्थान के प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि सरकारी योजनाओं के बारे में सभी सरकारी कार्यालयों के बाहर जानकारी प्रदर्शित की जानी चाहिए। मेघालय के किसानों ने महसूस किया कि उन्हें सरकारी योजनाओं के बारे में बेहतर जानकारी होनी चाहिए। ओडिशा के प्रतिभागी मनरेगा जैसी सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में देरी या कमी से निराश थे। उनका मानना था कि सरकारी नीतियों के बारे में सही जानकारी प्रसारित करने के लिए प्रत्येक गांव में जागरूकता समूह बनाए जाने चाहिए। तमिलनाडु में प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में विधायकों, नीति निर्माताओं और किसान संघों की मासिक बैठक होनी चाहिए। एक और मुद्दा लगातार सामने आया वह था रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल। इस बारे में किसानों के बीच जागरूकता का स्तर भी काफी अधिक था। राजस्थान के एक किसान ने बताया, “केमिकल का अत्यधिक इस्तेमाल गांव की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण है।” यूपी के किसानों ने बताया कि कैसे केमिकल के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता और लोगों की सेहत प्रभावित हुई है। ओडिशा के किसानों ने कहा कि हानिकारक रसायन सभी जल स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं। राजस्थान में यह चिंता जताई गई कि कैसे केमिकल के ज्यादा उपयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर और अन्य बीमारियां हो रही हैं। इस अहसास से किसानों में प्राकृतिक खेती और टिकाऊ कृषि के महत्व की समझ पैदा हुई है। अधिकांश किसानों का मानना था कि यह आगे बढ़ने का सही रास्ता। किसानों ने सरकारों से अपने गांवों में मासिक जागरूकता बैठकें आयोजित करने, प्रमाणन योजनाओं को सरल बनाने और रियायती कीमतों पर जैविक इनपुट की आपूर्ति करने का आह्वान किया।

 

किसानों ने मानव-पशु संघर्ष की चिंता को भी प्राथमिकता दी। यूपी में आवारा पशुओं के आतंक के कारण किसान कई तरह की फसल बोने से भी डरते हैं। यह मुद्दा मुजफ्फरनगर में हमारे प्रतिभागियों के बीच सबसे अधिक गूंजा। किसानों ने इसके लिए कई समाधान सुझाए। इनमें हर गांव में पशु आश्रय स्थल बनाने के लिए सरकारी धन का उपयोग करने से लेकर किसानों को बूढ मवे ़े शियों की देखभाल के लिए मासिक भुगतान, पशु व्यापार को वैध बनाना शामिल हैं। ओडिशा, तमिलनाडु और मेघालय में आसपास के जंगलों से जंगली जानवर खेतों में घुस जाते हैं। तमिलनाडु में कोयंबटूर जिले के एक किसान ने बताया, “पश्चिमी घाट से सटे इलाके में तेनकासी से सत्यमंगलम वन प्रभाग तक हिरणों, सूअरों और मोरों के उपद्रव के कारण बाजरा की फसलें नहीं उगाई जा सकती हैं।” नीलगिरि के एक किसान अपने क्षेत्र में हुए नुकसान का एक फोटो एलबम भी लेकर आए थे। इससे एक महत्वपूर्णनिष्कर्षनिकला- बढ़ते मानव-पशु संघर्ष को मवेशी और पशु संरक्षण पर सरकारी नीतियों के साथ-साथ शहरीकरण के कारण वन क्षेत्रों के विस्तार पर दबाव से जोड़ा जा सकता है।

 

सिंचाई के लिए पानी हर जगह चिंता का एक विषय था, विशेष रूप से ओडिशा और राजस्थान में जो विपरीत कृषि-पारिस्थितिकी क्षेत्र हैं। ओडिशा में बढ़ती अनियमित वर्षा का प्रभाव खराब सिंचाई सुविधाओं के कारण अधिक महसूस किया गया। राजस्थान में भूजल के घटते स्तर ने खेती के लिए अच्छी सिंचाई सुविधाओं को जरूरी बना दिया है। मेघालय में किसानों को सर्दियों के मौसम में पानी की कमी झेलनी पड़ती है।

 

की कमी, बेरोजगारी और ड्रग्स की समस्या जैसा एक प्रतिभागी का कहना था, “अगर बिहार के मजदूर न आएं तो आप खेती नहीं कर सकते। हमने खुद खेती करनी छोड़ दी है।” चाहे मुजफ्फरनगर हो या कोयंबटूर हर जगह किसानों की शिकायत है कि खेतों में काम करने के लिए मजदूर तलाशना बड़ा संघर्ष हो गया है। मजदूरी काफी बढ़ गई है। गांव के युवा भले ही खाली बैठे हों लेकिन वे खेतों में नहीं जाएंगे। इसलिए खेत मालिक अनेक मौकों पर प्रवासी मजदूरों पर ही निर्भर होते हैं।

 

“नरेगा को खेती में जोड़कर न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित की जाए। हमारे राजनीतिक तंत्र की सबसे बड़ी समस्या है मुफ्त में चीजें देना।” मजदूरों की समस्या से परेशान बागपत के एक किसान का कहना था कि कृषि मजदूरी को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत शामिल किया जाना चाहिए। इस तरह इस स्कीम से मजदूरी का एक हिस्सा भुगतान हो जाएगा। विभिन्न क्षेत्र के भू- स्वामी किसानों की राय थी कि तथाकथित मुफ्त वितरण बंद होना चाहिए। यह लोगों के काम करने की प्रवृत्ति को प्रभावित करता है। एक किसान के अनुसार, “किसान से आजकल कोई शादी नहीं करता। बच् एसचे ी में बैठना पसंद करते हैं।”

 

भारत में कृषि का भविष्य दुविधापूर्ण लगता है तो इसका कारण सिर्फ आर्थिक या पर्यावरण संबंधी चुनौतियां नहीं, बल्कि इससे गंभीर सामाजिक चुनौती भी जुड़ी हुई है। युवा खेती करना नहीं चाहते। खेती करने वालों को दुल्हन नहीं मिलती। समाज खेती को चुका हुआ मानने लगा है। उसे लगता है कि खेती में भविष्य अनिश्चित है, इसमें कोई कमाई नहीं। फसल खराब होने पर किसान के कर्ज में डूबने की आशंका बहुत अधिक है। इसका परिणाम यह है कि परिवार की मदद से युवा उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं। हालांकि गिने-चुने सरकारी पदों को छोड़ दें तो गांवों में अच्छी नौकरी कहीं नहीं है। खेती से इतर मैन्युफैक्चरिंग, सर्विसेज या लघु उद्योगों में रोजगार के अवसर भी बहुत कम हैं। इसके कई कारण हैं- ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित क्वालिटी शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा का अभाव तथा ग्रामीण उद्योगों को आगे बढ़ाने के लिए कर्ज और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी। नतीजा- आकांक्षाओं और क्षमताओं से लबरेज युवक-युवतियां बेरोजगार हैं। “गांव नशा मुक्त होना चाहिए, यह सब की प्राथमिकता है। नशा नहीं होना चाहिए और इसके

 


Adrija Chaudhuri
Socratus

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